घर की याद और कुछ बातें झारखंड की

घर से लौट कर आया हूं। जेठ की दुपहरी की तरह हैं अभी घर की यादें। एक दम कड़क। ताजा-ताजा। घर से चलते वक्त का अंतिम खाना.. कौर ठीक से अंदर नहीं जाता। आज भी.. और तब भी होता था जब घर से पहली बार निकला था।

एक जुलाई की रात झारखंड एक्सप्रेस से जा रहा था, दो को घर पहुंचना था लेकिन दो जुलाई को झारखंड बंद, तीन जुलाई को भारत बंद। पहले ट्रेन का रूट बदला और फिर बारिश और बंद ने सुहाने सफर को आह-आउच सा बना दिया।

तीन अहले सुबह किसी तरीके घर पहुंचा। लेकिन घर पहुंचने के बाद किसी तरीके से आह-आउच वाली स्थिति वाह-वाह हो गई। मेरी छह महीने की भतीजी का हंसता हुआ चेहरा जो दिखा। भतीजी का नाम उसकी बुआ ने माही रखा है। पूरा घर माही-माही से गुंजायमान रहता है।
इसी बीच मुझे लग रहा था मैं कुछ मिस कर रहा हूं, सोच रहा था आलोक पुराणिक ने आज संडे स्पेशल यू हीं कुछ लिखा होगा.. अपने डाक्टर साहब(अनुराग जी) ने भी अपने यादों के पेड़ को झकझोरा होगा, कुछ पत्ते सहज रूप से गिरे होंगे। पुराने लेकिन ताजा-ताजा से लगने वाले।
प्रमोद सिंह अजदक वाले ने कुछ आलापा होगा, जिसे मैं एक बार पढ़ता हूं फिर दूसरी बार पढ़ने पर समझ पाता हूं। तब पता चलता है कि कितनी बड़ी बात लिखी गई है। ठीक ऐसे ही ना जाने कितनों के बारे में सोचा और अपने दोस्तो को बताया..।

इन सब पलों में मेरा कैमरा मेरे साथ था। फोटो लिए, फ्लिकर पर अपलोड किया। मेरे पत्रकार दोस्त ने इसे देखकर कहा, मैंने ऐसी हरियाली तो कहीं देखी ही नहीं है। मैंने कहा झारखंड के नाम में हरियाली है। झार=झाड़=झाडि़यां, पेड़-पौधे.. rajeshroshan

झारखंड के बनने से बहुत कुछ बदल गया है। बहुत कुछ..। इस अमीर राज्य के गरीब जनता के साथ कितना अच्छा हो रहा है कितना बुरा..यह एक अलग बहस का हिस्सा है।

मेरे लिए तो मेरा झारखंड जैसा भी अच्छा है। कई बुराईयां जिसे मिटाना होगा। झारखंड बंद झारखंड का सबसे सफल हथियार सा नजर आता है। इसे बदलना होगा। कब और कैसे इसका मुझे ज्ञान नहीं लेकिन इतना पता है कि इस अमीर राज्य के लोगों को दिल से, मन से और जेब से अमीर बनना है तो झारखंड बंद को बंद करना होगा।

किसकी और क्या है दिल्ली!

पिछले सात सालों से दिल्ली में रह रहा हूं, इसके साथ 27 साल की उम्र की समझ के साथ जो दिल्ली को देखा, सुना, पढ़ा, उसी मुतालिक कुछ पंक्तियां जोड़ने की कोशिश..

लुटियंस से लेकर केपी सिंह तक..
कितनों ने बनाया और कईयों ने लूटा..
दिल्ली ही घर है..

देश के अलग अलग हिस्सों से आए
उन 750 सांसदों की,
जिन्होंने देश को देने से ज्यादा इससे लिया है

सुप्रीम कोर्ट में हक के लिए लड़ने आए
देश के कई लोगों की भी..
जो लूटे होते हैं और देश का कानून उन्हें और लूट लेता है

थोड़ा व्याकुल, थोड़ा उत्साहित
रोजगार के लिए गांव से आने वाले उस युवक की भी
जो अभी ट्रेन में बैठा भी नहीं है

चौड़े सड़क पर झूम कर चलने वाले
उन नौजवानों की भी
जो वीकेएंड में अखबार का हिस्सा बन जाते हैं

कुकुरमुत्ते की तरह खुले पत्रकारिता में पढ़ने वाले
युवा पत्रकार से लेकर वरिष्ठ पत्रकारों की भी
जो सीवी, फोन और मुलाकात का सिलसिला नहीं छोड़ते

ब्लू लाईन, व्हाइट लाइन, मुद्रिका और बाहरी मुद्रिका
आफिस से परेशान उन लाखों यात्री की भी
जो जवानी का आधा हिस्सा बस में गुजार देते हैं

नार्थ कैम्पस, साउथ कैम्पस और मुखर्जी नगर
पढ़ने आए उन छात्रों की भी
जिनके हाथों में फरवरी में सुर्ख लाल गुलाब नजर आते हैं

एम्स, अपोलो और सफदरजंग आने वाले
बीमार और उन तीमारदारों की भी
जिन्हें खुशियां तो, कभी गम ज्यादा मिलते हैं

बाकि बचे हम साधारण लोग

काम से छूटे
किराए घर में आए
कुंवारा खाने की, विवाहित अन्य परेशानियों में
लग जाता है..
रात को देर से सोना
..फैशन मान लिया जाता है।
कंम्प्यूटर और लैपटाप में खिटिर फिटिर के बाद
पांच बाई साढ़े छ: के बिस्तर में
..आठ बजे जल्दी उठ जाते हैं।
कई रिपोर्ट और कई लेखनी
दिलवालों से लेकर, संवेदनाओं से मरा हुआ
र्ईट और गारे से भरा हुआ
शहर बता चुके हैं।
लोगों कहते हैं..
दिल्ली का मौसम, अपना नहीं है
राजस्थान इसे गर्मी और हिमाचल सर्दी दे जाता है

नेताओं ने इस बात को सुनकर
पूरी दिल्ली को ही शंघाई बनाने का फैसला किया
करोड़ों खर्च किए
सफर, आस्था और जज्बा बढ़ाने वाले
मेट्रो, मंदिर और खेल गांव बनवाए

दिल्ली का दिल धड़कता है-

नेता, आरोपी बेरोजगार और नौजवानों में
पिछे नहीं हैं छात्र, पत्रकार और बीमार

इंडिया गेट, लाल किला, कुतुब मीनार
जनपथ, मोनेस्ट्री और पालिका बाजार
यही है यहां की पहचान
इसी से बढ़ती है दिल्ली की शान

हिंदी और अंग्रेजी के सोच का फर्क

अगर यह बात कही जा रही है तो मुमकिन है इसमें सच्चाई होगी। अगर होगी तो मैं कुछ कहना चाहता हूं। पहले मैं केवल यह मान लेता (स्कूल में गणित के सवालों का जवाब देने के क्रम में कुछ तो मानते होंगे, बस यह इसी प्रकार का मानना है)हूं कि हिंदी वालों के पास पैसे कम होते है। सोच भी प्रोग्रेसिव नहीं होती। छोटी-छोटी बातों को भी ऐसे पकड़ते हैं जैसे पैसे को दांत से पकड़ा जाता हो।

इसी के ठीक उलट यह मान लेता हूं कि अंग्रेजी वालों के पास पैसा होता है। सोच से प्रोग्रसिव होते हैं। हर छोटी बातों को नहीं पकड़ते।

अगर यह सब हिंदी और अंग्रेजी वालों की सोच में है तो क्या होगा? जरा मजमून पेश करता हूं।

- हिंदी
सबसे पहले तो वह पैसा कमाना चाहेंगे। इसके लिए कुछ काम करेंगे, कुछ मक्खन बाजी, कुछ के अपने उसूल होंगे इन सब के बीच उनकी प्राथमिकता पैसा कमाना ही होगी। येन, केन प्रकारेण।

प्रोग्रेसिव से मेरा सीधा मतलब है कि समय के अनुसार वह नहीं बदलना चाहते। माता-पिता को डैड बोलने पर कहेंगे आजकल के लड़के-लड़कियां पिता को डैड तो कभी डेड कहते हैं। डैड बोलने में दिक्कत क्या है, मुझे समझ नहीं आता। 90 के दशक में जो जींस पहनते थे, उनके बारे में कहा जाता था, लड़का जींस पहनता है(आज वह खुद या उनके बच्चे पहनते होंगे)। इतना बताने के बाद शायद मैं ठीक से समझा पाऊं कि नई चीज को आत्मसात करने में इन्हें दिक्कत होती है। मतलब यह प्रोग्रसिव नहीं होते।

छोटी बात को पकड़ते हैं से मेरा मतलब है, टीवी के एक रियलिटी शो में मलाईका अरोड़ा माइक्रो मिनी पहन कर आती है तो कुछ दोस्त इसी बारे में बात करते हैं कि यार देखो यह छोटे कपड़े पहन कर आती है। और बात आगे बढ़ते हुए मस्त और सेक्सी तक पहुंच जाती है। और उसके बाद बातों ही बातों में बलात्कार भी। ऐसा होता है। हमारे आपके सभी के बीच।

- अंग्रेजी

पैसा तो इनके पास होता ही है तो इस बारे में इनका ख्याल प्राथमिक रूप में नहीं होता है। इनकी स्थिति उसे बढ़ाने को लेकर ही होती।
इनका ध्यान सड़क पर चल रहे कुत्तों की मारपीट में घायल एक कुत्ते पर होता है (मनुष्य मदद मांगे तो शायद नहीं दे पाएं, कुत्तों को देते हैं।)

इन्हें नई चीजों को करने में तकलीफ नहीं होती। खाने से लेकर शराब तक। हर नई चीज के यह दीवाने होते है। आफिस का कपड़ा काफी सलीके का होता है लेकिन जब अपनी सोच पर आएं तो औड चीज को यह पहले अपनाते हैं।

जाति और धर्म को लेकर तो ये भी संवेदनशील होते हैं। लेकिन इनमें कास्ट से ज्यादा क्लास को लेकर फीलिंग होती है। अगर अदर कास्ट वाला भी सेम क्लास का हुआ तो फिर चलेगा। बालीवुड इसका अच्छा उदाहरण है। यहां केवल क्लास की पूछ होती है, कास्ट तो इनके लिए कोई मैटर ही नहीं है।

मैं यह नही कहता की इससे अलग सोच वाले लोग दोनों गुटों में नही होते हैं. बेशक होते हैं. लेकिन बहुतायत इन्ही की है

याद दिलाना मुनासिब समझता हूं कि हम मान रहे हैं। सच्चाई यह नहीं है, या सच्चाई भी यही है.. आप बताएं?

अरबपति भारत, विश्व की खाद्यान्न समस्या और कोडंलीजा का बयान

इतिहास गवाह है कि भारत को नजरअंदाज कर कभी भी कोई काम नहीं किया जा सकता। धीमे-धीमे ही सही लेकिन भारत और भारतीय अपनी पहचान विश्व के अन्य भूभाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे रहें हैं।

हलिया में पत्रिका फोब्र्स ने कहा कि 2018 तक भारत में सबसे ज्यादा अरबपति होंगे। आम भारतीय इन्हीं बातों से खुश हो लेता है। लेकिन विदेशियों को यह बातें नागवार लगती होंगी! मैं यहां “होंगी” लिख रहा हूं क्योंकि ऐसा मेरा अंदाजा है। कोई ठोस प्रमाण नहीं है मेरे पास।

इस अंदाजे को और बलवती करती है कोंडलीजा राइस का यह बयान कि विश्व में खाद्यान्न समस्या जो उत्पन्न हुआ है, उसका एक मुख्य वजह भारत है। भारत में इन दिनों खाद्यान्न की खपत बढ़ गई है जिसके कारण विश्व के कई हिस्सों में इसकी कमी हो गई है।

विश्व का सबसे अधिक उर्जा खपत करने वाला देश जब विश्व का सबसे अधिक खाद्यान्न उपजाने वाले देश को ऐसा कुछ बोले तो कुछ समझ नहीं आता।

जिस तेल के लिए अमेरिका ने इराक पर हमला किया था, लाखों डालर खर्च कर दिए अब वही तेल अमेरिका के साथ पूरे विश्व को अपनी धार दिखा रहा है। बांग्लादेश, हैती, जिम्बाब्वे, फिलीपींस व मध्य पूर्व अफ्रीका के देशों में खाने की भारी कमी है। राईस इसी का ठीकरा विश्व के दो सबसे विकास करने वाले देशों (भारत और चीन) पर फोड़ देना चाहती हैं।

अर्जेटीना में हाल ही एक किलो टमाटर की कीमत एक किलो गोश्त से ज्यादा हो गई थी। भारत में तो सब्जियों के दाम किलो में बताए ही नहीं जाते। यहां दुकानदार सब्जियों के दाम 250 ग्राम के हिसाब से बताता है।

हर देश की खाद्यान्न जरूरत बढ़ रही है। इसे दूसरे देश के भरोसे रह कर पूरा नहीं किया जा सकता। भारत में तेल नहीं है तो जापान में खाद्यान्न नहीं तो दुबई में पानी नहीं। इन सब की वैकल्पिक व्यवस्था की जिम्मेदारी वहां की सरकार को करनी चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र ने खदान संकट से निपटने के लिए टास्क फोर्स का गठन किया है.

कुछ संबंधित लिंक्स

Washington Post : Food Crisis

Sunday Herald : Articles on Food Crisis

Time Magazine: After The Oil Crisis, a Food Crisis?

पैसा या पावर?

खाने की अहमियत आप तभी समझेंगे जब आपको भूख लगी होगी। यह केवल खाने के साथ नहीं है। किसी भी चीज की अहमियत कोई तभी जानेगा जब उसका अभाव उसे हो

कई दिनों से मैं भी यही जानने की कोशिश कर रहा हूं कि लोगों को क्या पहले चाहिए, पावर या पैसा।

हिंदी भाषी क्षेत्रों में पावर को समझाने और सबझने के लिए लाठी शब्द का प्रयोग किया जाता। लाल बत्ती की चाहत इसी कारण से लोगों में ज्यादा होती है। एक पहर का भूखा इंसान भी पहली बार लाल बत्ती लगी गाड़ी पर बैठता है तो वह अपना भूख भूल जाता है।

लोगों की सीधी सोच बनती है। पावर मिलेगा तो पैसा तो खुद ब खुद मिलने लगेगा। पैसा मिलने के बाद भी पावर कईयों को नहीं मिलता है, यह बात तो सही है। यह हिंदी भाषी मानसिकता है। साथ ही उनके साथ होता है जो शहरीकरण से थोड़े दूर खड़े हैं।

अभाव में जीने वाला इंसान प्रभावित चीजों को लेकर हमेशा फंतासी जैसी चीजें को लेकर बात करता रहता है। अगर मेरे पास पैसा होता तो मैं.. अगर मैं मंत्री होता तो इसका नक्शा ही बदल देता।

खर जो समझने वाली बात है वह है कि पावर और पैसा बनाने वाले किसी ना किसी तरीके से इसे बना ही रहें और अपनी कुंठा शांत कर लेते हैं।

तो अमिताभ बताएं कैसे उत्तर प्रदेश में है जुर्म कम!!?

Amitabh Bachchan

देश की दशा और दिशा बदलने के लिए भारत में दो कानून बने। और सच में दोनों कानून कुछ हद तक अपना काम कर रही हैं। पहला है राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना। दूसरा है सूचना का अधिकार।

दोनों कानून का प्रभाव भरपूर है। एक गरीबों के उत्थान के लिए है, जिसका फर्क तो दिख रहा है लेकिन उतना नहीं जितना होना चाहिए। लेकिन मुझे विश्वास है कि एक दिन इसका असर ताजमहल की चमक की तरह ही दिखेगा। दूसरे कानून का मैं एक क्रांतिकारी कानून की तरह देखता हूं। इससे सभी सरकारी महकमा त्रस्त है। सुप्रीम कोर्ट, प्रधानमंत्री कार्यालय और यूपीएससी ने अर्जी देकर कहा है कि हमें सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत ना लाया जाए। यह है इसका प्रभाव। अच्छी बात यह है कि इसे माना नहीं गया है।

खैर मैं बात कर रहा था सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की, जो क्रिकेट मैचों के ब्रेक के दौरान ठंडा तेल, चाय तो कभी जोड़ों के दर्द का बाम बेचते नजर आते हैं। यही अमिताभ बच्चन सात-आठ महीनों पहले टीवी पर यूपी है दम क्योंकि जुर्म है यहां कम.. कहते नजर आते थे।

भारत का कोई नागरिक सूचना के अधिकार के कानून के तहत यह जानना चाहता है कि..
अमिताभ किस आधार पर यह बात कहते थे?
वह केंद्रीय रिपोर्ट कब की बनी हुई है?
उसमें कौन-कौन से राज्य शामिल हैं?
जुर्म का आधार कब से कब तक का लिया गया है?
और..
इस प्रसारण के लिए अमिताभ को कितना पारिश्रमिक मिला था?

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सब अमिताभ से तत्कालीन उत्तर प्रदेश विकास परिषद के सदस्य होने के नाते पूछा गया है। जवाब 15 अक्टूबर को देना है।

..तो नरेंद्र मोदी इतनी घटिया सोच रखते हैं!!!

Pathan story

गुजरात विकास कर रहा है। विदेशी निवेश के मामले में राज्य सबसे अव्वल है। खूब पैसे आ रहे हैं राज्य में। मेरा अपना मानना हुआ करता था कि गुजराती लोग बड़े अच्छे होते हैं। मीठी जबान, मीठा खान-पान।

लेकिन यह क्या.. भारतीय युवा टीम ने ट्वेंटी20 का पहला विश्व प्रतियोगिता जीता। पूरा का पूरा देश खुशी से झूम रहा है। सभी राज्य अपने खिलाड़ियों को सम्मान और पुरस्कार दे रहें हैं। लेकिन गुजरात के नेतागण कुछ और ही कह रहे हैं।
फाइनल में इरफान पठान की भूमिका के बारे में हम सभी जानते हैं। लेकिन जब पत्रकारों ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रवक्ता से इस बारे में पूछा तो जवाब कुछ यूं था -..यह जीत और जीतों की तरह ही थी। इसमें कुछ नया नहीं था। गुजरात की तरफ से पठान भाइयों को ना कोई सम्मान मिला और ना ही पुरस्कार।

क्या ऐसे होते हैं गुजराती..। यह मोदी के घटिया सोच की परिचायक है। मैं तो यही कह सकता हूं कि बड़ी घटिया सोच रखते हैं नरेंद्र मोदी।

News clipping courtsey: The Indian Express 26 Sep 07

बदलता भारत: टाइम्स आफ इंडिया की तीन खबरें

हमारा भारत विकास कर रहा है। इसको मापने का मीटर सेंसेक्स। जो आज 16000 के पार चला गया। कल यह खबर बिजनेस पेज से निकलकर पहले पन्ने पर आ जाएगी। और रनडाउन में इसकी जगह पहले खबर के रूप में ली जाएगी।

लेकिन आज टाइम्स आफ इंडिया के दिल्ली संस्करण में तीन खबरें इस विकास कर रहे भारत के समाज पर धक्का लगाती है।

पहला, देश के सबसे बड़े निजी बैंक आईसीआईसीआई के लोन रिकवरी एजेंटों ने मुंबई के एक आदमी को इतना परेशान और धमकाया कि वह आत्महत्या करने को मजबूर हो गया। महज 50000 रुपये के लिए।

दूसरा, दिल्ली हाई कोर्ट ने एक लड़के और उसकी पत्नी को अपने बूढ़े माता-पिता को धमकाने के जुर्म में समन जारी किया है।

तीसरा, उड़ीसा की महिला आयोग ने माना है कि राज्य में महिलाएं पुरुषों को प्रताड़ित कर रही हैं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अब तक 38 ऐसे मामले रजिस्टर किए गए हैं।

भारत तेजी से बदल रहा है। विकास की बयार चारों ओर बह रही है। लेकिन इसकी हवा में कुछ तो ऐसा घुल जो हमारे समाज को थोड़ा अस्वस्थ कर जाता है।

काम का दवाब और विकास की होड़ में अच्छे-बुरे को भुलते जा रहे हैं। ग्लोबलाईजेशन में हम अपने दिमाग पर काबू नहीं कर पा रहे हैं। पैसा हमारी सबसे बड़ी जरूरत के रूप में उभर कर आ रहा है। चाहे इसके लिए किसी को कुछ भी करना पड़े।

मीडिया का उदाहरण देकर समझा सकता हूं। अखबार अश्लील तस्वीरों के जरिए अपना सकरुलेशन बढ़ाना चाहता है। टीवी दुष्कर्म के सीन दिखाकर। और इंटरनेट में संता बंता को का होम पेज यह बताने के लिए काफी है कि हम क्या परोस रहे हैं। पैसा..पैसा..और पैसा।

पैसा जरूर कमाइए लेकिन पहले मन की शांति जरूरी है।

विकिपिडिया में हिंदी की स्थिति, हैरान हो जायेंगे!!

Language Language (local) Wiki Articles Depth Total Edits Admins Users Images
35 Telugu తెలుగు te 36 259 3 57 133 179 084 10 3 023 2 444
38 Nepal Bhasa नेपाल भाषा new 31 555 2 48 408 129 175 1 132 36
46  Manipuri বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরী bpy 20 828 3 28 754 151 191 1 107 116
54 Bengali বাংলা bn 16 264 36 61 803 211 828 8 1 471 924
59 Hindi हिन्दी hi 13 526 6 24 047 111 291 12 2 342 815
64 Marathi मराठी mr 11 628 15 27 808 125 592 5 1 528 719
65 Tamil தமிழ் ta 11 515 20 27 665 162 053 13 2 135 2 450

आप पहले इस चार्ट को देख लीजिए। (चार्ट सही से नही दिख रहा है. लेकिन उसमे बोल्ड से लिखे गए नम्बर लेखो की संख्या हैं  )इस 15 सितंबर, 12 बजे दोपहर को कापी किया गया। मैं हैरत में हूं। तेलगू, नेपाली, मणिपुरी और बंगाली हमसे आगे हैं। तेलगू की बात तो समझ में आती है लेकिन नेपाली और मणिपुरी भी..। नेपाली के पास हिंदी के मुकाबले दुगने से भी ज्यादा लेख हैं।

भारत में हिंदी का बाजार अंग्रेजी से लड़ने को तैयार है। लड़ने को क्या हराने को तैयार है। लेकिन विकिपिडिया में हिंदी की यह स्थिति..। क्यों? क्या हिंदी के लेखक केवल आत्ममुग्धता और पैसे के लिए ही लिखते हैं? अगर लिखते हैं तो कुछ गलत नहीं करते लेकिन क्या वह अपनी लेखनी का योगदान कुछ अच्छी चीजों में नहीं दे सकते? अगर नहीं देते हैं तो गलत करते हैं।

ब्लागर्स की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है लेकिन विकिपिडिया के लेखों में नहीं..। आइए हम सब मिल जुल विकिपिडिया में योगदान दें। एक पंक्ति ही सही लेकिन लिखिए..। सब मिलकर लिखेंगे तो हम अन्य विदेशी भाषाओं को भी पीछे छोड़ देंगे।

यह लिंक आपको विकिपीडिया के लेखो के बारे में पूरी डिटेल देगी

मेरे घर के चारों खंभे हिलते हैं!!

मैं जिस घर में पैदा हुआ वही मेरा घर हो गया। मेरा घर मुझे बहुत प्यारा लगता है। यह सबके साथ होता है। इसमें नया कुछ भी नहीं है।

इसके आसपास खूब विकास हो रहा है। मेरे घर में भी विकास हो रहा है। अब मेरा घर सुबह-शाम चमकता रहता है। वैसे तो यह घर बहुत पुराना है। काफी पुराना लेकिन मेरे ‘बापू’ को यह 60 साल पहले मिला था। सो मैं या बाहर के लोग भी इसे 60 साल पुराना ही मानते हैं।

इधर मेरे घर में काफी शोर हो रहा है। मैं थोड़ा परेशान हूं और हो जाता हूं। अपने घर वाले ही घर के अंदर ही शोर मचा रहे हैं। मेरे भाई, मेरी बहन। लेकिन फिर भी ‘बापू’ के संस्कारों से घर सही से चल रहा है।

तो मैं कह रहा था कि मेरे घर के चारो खंभे कभी-कभी हिलते हैं। पता नहीं क्यों? वैसे तो मुझे लगता रहता है कि घर की बनावट में सब कुछ ठीक है लेकिन फिर भी कभी-कभी..।

विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और चौथा प्रेस(यह कभी सबसे मजबूत तो कभी सबसे कमजोर खंभा नजर आता है।)

Indian Parliament

न्यायपालिका रूपी खंभे पर तब थोड़ी कंपन हुई जब कोई आदेश देता है कि गीता को धर्मशास्त्र का दर्जा मिलना चाहिए। मेरे घर का यह सबसे मजबूत खंभा है। अगर इसमें कंपन होती है तो घर में दरकने का खतरा हमेशा बना रहेगा।

विधायिका रूपी खंभा तो कई बार हिला है। तहलका का खुलासा हो, सांसदों के प्रश्न के बदले पैसे मांगने का मामला। जिसे सबसे ज्यादा मजबूत होना चाहिए, वही सबसे ज्यादा कमजोर है। मेरे घर का सबसे ज्यादा बोझ इसे ही वहन करना है।

कार्यपालिका रूपी खंभा को हिलाने के लिए दो-तीन शब्द कहना चाहूंगा। बोफोर्स, झामुमो रिश्वत कांड। इसका काम करने का तरीका थोड़ा ढंका हुआ होता है। हां! आरटीआई के आने से यह जरूर साफ हुआ है।

और अंत में

प्रेस। इसके पास एक कलम है। और आजकल यह कहता फिरता है, पेन इज माइटर दैन शोर्ड। यह दंभी हो रहा है। मेरे पास पावर है। मुझे यह करने की छूट है। मैं यह कर सकता हूं। यह अपना दायित्व भूलता जा रहा है। कैमरे के जरिए अब यह काले काम कर रहा है। अगर यह सशक्त रहा तो मेरा घर हमेशा आबाद रहेगा। इसे अपने दायित्वों को समझना होगा।

मेरे घर के चारो खंभे एक दूसरे के पूरक हैं। इन्हें मिलकर काम करना होगा। तभी हमारा भारत महान हो पाएगा।