मैं और पेड़

अपने आस पास के पेड़ो को देखकर कई बार कुछ सोचता हूं। कैसे कैसे पेड़। उन्हीं पेड़ों की प्रकृति और मेरी प्रकृति की घालमेल है यह कविता…

cactus and desert

मैं पीपल बनना नहीं चाहता,
बड़ा ही सामंती पेड़ है।
औरों को बढ़ने ही नहीं देता।

मैं बोंस्आई की किस्म बनाना भी नहीं चाहता,
चाहता हूं कि प्रकृति ने जिसे जो दिया वह उसे मिले
अपनी बांहे फैलाएं, वह टहनियां, जिसे विज्ञान रोकता है।

मैं कैक्टस बनना चाहता हूं,
कम संसाधन में अपनी जिंदगी को जिऊं
रेगिस्तान में लोगों को आशातीत करता रहूं , जिंदगी यहां भी संभव हैं।

आफिस में काम करने का ढोंग

एमएनसी कंपनियों में काम करने वाले लोग इसे ओपन कम्यूनिकेशन का नाम दे रहें हैं। आफिस में काम करने का ढोंग, एक नया काम बनकर उभर रहा है। हर एक आफिस में आपको कुछ लोग मिलेंगे जो यह काम बखूबी कर रहें हैं। आपको नाम याद आ रहे होंगे। मोनिका, बबिता, गौरव, विकास.. कई सारे नाम आपके दिमा में आ रहे होंगे। आफिस से निकलकर अपने आप को समझदार समझते हैं। गोली दे दिया। ऐसा कुछ भाव लेकर, हंसते-हंसते आफिस से निकलते हैं।

छोटे-छोटे केबिन नुमा आफिस। एक के बगल में दूसरा कंप्यूटर और दूसरे के बगल में तीसरा। कुछ के हिस्से में काम बढ़ गया है। जिनके हिस्से काम बढ़ा है वह सच में काम करते हैं। और कुछ काम का ढोंग करते हैं। उनका काम ही ढोंग करना है। देखकर मालूम होगा कि फलां साहब बहुत काम करते हैं। आठ घंटे की रिपोर्ट मांग ली जाए तो आडवाणी के भाषण की तरह नतीजा निकलेगा सिफर। (आडवाणी जी बोलते ज्यादा हैं, मतलब कम होता है। वाजपेयी जी बोलते कम हैं, मतलब बहुत होते हैं।)

boss and officeआफिस में आने का टाइम और जाने के टाइम दोनो को बीट कर देते हैं। आते लेट से हैं और जाते जल्दी हैं। बास के आने पर सबसे पहले अदब से खड़े होते हैं। टाइम ग्रीट करते हैं। और सामने वाले को कहते हैं, इसको ऐसे कर देना..।

आह.. क्या अंदाज ए बयां है। बास भी कुछ नहीं बोलता है, लेकिन हर बात समझ जाता है। बास बिना कुछ बोले आगे बढ़ जाता है। मैं भी कुछ नहीं बोलूंगा। रेस्ट यू आल नो बेटर..।

झूठ बोलतीं हैं महिलाएं..

हां, यही सच है, अधिकांश महिलाएं झूठ ही बोलती हैं। साथ में शराब भी पीती हैं, कपड़े भी भड़काऊ पहनती हैं और झूठ भी बोलती हैं।

यही कहा जा रहा है ब्रिटेन में। एक रिपोर्ट के मुताबिक बलात्कार के 100 मामले में केवल 5 मामले में आरोपी दोषी साबित हो पाता है। इसकेउलट महिलाओं पर इल्जाम लगता है कि वह बलात्कार को लेकर झूठ बोलती हैं।

यह वही ब्रिटेन है, जहां के कानून पूरे विश्व के कानून को एक दिशा देता है। वकील और जज वहां के केस की स्टडी करते हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन में हर साल बलात्कार के 14000 मामले सामने आते हैं, जिसमें से हर 20 में से 19 आरोपी रिहा हो जाते हैं।

इसके पीछे कैसी-कैसी दलील दी जाती हैं, जरा गौर फरमाएं:
बलात्कार का कोई चश्मदीद नहीं होता है।
किसी भी क्लोज शर्किट कैमरे में कोई तस्वीर नहीं मिलती।
लड़की खुद नशे में होती है।

यह कोर्ट में कही जाती हैं, जो बाहर कही जाती हैं, कुछ स्टीरियोटाईप ही है

लड़की ने भड़काऊ कपड़े पहने हुए थे।
लड़की ने उत्तेजित किया था।
उसपर से यह बात कही जाती है कि बढ़ते हुए बलात्कार के केस को देखते हुए छेड़छाड़ और ऐसी ही घटनाओं पर पुलिस ज्यादा तवज्जो नहीं देती।

नोट: मैने जो कुछ भी लिखा है, वह न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट और वाल स्टीर्ट जर्नल पर लिखे गए एक ब्लाग को पढ़कर लिखा है।

शहर का सहरा बनना

metro citiesसहरा काट कर शहर बना
लेकिन…
हंसी है लेकिन बनावटी
बातें हैं लेकिन बतकही नही
दोस्त हैं लेकिन मतलबी
अपने हैं लेकिन अपनापन नही

यही मिजाज है शहर का. यह शहर नही सहरा होता जा रहा है

रवीश को पढने के बाद ये ख्याल आए सो उंगलिया चल निकली

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सहरा: जंगल

हिंदी और अंग्रेजी के सोच का फर्क

अगर यह बात कही जा रही है तो मुमकिन है इसमें सच्चाई होगी। अगर होगी तो मैं कुछ कहना चाहता हूं। पहले मैं केवल यह मान लेता (स्कूल में गणित के सवालों का जवाब देने के क्रम में कुछ तो मानते होंगे, बस यह इसी प्रकार का मानना है)हूं कि हिंदी वालों के पास पैसे कम होते है। सोच भी प्रोग्रेसिव नहीं होती। छोटी-छोटी बातों को भी ऐसे पकड़ते हैं जैसे पैसे को दांत से पकड़ा जाता हो।

इसी के ठीक उलट यह मान लेता हूं कि अंग्रेजी वालों के पास पैसा होता है। सोच से प्रोग्रसिव होते हैं। हर छोटी बातों को नहीं पकड़ते।

अगर यह सब हिंदी और अंग्रेजी वालों की सोच में है तो क्या होगा? जरा मजमून पेश करता हूं।

- हिंदी
सबसे पहले तो वह पैसा कमाना चाहेंगे। इसके लिए कुछ काम करेंगे, कुछ मक्खन बाजी, कुछ के अपने उसूल होंगे इन सब के बीच उनकी प्राथमिकता पैसा कमाना ही होगी। येन, केन प्रकारेण।

प्रोग्रेसिव से मेरा सीधा मतलब है कि समय के अनुसार वह नहीं बदलना चाहते। माता-पिता को डैड बोलने पर कहेंगे आजकल के लड़के-लड़कियां पिता को डैड तो कभी डेड कहते हैं। डैड बोलने में दिक्कत क्या है, मुझे समझ नहीं आता। 90 के दशक में जो जींस पहनते थे, उनके बारे में कहा जाता था, लड़का जींस पहनता है(आज वह खुद या उनके बच्चे पहनते होंगे)। इतना बताने के बाद शायद मैं ठीक से समझा पाऊं कि नई चीज को आत्मसात करने में इन्हें दिक्कत होती है। मतलब यह प्रोग्रसिव नहीं होते।

छोटी बात को पकड़ते हैं से मेरा मतलब है, टीवी के एक रियलिटी शो में मलाईका अरोड़ा माइक्रो मिनी पहन कर आती है तो कुछ दोस्त इसी बारे में बात करते हैं कि यार देखो यह छोटे कपड़े पहन कर आती है। और बात आगे बढ़ते हुए मस्त और सेक्सी तक पहुंच जाती है। और उसके बाद बातों ही बातों में बलात्कार भी। ऐसा होता है। हमारे आपके सभी के बीच।

- अंग्रेजी

पैसा तो इनके पास होता ही है तो इस बारे में इनका ख्याल प्राथमिक रूप में नहीं होता है। इनकी स्थिति उसे बढ़ाने को लेकर ही होती।
इनका ध्यान सड़क पर चल रहे कुत्तों की मारपीट में घायल एक कुत्ते पर होता है (मनुष्य मदद मांगे तो शायद नहीं दे पाएं, कुत्तों को देते हैं।)

इन्हें नई चीजों को करने में तकलीफ नहीं होती। खाने से लेकर शराब तक। हर नई चीज के यह दीवाने होते है। आफिस का कपड़ा काफी सलीके का होता है लेकिन जब अपनी सोच पर आएं तो औड चीज को यह पहले अपनाते हैं।

जाति और धर्म को लेकर तो ये भी संवेदनशील होते हैं। लेकिन इनमें कास्ट से ज्यादा क्लास को लेकर फीलिंग होती है। अगर अदर कास्ट वाला भी सेम क्लास का हुआ तो फिर चलेगा। बालीवुड इसका अच्छा उदाहरण है। यहां केवल क्लास की पूछ होती है, कास्ट तो इनके लिए कोई मैटर ही नहीं है।

मैं यह नही कहता की इससे अलग सोच वाले लोग दोनों गुटों में नही होते हैं. बेशक होते हैं. लेकिन बहुतायत इन्ही की है

याद दिलाना मुनासिब समझता हूं कि हम मान रहे हैं। सच्चाई यह नहीं है, या सच्चाई भी यही है.. आप बताएं?

कुछ स्टीरियोटाईप सोच: अंतिम भाग

पिछली पोस्ट में बेंगाणी जी ने कहा कि यह अपवाद हैं। उनके इस बात पर केवल इतना कहूंगा कि अपवाद उनके दिमाग में हैं। या अगर वह किस्मत को मानते हैं तो किस्मत के खोटे हैं, जिन्हें ऐसे लोग नहीं मिले। मैं किस्मत को नहीं मानता, कर्म को मानता हूं। मुझे ऐसे लोग मिले हैं।

खर, बात आगे बढ़ायी जाए।

चैत्र महीना में जेठ जैसी गर्मी पड़ रही थी। बाइक पर चलता हुआ मनोरंजन पूर्वी दिल्ली के विकास मार्ग पर 50 की स्पीड से गाड़ी चला रहा था। और तभी उसकी बाईक हुडुक हुडुक के साथ हिचकोले खाई। उसे पता चल गया पेट्रोल खत्म होने वाला है। मुश्किल से अब वह और एक किलोमीटर गाड़ी से जा सकता था। एक्सीलेरेटर पर उसका पंजा थोड़ा और तेज हुआ। लेकिन गाड़ी बंद हो गई थी। एक्सीलेरेटर ने आपना काम करना बंद कर दिया था। थोड़े देर बाद ही गाड़ी ने अपनी गति भी खो दी। मनोरंजन गाड़ी में बैठे हुए ही अपने पैर से धक्का दे गाड़ी को आगे बढ़ा रहा था। तभी पीछे से एक वर्दीधारी ने बाइक में चलते हुए अपने बाएं पैर से मनोरंजन की बाइक को धक्का देना शुरू किया। उसने बिना कहे पेट्रोल पंप तक उसकी गाड़ी को धक्का दिया।

मनोरंजन को सहज यह एहसास नहीं हो रहा था कि एक पुलिस वाले ने ऐसा किया। कई बार सड़क पर अपनी गाड़ी को धक्का दे रहे लोगों के पास से तो मनोरंजन भी गुजरा था। लेकिन उसने यह जहमत कभी नहीं उठाई थी।

पुलिस भी अच्छा सोचते हैं और हमारी आपकी तरह खराब और अच्छे भी हो सकते है।

लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुघर्टना के बाद इसकी जिम्मेदारी लेते हुए अपना इस्तीफा सौंप दिया था। फिर एक और जमाना आया जब टाइम्स आफ इंडिया के आर के नारायणण ने एक काटरून में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री के बारे में काटरून बनाया। सुखराम अपने आफिस में बैठे हुए थे। चारों तरफ रुपये बिखरा हुआ था। अलमारी में, टेबल पर, फर्श पर, फाइलों के उपर-नीचे, हर जगह। सुखराम अपनी सीट में बैठे हुए कहते हैं, अरे कोई है जो मुझे एक सफेद प्लेन कागज दे, जिससे मैं यह बता सकूं कि मैं निदरेष हूं। झारखंड के रामगढ़ जिला के एक स्थानीय नेता ने एक लड़के को पढ़ाने का पूरा जिम्मा लिया हुआ है।

नेता ईमानदार भी होते हैं और भ्रष्ट भी।

महिलाएं बोलती हैं ठीक उसी तरीके से जैसे मर्द बोलते हैं ज्यादा।

मुझे किसी आजकल के लड़के ने कहा कि आजकल की लड़कियां मोबाइल पर बात ही करती रहती हैं। जब देखो मोबाइल। मैंने उससे कहा क्या बता सकते हो किससे बात करती हैं, उसने कहा लड़के से। मैंने कहा फिर तो आजकल के लड़के भी जब देखो मोबाइल पर ही बात करते रहते होंगे।

यह सब हमारे आपके कुछ स्टीरियोटाइप सोच हैं। इसी स्टीरियोटाईप से बाहर निकलिए। किसी पूर्वाग्रह में हो कर चीजों को मत देखिए।

कास्मोपोलिटन

..ओ रियली।

अग्रेंजी कृपाल की विचार भाष नहीं थी लेकिन उसके टीचर ने उसे यही कहा था कि ट्राई टू स्पीक इन इंग्लिश।

यस आई हैव एन एप्पल आई पाड, शोभन ने कहा

व्हाएट इज द कोस्ट? कृपाल ने टीचर को याद करते हुए कहा।

हंड्रेड एंड थट्री एट यूएसडी।

यूएसडी!!! व्आहट डस इट मीन?

यूएस डालर!!!

कृपाल को नए गजेट्स का जानने का शौक था और उससे ज्यादा अंग्रेजी बोलने का।

अंग्रेजी तो वह बोलता था लेकिन यह उसका थाउट प्रोसेस लैंग्वेज नहीं था। कभी-कभी वह, ही डोंट नो भी बोल जाता था, फिर मन में ही उसे एक बार दोहराता, ही डोंट नो नहीं ही डस नौट नो, डस!!!

उत्तर प्रदेश के मुगलसराय शहर से 40 किमी पश्चिम में उसका गांव था, था इसलिए क्योंकि वह अपने पिता के साथा जालंधर में रहता है। अपने दोस्तों को भी उसे यह बताना पसंद नहीं है कि वह उत्तर प्रदेश का है।

हां!! एक बार जब वह दिल्ली आने के लिए बस से सफर कर रहा था तो कुछ अजनबियों से मुगलसराय स्टेशन की बातें सुन रहा था, तो उसे लगा कि वह कह दे कि मैं तो मुगलसराय का हूं।

पंजाबी तो वह फर्राटेदार बोलता है। कृपाल जब भी यह फर्राटा शब्द सुनता उसे अखबार की एक शीषर्क और कई लिखी बातें याद आने लगती..

लूटेरे ने दो को लूटा
..फर्राटेदार अंग्रेजी और स्पेनिश बोलने वाले लूटेरे ने नशीला खाना खिलाकर दो लोगों से नकदी व जेवर लूटे।

अपनी ही धुन में खोया रहने वाला कृपाल कई लोगों से प्रभावित हो जाता।

सड़क पर मर्सीडीज बेंज देखने के बाद मन में दोहराता, मर्सीडीज बेंज। दिल्ली आता तो वरसांचे का शो रूम के बाहर थोड़ा देर रूककर उसे निहारता, फिर आगे बढ़ता।
क्रमश:

प्रेमी का गुड मार्निग और गुड नाइट

कितना सुखद। कितना अच्छा। देश, काल, परिस्थिति इन सब से ऊपर। प्रेमी का गुड मार्निग और गुड नाइट कहना।

पिछले तीन साल से अकेले रह रहा था। अभी हफ्ते दिन पहले कमरा बदला है। तीन और लोग साथ में हैं, जिनमें मैं केवल एक को जानता हूं बाकी दो उसी के दोस्त हैं। खर मुझे वहां अपने को वहां ढालने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। मेरे दोस्त मुझे टमाटर बुलाते हैं कहीं भी घुल मिल जाने वाला।

यह तो मैं पहले से ही जानता हूं कि भारतीयों के पास खाली समय काफी होता है। क्रिकेट, तीन घंटे की फिल्म, फोन पर लंबी-लंबी बातें, एक डमरू की आवाज में मजमा लगा देना मेरे विश्वास को हमेशा से बढ़ाता रहा है।

खर मैं बात कर रहा था साथ रहने वाले एक की जिसे मैं अपना दोस्त कह ही सकता हूं। देर रात तक फोन पर बात करना और गुड नाइट के साथ बिस्तर पर आफिस की थकान मिटाने के लिए लेट जाना। और फिर लेट से उठना (जिसे हमेशा वह जल्दी कहता है) आठ बजे तक। एक बार फिर अपने पहलू में रखे मोबाइल को देखता और एक गुड मार्निग का मैसेज करता हुआ उठता।

इन सब से बेफिक्र मैं भी यही सोचता हूं कि अच्छा है कि उसकी सुबह और रात तो अच्छी होती है।

वैसे तो यह उसके निजी जिंदगी में मेरा ताकना झांकना कहा जा सकता है लेकिन मैं ऐसा करना नहीं चाहता और ना ही मुझे पसंद है। इन सबके बावजूद मुझे यह चाहते, ना चाहते हुए भी यह पता चलता रहता है सो बिना नाम लिखे मैंने इसे लिख दिया। आशा है कि इससे उसे बुरा नहीं लगेगा।

आतंकवाद से बड़ा खतरा है समलैंगिकता

अब यह कितना बड़ा खतरा है इसका केवल अंदाजा भर लगाया जा सकता है। लेकिन अंदाजा लगाने का पैमाना क्या हो, इस पर थोड़ी जिरह हो सकती है।

किसी ने कहा है कि किसी देश को बरबाद करना हो तो वहां के युवा वर्ग को बरबाद कर दो देश खुद ब खुद बरबाद हो जाएगा।

बात हो रही है समलैंगिकता की। अमेरिका में ओकलाहोमा सिटी की रिपब्लिकन सैली कर्न ने कहा कि अमेरिका के लिए आतंकवाद और इस्लाम से भी बड़ा खतरा समलैंगिकता है।

क्या यह खतरा है? अगर यह खतरा है तो क्या सचमुच इतना बड़ा खतरा है?

समलैंगिकों को मानना है कि यह एक तरीके की आजादी है। अगर हम आजाद हैं तो हमारी अपनी आजादी भी होनी चाहिए। हम चाहें जिसके साथ चाहें रहें, सरकार को इसमें कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।

सरकार का कहना है कि यह प्रकृति के खिलाफ इसलिए इसका कोई आधार नहीं है और यह अवैध है।

सरकार और समलैंगिकों की इस लड़ाई के बीच 2001 में सबसे पहले नीदरलैंड ने समलैंगिकों के विवाह को कानूनी मान्यता दी। उसके बाद बेल्जियम, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, और स्पेन ने भी समलैंगिकों के आगे घुटने टेके। अमेरिका में यह लड़ाई 50 राज्यों में लड़ी जा रही है। कई राज्यों में मान्यता मिल चुकी है और कई इस ओर अग्रसर हैं।

भारत में इसका प्रभाव समाज के हर क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। फिल्में बन रही हैं, विश्वविद्यालयों में बहस कराए जा रहे हैं, किताबें लिखी जा रहीं हैं।

अभी तक भारत में इसके आभास भर से दोस्त यार फब्तियां कसते नजर आते हैं। मुझे नहीं पता कि यह इसके होने से भारत का युवा वर्ग कब गर्व करने लगेगा। इसके एहसास से ही एक कंपन सी होती है। मेरी निजी राय के मुताबिक मैं इसका विरोध तो नहीं कर सकता लेकिन इसको प्रोत्साहन कभी नहीं दूंगा।

इंटरनेट यूजर हैं और एटीएम से डीटेल निकालते हैं..

..गलत बात है। यह बात मुझे कल समझ में आई। अपने सारे बैंक डिटेल मैं नेटबैंकिंग से देख सकता हूं लेकिन फिर भी..। एटीएम से जब भी पैसे निकालने जाता हूं पैसे के साथ उसका डिटेल स्लीप के लिए यस बटन पर भी क्लिक करता हूं। क्यों? इन आदतों से हमें आपको निकलना होगा। कागज के खर्च को कम करना होगा। पर्यावरण बचाना होगा।