विज्ञापन में औकात की बात

मनोविज्ञान की एक थ्योरी है। आप किसी इंसान की आइडेंटिटी पर कुठाराघात करेंगे और वह अपना आपा खो बैठेगा। दो विज्ञापनों हैं, जो इसी मनोविज्ञान को कैश करने के लिए बनाए गए हैं।

पहला है, बिग बाजार का। लड़की का सामान गिरता है, लड़का उसकी मदद करता है। उसके बाद वह चलने को होता है तो उसके मोबाइल की घंटी बजती है। लड़की उसे कहती, चोर कहती। लड़का कहता है, मेरा है। लड़की कहती है, उसके पहनावे को देखकर कहती है औकात है तुम्हारी।

दूसरा है, यू टीवी का चैनल बिंदास पर आने वाला सीरियल चैम्प की। इसका प्रिंट एड है। कहता है, औकात है तो आगे निकल कर दिखाओ।

बचपन के दिनों से मैं लोगों को सुनता आया हूं। अपने औकात में रहो। जैसे ही कोई इसको कहता, दूसरा बिफर पड़ता। औकात का सीधा मतलब लोग पैसे से लेते हैं। और इन दोनों में पहला विज्ञापन पैसे को लेकर है तो दूसरा इगो को लेकर..। ज्यादातर युवा अपने दूसरे दोस्त से पीछे नहीं रहना चाहते।

मोनिट्री एंड इगो (पैसा और दंभ) का कोम्बिनेशन है यह औकात। इसे लेकर कंपनियां भी कुछ माल बटोरना चाहती हैं।

आलोचना की स्वतंत्रता

thumb up and down

कुछ इसे साहित्यिक, कुछ किताबी, कुछ फितूर भी कह सकते हैं। मेरा एक जिगरी यार इसे थ्योरिटिकल कहता है। कहता है, थ्योरी के लिए ठी क है, प्रैक्टिकल का भान नहीं है तुम्हें..

मैंने कहा झूठ बोलना बुरी बात है लेकिन कई बार लोग झूठ इसलिए बोलते हैं क्योंकि वह प्रैक्टिकल है। मैं भी इसे सही मानता हूं। और आलोचना की स्वतंत्रता को भी.. प्रैक्टिकल रूप में..।

आलोचना की स्वतंत्रता की एक खास बात यह है कि इसमें आलोचना करने वाला से खास आलोचना सुनने वाला होता है। अपनी आलोचना..। भई सीधी सी बात है, एकदम सीधी.. आपकी आलोचना तभी कोई करेगा जब उसे कुछ दिखेगा। आलोचना करने वाला कौन है? उसका आलोचना करने का ढंग क्या है? ..भाषा क्या है? ..लहजा क्या है?
नासमझ है। ..एक सीमा तक आप उसे इग्नोर कीजिए।
अनजाना है। ..एक सीमा तक आप उसे इग्नोर कीजिए।
परीचित है और समझदार है। ..गौर कीजिए, उसके सामने अपने आपको रखिए। तर्क दीजिए। समझाइए।

निंदक नीयरे राखिये, आंगन कुटी छबाये..

हर इंसान अपने समझ को जानता है (कई बार नहीं भी जानता है)। आप अपनी आलोचना सुन नहीं सकते तो समझिए कमी कहीं आपके अंदर ही है। सामने वाले को इतना स्पेस आप दें कि वह आपको ना भी कह सके। आप के गलत को ना कहने में वह झिझके ना।

मैं अपने ब्लाग में माडरेशन नहीं रखता। ना रखना चाहता हूं। कई बार लोगों ने बुरा कहा.. कभी खुलकर, ज्यादातर बेनामी। मैं उनसे अपने पाठकों, मित्रों से निवेदन करता हूं कि आलोचना करें.. तो खुलकर करें। मुझे आप अपने तर्क से सहमत कर दें। मैं सहज रूप से आपकी बात मानने को तैयार हो जाऊंगा।

आलोचना की स्वतंत्रता का मैं पक्षधर हूं। लोग हों ना हों..

कुर्सी वाला, जोंक हो जाता है!

चोल, चेर और पाण्डय
मुगल भी आपस में लड़ पड़े
देशी क्या विदेशी भी

इतिहास की बात छोडि़ए
आजकल तो आफिस में भी
कुर्सी की भीषण लड़ाई हो रही…

आजकल सभी,
जोंक होने की चाहत रखते हैं
क्योंकि कुर्सी वाला, जोंक हो जाता है

किसकी और क्या है दिल्ली!

पिछले सात सालों से दिल्ली में रह रहा हूं, इसके साथ 27 साल की उम्र की समझ के साथ जो दिल्ली को देखा, सुना, पढ़ा, उसी मुतालिक कुछ पंक्तियां जोड़ने की कोशिश..

लुटियंस से लेकर केपी सिंह तक..
कितनों ने बनाया और कईयों ने लूटा..
दिल्ली ही घर है..

देश के अलग अलग हिस्सों से आए
उन 750 सांसदों की,
जिन्होंने देश को देने से ज्यादा इससे लिया है

सुप्रीम कोर्ट में हक के लिए लड़ने आए
देश के कई लोगों की भी..
जो लूटे होते हैं और देश का कानून उन्हें और लूट लेता है

थोड़ा व्याकुल, थोड़ा उत्साहित
रोजगार के लिए गांव से आने वाले उस युवक की भी
जो अभी ट्रेन में बैठा भी नहीं है

चौड़े सड़क पर झूम कर चलने वाले
उन नौजवानों की भी
जो वीकेएंड में अखबार का हिस्सा बन जाते हैं

कुकुरमुत्ते की तरह खुले पत्रकारिता में पढ़ने वाले
युवा पत्रकार से लेकर वरिष्ठ पत्रकारों की भी
जो सीवी, फोन और मुलाकात का सिलसिला नहीं छोड़ते

ब्लू लाईन, व्हाइट लाइन, मुद्रिका और बाहरी मुद्रिका
आफिस से परेशान उन लाखों यात्री की भी
जो जवानी का आधा हिस्सा बस में गुजार देते हैं

नार्थ कैम्पस, साउथ कैम्पस और मुखर्जी नगर
पढ़ने आए उन छात्रों की भी
जिनके हाथों में फरवरी में सुर्ख लाल गुलाब नजर आते हैं

एम्स, अपोलो और सफदरजंग आने वाले
बीमार और उन तीमारदारों की भी
जिन्हें खुशियां तो, कभी गम ज्यादा मिलते हैं

बाकि बचे हम साधारण लोग

काम से छूटे
किराए घर में आए
कुंवारा खाने की, विवाहित अन्य परेशानियों में
लग जाता है..
रात को देर से सोना
..फैशन मान लिया जाता है।
कंम्प्यूटर और लैपटाप में खिटिर फिटिर के बाद
पांच बाई साढ़े छ: के बिस्तर में
..आठ बजे जल्दी उठ जाते हैं।
कई रिपोर्ट और कई लेखनी
दिलवालों से लेकर, संवेदनाओं से मरा हुआ
र्ईट और गारे से भरा हुआ
शहर बता चुके हैं।
लोगों कहते हैं..
दिल्ली का मौसम, अपना नहीं है
राजस्थान इसे गर्मी और हिमाचल सर्दी दे जाता है

नेताओं ने इस बात को सुनकर
पूरी दिल्ली को ही शंघाई बनाने का फैसला किया
करोड़ों खर्च किए
सफर, आस्था और जज्बा बढ़ाने वाले
मेट्रो, मंदिर और खेल गांव बनवाए

दिल्ली का दिल धड़कता है-

नेता, आरोपी बेरोजगार और नौजवानों में
पिछे नहीं हैं छात्र, पत्रकार और बीमार

इंडिया गेट, लाल किला, कुतुब मीनार
जनपथ, मोनेस्ट्री और पालिका बाजार
यही है यहां की पहचान
इसी से बढ़ती है दिल्ली की शान

विचारों के ताने-बाने

puzzle

कितना शोर है
चारो ओर
मेरे विचार भी उलझने लगते हैं,
इन सब में।

सुलझाना जो चाहता हूं, मैं इनको
कोई एक और विचार आ जाता है
सुलझने नहीं देता
मेरे विचारों को

आह!! करके जो मैंने छोड़ दिया
अपने विचारों को,
सुलझने लगे यह खुद ब खुद…

मैं और पेड़

अपने आस पास के पेड़ो को देखकर कई बार कुछ सोचता हूं। कैसे कैसे पेड़। उन्हीं पेड़ों की प्रकृति और मेरी प्रकृति की घालमेल है यह कविता…

cactus and desert

मैं पीपल बनना नहीं चाहता,
बड़ा ही सामंती पेड़ है।
औरों को बढ़ने ही नहीं देता।

मैं बोंस्आई की किस्म बनाना भी नहीं चाहता,
चाहता हूं कि प्रकृति ने जिसे जो दिया वह उसे मिले
अपनी बांहे फैलाएं, वह टहनियां, जिसे विज्ञान रोकता है।

मैं कैक्टस बनना चाहता हूं,
कम संसाधन में अपनी जिंदगी को जिऊं
रेगिस्तान में लोगों को आशातीत करता रहूं , जिंदगी यहां भी संभव हैं।

अगर चित्र कुछ बोलती है तो यह भी कुछ बोल रही है की जमाना बदल गया है

IPC section 489Aयह चित्र किस बारे में है यह समझ गए होंगे जो नही समझ पा रहे हैं वो माउस को फोटो के ऊपर ले जाए फोटो का जिस नाम से सेव किया गया है या एड्रेस बार में इसको देखे. इसके बारे में जानने की कोशिश करे. बड़ा भयावह है यह कानून जब इसका ग़लत उपयोग होता है.

यह चित्र पूर्वी दिल्ली के यमुना पुल को पार करने के बाद शकरपुर की पुलिस चौकी के सामने से लिया गया.

आफिस में काम करने का ढोंग

एमएनसी कंपनियों में काम करने वाले लोग इसे ओपन कम्यूनिकेशन का नाम दे रहें हैं। आफिस में काम करने का ढोंग, एक नया काम बनकर उभर रहा है। हर एक आफिस में आपको कुछ लोग मिलेंगे जो यह काम बखूबी कर रहें हैं। आपको नाम याद आ रहे होंगे। मोनिका, बबिता, गौरव, विकास.. कई सारे नाम आपके दिमा में आ रहे होंगे। आफिस से निकलकर अपने आप को समझदार समझते हैं। गोली दे दिया। ऐसा कुछ भाव लेकर, हंसते-हंसते आफिस से निकलते हैं।

छोटे-छोटे केबिन नुमा आफिस। एक के बगल में दूसरा कंप्यूटर और दूसरे के बगल में तीसरा। कुछ के हिस्से में काम बढ़ गया है। जिनके हिस्से काम बढ़ा है वह सच में काम करते हैं। और कुछ काम का ढोंग करते हैं। उनका काम ही ढोंग करना है। देखकर मालूम होगा कि फलां साहब बहुत काम करते हैं। आठ घंटे की रिपोर्ट मांग ली जाए तो आडवाणी के भाषण की तरह नतीजा निकलेगा सिफर। (आडवाणी जी बोलते ज्यादा हैं, मतलब कम होता है। वाजपेयी जी बोलते कम हैं, मतलब बहुत होते हैं।)

boss and officeआफिस में आने का टाइम और जाने के टाइम दोनो को बीट कर देते हैं। आते लेट से हैं और जाते जल्दी हैं। बास के आने पर सबसे पहले अदब से खड़े होते हैं। टाइम ग्रीट करते हैं। और सामने वाले को कहते हैं, इसको ऐसे कर देना..।

आह.. क्या अंदाज ए बयां है। बास भी कुछ नहीं बोलता है, लेकिन हर बात समझ जाता है। बास बिना कुछ बोले आगे बढ़ जाता है। मैं भी कुछ नहीं बोलूंगा। रेस्ट यू आल नो बेटर..।

स्वाद और भूख

पहला दृश्य…

पेट तो भरा हुआ था लेकिन कुछ स्वादिष्ट खाने की इच्छा हो रही थी. पहले का आर्डर किया हुआ खतम भी नही हुआ था. पूरे एक हफ्ते बाद बाहर खाना खाने आए थे. आइसक्रीम का आर्डर दिया गया. वो भी पुरा खत्म नही हुआ. …और अंत में बचा हुआ खाना वेटर उठा कर ले गया

दूसरा दृश्य…

उसी होटल के बाहर से रात को गुजर रहा था. वेटर बचे हुए खाने की बड़ी पालीथीन फेंकने जा रहे थे. कोने पर बैठा हुआ इंसान ताक में था. वेटर ने खाना कोने में बिखेर दिया. दूसरे कोने में बैठा इंसान देखता रहा. वेटर गए और वह से खाना चुनकर वही से उठाये एक पेपर प्लेट में डाल खाने लगा.

शहर का सहरा बनना

metro citiesसहरा काट कर शहर बना
लेकिन…
हंसी है लेकिन बनावटी
बातें हैं लेकिन बतकही नही
दोस्त हैं लेकिन मतलबी
अपने हैं लेकिन अपनापन नही

यही मिजाज है शहर का. यह शहर नही सहरा होता जा रहा है

रवीश को पढने के बाद ये ख्याल आए सो उंगलिया चल निकली

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सहरा: जंगल