कई बार बदल देती है यह.. जिंदगी भी

frozen emotions

उस नमक को भी खरोंचा था
बड़ा मीठा सा स्वाद था
जो आज भी है तुम्हारे.. चेहरे पर

कितना खरचा था
और ना जाने कितना खरच होगा
तेरी याद में मेरे.. आंसू

सालती है
वह हंसी और खुशी
जब अब मिली.. जुदाई

कि अब हमने सीखा
मौसम बदलने का मतलब
कई बार बदल देती है यह.. जिंदगी भी

समाज का डर

dark societyभूत-प्रेत से बड़ा है यह डर। कोई काला जादू नहीं लेकिन डर है कि लोग फुसफुसाते हुए भी डरते हैं। यह समाज का डर है। इससे डरते सभी लोग है। इसका मंतर अभी कम लोग सीख पाए हैं। सो डरते रहते हैं। कुछ सीख रहे हैं, कुछ सीखेंगे। धीरे-धीरे..।

उसकी बेटी ने प्रेम विवाह कर लिया।
उसके घर लड़का आता है।

यह फुसफुसहाट है। समाज के अंदर समाज के लोगों की ही। समाज में मान और शान की इतनी फिक्र होती है कि लोग समाज से डरने लगते हैं। किसी घर की लड़की अपनी दादी की मौत में श्मशान घाट जाना चाहती है। चली भी जाती है। और उसके बाद शुरू होता है समाज की फुसफुसाहट..। उसकी लड़की…

मुझे याद है जब मैंने अपना मूंछ साफ कर लिया था। डर तो मेरे अंदर भी था, समाज का। कौन, क्या-क्या बोलेंगे? घर वालों ने कुछ नहीं कहा। मां, पापा, भईया, दीदी किसी ने नहीं। एक पिता के दोस्त ने गौर से पहले देखा..। एक बुजुर्ग मेरे दूर के दादा जी लगते थे, कहा.. इतना पढ़ने के बाद भी तुमलोगों को जब यह ज्ञान नहीं है, तो हमलोग कैसे सिखाएंगे! मैं समाज के डर से चुप रहा। कुछ भी तो नहीं बोला था मैंने।

समाज का डर कई रूप में सामने आता है, कई रूप में आता रहेगा। समाज जरूरी है, कहीं बिखर ना जाए इसलिए इस समाज के डर को करीने से तोड़ने की जरूरत है।

जाने तू.. या जाने ना

मेरे 29 साल के दोस्त ने फिल्म देखने के बाद कहा, फिल्म अच्छी है लेकिन हमारे उम्र की नहीं है। सोचा मैं भी देख आऊं। कल का दिन मेरा छुट्टी का दिन होता है। टिकट ली और हो आया जाने तू..या जाने ना।

वो क्या कहते हैं कालेज गोअर्स की फिल्म है। सब यंग यंग। लगेगा देखने के बाद कहूं, क्या मस्त फिल्म बनाई है! फिल्म स्टोरी टेलिंग के जरिए आगे बढ़ती रहती है। फिल्म की अभिनेत्री जिनेलिया की पहली हिन्दी फिल्म तुझे मेरी कसम, जो रितेश देशमुख की पहली फिल्म से मिलती जुलती है।

छ: दोस्तों का एक समूह। जिसे हीरो और हीरोइन दोस्त हैं लेकिन उन्हें प्यार नहीं है। सूरज बड़जात्या की ब्लाकब्लस्टर फिल्म मैंने प्यार किया का एक डायलाग मेरे दिमाग में आ जाता है, एक लड़की और एक लड़का कभी केवल दोस्त नहीं रह सकते।

आमिर खान की पहली फिल्म कयामत से कयामत तक का लुक भी देखने को मिलेगा। हीरो ठाकुर है। राजस्थान के रांजौर इलाके का राठौर। जय सिंह राठौर(इमरान खान)। और हीरोइन करोड़पति बाप की अकेली लड़की। इस फिल्म में परिवार किसी भी चीज की मनाही नहीं करता है। किसी भी चीज की नहीं। प्यार करो, नाइट पार्टी करो, डांस करो, मस्ती करो.. सब कुछ मजा मस्ती है। काम करना है तो करो.. नहीं करना है मत करो। हीरोइन का भाई अमित(प्रतीक बब्बर, राज बब्बर और स्मिता पाटिल का छोटा बेटा) कोई काम नहीं करता। कहता है अमीर होने का एक ही फायदा है, कोई काम मत करो।

आज के समाज या शायद आने वाले समाज की हल्की सी झलक है यह फिल्म जाने तू.. या जाने ना।

एहसासों के आदत बनने का डर

अकेला बैठा कुछ सोच रहा था, तभी बालकनी में अखबार के गिरने से उसका ध्यान भटका। ..हर सुबह कुछ ऐसा ही होता था। दिल्ली उसके सोच का शहर नहीं है। बड़े-बड़े माल में घूमने वाले लोग और वहां की रखी गई करीने से चीजें.. उसे क्यों पता नहीं बड़ी बेतरतीब समझ आती है।

लोगों का आपस में कोई जुड़ाव नहीं.. दो लड़कियां शापिंग कर रहीं हैं, तीन और लड़कियां शापिंग कर रही हैं, दो लड़कियों और दो लड़कों का समूह उसी दुकान में जाता है। कोई मेल नहीं.. सारी..ओह इट्स ओके जैसे शब्द मिल जाते हैं। कभी-कभी तो समझ हीं नहीं आता कि यह सुव्यवहार माल के अंदर ही क्यों निकलता है। कभी उसे भले रिक्शे पर क्यों नहीं आ जाता जो उसे माल तक लेकर आया?

यह गांवों के लिए माल संस्कृति है जो दिल्ली आकर माल कल्चर बन जाती है। यह कल्चर बालों में लगाने वाले जेल की तरह है, जो शुरू-शुरू बालों को आपके मन माफिक बनाता है लेकिन बाद में बाल बड़े रुखे से हो जाते हैं।

ऐसा ही रुखा एहसास सुबह-सुबह उसे हो रहा था। जिंदगी के कई एहसासों की तरह उसका यह एहसास भी कहीं उसकी आदत ना बन जाए। यह डर उसके अंदर कहीं दूर करवट लिए बैठा था।

घर की याद और कुछ बातें झारखंड की

घर से लौट कर आया हूं। जेठ की दुपहरी की तरह हैं अभी घर की यादें। एक दम कड़क। ताजा-ताजा। घर से चलते वक्त का अंतिम खाना.. कौर ठीक से अंदर नहीं जाता। आज भी.. और तब भी होता था जब घर से पहली बार निकला था।

एक जुलाई की रात झारखंड एक्सप्रेस से जा रहा था, दो को घर पहुंचना था लेकिन दो जुलाई को झारखंड बंद, तीन जुलाई को भारत बंद। पहले ट्रेन का रूट बदला और फिर बारिश और बंद ने सुहाने सफर को आह-आउच सा बना दिया।

तीन अहले सुबह किसी तरीके घर पहुंचा। लेकिन घर पहुंचने के बाद किसी तरीके से आह-आउच वाली स्थिति वाह-वाह हो गई। मेरी छह महीने की भतीजी का हंसता हुआ चेहरा जो दिखा। भतीजी का नाम उसकी बुआ ने माही रखा है। पूरा घर माही-माही से गुंजायमान रहता है।
इसी बीच मुझे लग रहा था मैं कुछ मिस कर रहा हूं, सोच रहा था आलोक पुराणिक ने आज संडे स्पेशल यू हीं कुछ लिखा होगा.. अपने डाक्टर साहब(अनुराग जी) ने भी अपने यादों के पेड़ को झकझोरा होगा, कुछ पत्ते सहज रूप से गिरे होंगे। पुराने लेकिन ताजा-ताजा से लगने वाले।
प्रमोद सिंह अजदक वाले ने कुछ आलापा होगा, जिसे मैं एक बार पढ़ता हूं फिर दूसरी बार पढ़ने पर समझ पाता हूं। तब पता चलता है कि कितनी बड़ी बात लिखी गई है। ठीक ऐसे ही ना जाने कितनों के बारे में सोचा और अपने दोस्तो को बताया..।

इन सब पलों में मेरा कैमरा मेरे साथ था। फोटो लिए, फ्लिकर पर अपलोड किया। मेरे पत्रकार दोस्त ने इसे देखकर कहा, मैंने ऐसी हरियाली तो कहीं देखी ही नहीं है। मैंने कहा झारखंड के नाम में हरियाली है। झार=झाड़=झाडि़यां, पेड़-पौधे.. rajeshroshan

झारखंड के बनने से बहुत कुछ बदल गया है। बहुत कुछ..। इस अमीर राज्य के गरीब जनता के साथ कितना अच्छा हो रहा है कितना बुरा..यह एक अलग बहस का हिस्सा है।

मेरे लिए तो मेरा झारखंड जैसा भी अच्छा है। कई बुराईयां जिसे मिटाना होगा। झारखंड बंद झारखंड का सबसे सफल हथियार सा नजर आता है। इसे बदलना होगा। कब और कैसे इसका मुझे ज्ञान नहीं लेकिन इतना पता है कि इस अमीर राज्य के लोगों को दिल से, मन से और जेब से अमीर बनना है तो झारखंड बंद को बंद करना होगा।

विज्ञापन में औकात की बात

मनोविज्ञान की एक थ्योरी है। आप किसी इंसान की आइडेंटिटी पर कुठाराघात करेंगे और वह अपना आपा खो बैठेगा। दो विज्ञापनों हैं, जो इसी मनोविज्ञान को कैश करने के लिए बनाए गए हैं।

पहला है, बिग बाजार का। लड़की का सामान गिरता है, लड़का उसकी मदद करता है। उसके बाद वह चलने को होता है तो उसके मोबाइल की घंटी बजती है। लड़की उसे कहती, चोर कहती। लड़का कहता है, मेरा है। लड़की कहती है, उसके पहनावे को देखकर कहती है औकात है तुम्हारी।

दूसरा है, यू टीवी का चैनल बिंदास पर आने वाला सीरियल चैम्प की। इसका प्रिंट एड है। कहता है, औकात है तो आगे निकल कर दिखाओ।

बचपन के दिनों से मैं लोगों को सुनता आया हूं। अपने औकात में रहो। जैसे ही कोई इसको कहता, दूसरा बिफर पड़ता। औकात का सीधा मतलब लोग पैसे से लेते हैं। और इन दोनों में पहला विज्ञापन पैसे को लेकर है तो दूसरा इगो को लेकर..। ज्यादातर युवा अपने दूसरे दोस्त से पीछे नहीं रहना चाहते।

मोनिट्री एंड इगो (पैसा और दंभ) का कोम्बिनेशन है यह औकात। इसे लेकर कंपनियां भी कुछ माल बटोरना चाहती हैं।

आलोचना की स्वतंत्रता

thumb up and down

कुछ इसे साहित्यिक, कुछ किताबी, कुछ फितूर भी कह सकते हैं। मेरा एक जिगरी यार इसे थ्योरिटिकल कहता है। कहता है, थ्योरी के लिए ठी क है, प्रैक्टिकल का भान नहीं है तुम्हें..

मैंने कहा झूठ बोलना बुरी बात है लेकिन कई बार लोग झूठ इसलिए बोलते हैं क्योंकि वह प्रैक्टिकल है। मैं भी इसे सही मानता हूं। और आलोचना की स्वतंत्रता को भी.. प्रैक्टिकल रूप में..।

आलोचना की स्वतंत्रता की एक खास बात यह है कि इसमें आलोचना करने वाला से खास आलोचना सुनने वाला होता है। अपनी आलोचना..। भई सीधी सी बात है, एकदम सीधी.. आपकी आलोचना तभी कोई करेगा जब उसे कुछ दिखेगा। आलोचना करने वाला कौन है? उसका आलोचना करने का ढंग क्या है? ..भाषा क्या है? ..लहजा क्या है?
नासमझ है। ..एक सीमा तक आप उसे इग्नोर कीजिए।
अनजाना है। ..एक सीमा तक आप उसे इग्नोर कीजिए।
परीचित है और समझदार है। ..गौर कीजिए, उसके सामने अपने आपको रखिए। तर्क दीजिए। समझाइए।

निंदक नीयरे राखिये, आंगन कुटी छबाये..

हर इंसान अपने समझ को जानता है (कई बार नहीं भी जानता है)। आप अपनी आलोचना सुन नहीं सकते तो समझिए कमी कहीं आपके अंदर ही है। सामने वाले को इतना स्पेस आप दें कि वह आपको ना भी कह सके। आप के गलत को ना कहने में वह झिझके ना।

मैं अपने ब्लाग में माडरेशन नहीं रखता। ना रखना चाहता हूं। कई बार लोगों ने बुरा कहा.. कभी खुलकर, ज्यादातर बेनामी। मैं उनसे अपने पाठकों, मित्रों से निवेदन करता हूं कि आलोचना करें.. तो खुलकर करें। मुझे आप अपने तर्क से सहमत कर दें। मैं सहज रूप से आपकी बात मानने को तैयार हो जाऊंगा।

आलोचना की स्वतंत्रता का मैं पक्षधर हूं। लोग हों ना हों..

कुर्सी वाला, जोंक हो जाता है!

चोल, चेर और पाण्डय
मुगल भी आपस में लड़ पड़े
देशी क्या विदेशी भी

इतिहास की बात छोडि़ए
आजकल तो आफिस में भी
कुर्सी की भीषण लड़ाई हो रही…

आजकल सभी,
जोंक होने की चाहत रखते हैं
क्योंकि कुर्सी वाला, जोंक हो जाता है

किसकी और क्या है दिल्ली!

पिछले सात सालों से दिल्ली में रह रहा हूं, इसके साथ 27 साल की उम्र की समझ के साथ जो दिल्ली को देखा, सुना, पढ़ा, उसी मुतालिक कुछ पंक्तियां जोड़ने की कोशिश..

लुटियंस से लेकर केपी सिंह तक..
कितनों ने बनाया और कईयों ने लूटा..
दिल्ली ही घर है..

देश के अलग अलग हिस्सों से आए
उन 750 सांसदों की,
जिन्होंने देश को देने से ज्यादा इससे लिया है

सुप्रीम कोर्ट में हक के लिए लड़ने आए
देश के कई लोगों की भी..
जो लूटे होते हैं और देश का कानून उन्हें और लूट लेता है

थोड़ा व्याकुल, थोड़ा उत्साहित
रोजगार के लिए गांव से आने वाले उस युवक की भी
जो अभी ट्रेन में बैठा भी नहीं है

चौड़े सड़क पर झूम कर चलने वाले
उन नौजवानों की भी
जो वीकेएंड में अखबार का हिस्सा बन जाते हैं

कुकुरमुत्ते की तरह खुले पत्रकारिता में पढ़ने वाले
युवा पत्रकार से लेकर वरिष्ठ पत्रकारों की भी
जो सीवी, फोन और मुलाकात का सिलसिला नहीं छोड़ते

ब्लू लाईन, व्हाइट लाइन, मुद्रिका और बाहरी मुद्रिका
आफिस से परेशान उन लाखों यात्री की भी
जो जवानी का आधा हिस्सा बस में गुजार देते हैं

नार्थ कैम्पस, साउथ कैम्पस और मुखर्जी नगर
पढ़ने आए उन छात्रों की भी
जिनके हाथों में फरवरी में सुर्ख लाल गुलाब नजर आते हैं

एम्स, अपोलो और सफदरजंग आने वाले
बीमार और उन तीमारदारों की भी
जिन्हें खुशियां तो, कभी गम ज्यादा मिलते हैं

बाकि बचे हम साधारण लोग

काम से छूटे
किराए घर में आए
कुंवारा खाने की, विवाहित अन्य परेशानियों में
लग जाता है..
रात को देर से सोना
..फैशन मान लिया जाता है।
कंम्प्यूटर और लैपटाप में खिटिर फिटिर के बाद
पांच बाई साढ़े छ: के बिस्तर में
..आठ बजे जल्दी उठ जाते हैं।
कई रिपोर्ट और कई लेखनी
दिलवालों से लेकर, संवेदनाओं से मरा हुआ
र्ईट और गारे से भरा हुआ
शहर बता चुके हैं।
लोगों कहते हैं..
दिल्ली का मौसम, अपना नहीं है
राजस्थान इसे गर्मी और हिमाचल सर्दी दे जाता है

नेताओं ने इस बात को सुनकर
पूरी दिल्ली को ही शंघाई बनाने का फैसला किया
करोड़ों खर्च किए
सफर, आस्था और जज्बा बढ़ाने वाले
मेट्रो, मंदिर और खेल गांव बनवाए

दिल्ली का दिल धड़कता है-

नेता, आरोपी बेरोजगार और नौजवानों में
पिछे नहीं हैं छात्र, पत्रकार और बीमार

इंडिया गेट, लाल किला, कुतुब मीनार
जनपथ, मोनेस्ट्री और पालिका बाजार
यही है यहां की पहचान
इसी से बढ़ती है दिल्ली की शान

विचारों के ताने-बाने

puzzle

कितना शोर है
चारो ओर
मेरे विचार भी उलझने लगते हैं,
इन सब में।

सुलझाना जो चाहता हूं, मैं इनको
कोई एक और विचार आ जाता है
सुलझने नहीं देता
मेरे विचारों को

आह!! करके जो मैंने छोड़ दिया
अपने विचारों को,
सुलझने लगे यह खुद ब खुद…