नीली और हरी रोशनी से जगमगाता मंच. वहां खड़े हर शख्स के पहनावे को थोड़ा बदल देता है. केवल पहनावा ही नहीं बदलता कभी-कभी पूरी जिंदगी बदल देता है. मधुर भंडारकर की फिल्म फैशन को देखने के बाद ऐसा ही कुछ लगेगा.
स्पाईडरमैन सीरिज की पहली फिल्म में स्पाईडरमैन के अंकल कहते हैं अगर पद बड़ा हो तो आप पर जिम्मेदारी उससे ज्यादा बढ़ जाती है. पैसा और पावर कहां लोग पचा पाते! पचा पाने को बोलचाल की भाषा में कहूं तो जीवन में कम्पोज कहां बन पाते हैं. फिल्म में एक जिंदगी शुरू होती है और उससे पहले ठीक वही एक जिंदगी उसी दुनिया में जी रहा होता है. इशारा मिलता है लेकिन… वह कहते हैं ना जब तक गलती ना कर लो उस गलती का एहसास नहीं हो पाता है. दूसरे के अनुभव से कहां कोई सीख पाता है!
जिंदगी में गलती करना आसान है उससे उबर जाना बहुत कठिन. निर्देशक को सकारात्मक फिल्म बनानी थी इसलिए मेघना अरोड़ा (अभिनेत्री) उससे उबर जाती है लेकिन क्या रियल लाईफ में भी ऐसा होता है.
मुझे नाम तो याद नहीं लेकिन एमटीवी की कोई वीजे हुआ करती थी, चार-पांच साल पहले मुंबई में उन्होंने आत्महत्या कर ली थी.
आधुनिकता जैसे-जैसे आपके दरवाजे के चौखट पर आएगी यह सबसे पहले आपकी परंपरा और संस्कृति पर हमला करेगी. रेव पार्टियां, सोशालाईट्स, वोग, एफटीवी, ड्रग्स ऐसे तमाम सारी शब्दावलियों के आप हिस्से हो जाएंगे.
मेरे घर से दूर ईट्ट के भठ्ठे पर काम करने वाला मजदूर शराब पीता है, जानते हैं क्यों…. अपनी थकान दूर करने के लिए और जो लोग ड्रग्स लेते हैं जानते हैं यह क्यों लेते हैं….जोश के लिए, मस्ती के लिए.
फिल्म की बात करुं तो मधुर भंडारकर की पिछली तीन फिल्मों से इसे अगर तुलना नहीं करेंगे तो यह फिल्म भी अच्छी बनी है. फिल्म शायद थोड़ी लंबी बन गई है. अंतिम 15 मिनट से पहले के 10-15 मिनट शायद दर्शकों को बोर कर दे. वैसे मुझे इसका साईनिंग ट्यून पसंद है, जो फिल्म में बार-बार चलता रहेगा.
जाकर फिल्म थियेटर में देखिए अगर आप पाईरेसी के खिलाफ हैं तो… वरना एक दो दिन में भारतीय बाजार में इसकी डीवीडी मिल जाएगी.




