स्वाद और भूख

पहला दृश्य…

पेट तो भरा हुआ था लेकिन कुछ स्वादिष्ट खाने की इच्छा हो रही थी. पहले का आर्डर किया हुआ खतम भी नही हुआ था. पूरे एक हफ्ते बाद बाहर खाना खाने आए थे. आइसक्रीम का आर्डर दिया गया. वो भी पुरा खत्म नही हुआ. …और अंत में बचा हुआ खाना वेटर उठा कर ले गया

दूसरा दृश्य…

उसी होटल के बाहर से रात को गुजर रहा था. वेटर बचे हुए खाने की बड़ी पालीथीन फेंकने जा रहे थे. कोने पर बैठा हुआ इंसान ताक में था. वेटर ने खाना कोने में बिखेर दिया. दूसरे कोने में बैठा इंसान देखता रहा. वेटर गए और वह से खाना चुनकर वही से उठाये एक पेपर प्लेट में डाल खाने लगा.

रेड लाईट

traffic lightयह पिछले पोस्ट वाला रेड लाईट नहीं है। यह है ट्रैफिक की रेड लाईट। कभी ग्रीन तो कभी रेड। आरेंज तो बस होता ही भर है..। अपने संस्कारों के लिए जाना जाने वाला यह देश, इन लाइटों का सम्मान कम ही करता है।

एक अजीब मानसिकता है। आपने भी किया होगा या फिर महसूस तो किया ही होगा। अभी रेड लाईट की गिनती कम हो रही है..9, 8, 7, 6, 5 और यह क्या लोग अपनी मोटरसाइकिल और कार के एक्सीलेरेटर पर पांव रख देते हैं और उधर ग्रीन वाल भी यही चाहता है 5, 4, 3, 2, 1 एक बाद भी वह चल सकता है। सभी को जल्दी होती है। रूकने वाला रूकता नहीं है और चलने वाला कुछ जल्दी ही जाना चाहता है।

छोटे शहर की ट्रैफिक देख कर लगता है कि हां, भारत में भगवान बसते हैं। कोई आ रहा है, कोई जा रहा है। किधर से आ रहा है और किधर जाएगा केवल चलाने वाला ही जानता है।

साइकिल वालों को तो ना रेड लाईट से मतलब है ना ग्रीन लाईट से। उनके लिए केवल दिल्ली में ही नाम के नियम हैं। बाकी भारत तो उनके लिए खुला है। दिल्ली में भी वह चले जा रहे हैं।

दो पहिया में चलाने वाला और पीछे बैठने वाले के लिए हेलमेट पहनना जरूरी है (दिल्ली में)। अगर महिला हो तो इसकी छूट है, क्यों? किसी को पता हो तो जरूर बताईगा। क्या दुर्घटना होने पर महिलाओं को चोट नहीं लगेगी?

इसी रेड लाईट की दुनिया पर फिल्म बन गई ट्रैफिक लाईट।

दिल्ली की चौड़ी सड़कों पर गाडि़यों का बढ़ता दबाव, किलर ब्लू लाईन बसें, बीआरटी कोरीडोर, मेट्रो का विस्तारीकरण और उसके बाद हमलोग का जल्दीपना।

आराम से चलिए या फिर आप जानिए, यह भारत की ट्रैफिक है, बाबू साहब।

समाज

indian societyअभी नेपथ्य से किसी ने आवाज़ लगाई
मंच पर तो कोई भी नही था
तमाशबीन बहुधा थे
एक हुंकार हुई
और सब चले गए

मुंह दिखाई 5 रुपए!!!

नई नई दुल्हन, सारे अड़ोस पड़ोस की महिलाये दुल्हन को देखने आई. दुल्हन ने भी घूंघट डाल रखा था. परम्परा जो सालो से चली आ रही थी, उसे कहते दुल्हन परछना. चावल जो हल्दी में रंगे हुए थे. थाली से उठाना और दुल्हन के घूँघट के ऊपर डाल देना. और उसके बाद पैसे देना.

बात मैं इसी की कर रहा हू… यह काम महिलाए करती हैं और नाम लिखने वाला महिला को पहचान उनके पति का नाम लिख देती हैं या फ़िर घर का जो पुरूष मुखिया हो उसका (महिला अपना नाम क्यों नही लिखवाती या लिखने वाला उनका नाम क्यों लिखता यह अलग चर्चा का विषय है) कोई देता है १५१, कोई केवल ५१ तो कोई ११ और कोई ५. हा मुंह दिखाई ५ वो भी इस ज़माने में(जब मुद्रास्फिती ५ से ६ और ६ से ७ और उससे भी आगे भाग रही है ) हा तो दुल्हन को परछने के बाद पास बैठे लड़के को ५ रूपये दिए. लड़के ने पति का नाम लिखने के बाद ५ रुपए लिख दिया. लड़का हैरान परेशान की ये ५ रुपए देने का क्या तुक है.

तो मैं अब तुक समझा दूँ. १२ साल पहले इस घर की महिला ने उस घर की दुल्हन को परछने के बाद ५ रुपए दिए थे. वो बात याद रखते हुए उस घर की महिला ने इस घर में आई दुल्हन को ५ रुपए वापस लौटा दिए.

ये आज भी होता है, मुझे हँसने की वजह मिली सो मैंने सोचा आप भी हंस ले…

हिंदू परंपराएं जो मर गई, कुछ मरने वाली हैं

हम भारतवासी अपने देश, अपनी संस्कति, अपनी परंपराएं पर गर्व करते हैं। हिंदूओं में यह बात तो और भी ज्यादा है। परंपराओं को लेकर इनका मानना है कि जो भी बनाई गई हैं बेहतरी के लिए बनाई गई है। सबका अपना एक मतलब है और लाभ भी।

अभी कुछ दिन पहले यह देखने को मिला तो बात याद आ गई सो लिख रहा हूं।

पिता अपनी बेटी के यहां आते हैं। गांव से। बेटी ने सबसे पहले उनके पांव धोये, आटा गूथने वाले बरतन में। तौलिये से उनका पांव पोंछा। पिता झोले में कुछ लाए थे, मां ने घर से कुछ बना कर दिया था। थोडी देर आराम करने के बाद पिता जाने को हुए। बेटी के घर का कुछ नहीं खाया। कहते हैं, बेटी के घर का कुछ नहीं खाना चाहिए।

और वह घर को चले गए।

मैं सोचता रहा, क्या इसके भी कोई मायने हैं। परंपरा तो है। तो जिस पर हम गर्व करते थे, वह आज धीरे-धीरे मर गया। लोगों को याद भी नहीं है। चलन से बाहर हो गया।

यह बात अलग है कि समय के साथ सबको चलना चाहिए। मैं इससे परहेज नहीं करता लेकिन वैसे जो परंपराओं को लेकर दंभ भरते हैं, और उसके बावजूद उन्हें कई परंपराएं मालूम ही नहीं।

क्या आपको मालूम है की कुछ और परम्पराये मर रही हैं?

हिंदी और अंग्रेजी के सोच का फर्क

अगर यह बात कही जा रही है तो मुमकिन है इसमें सच्चाई होगी। अगर होगी तो मैं कुछ कहना चाहता हूं। पहले मैं केवल यह मान लेता (स्कूल में गणित के सवालों का जवाब देने के क्रम में कुछ तो मानते होंगे, बस यह इसी प्रकार का मानना है)हूं कि हिंदी वालों के पास पैसे कम होते है। सोच भी प्रोग्रेसिव नहीं होती। छोटी-छोटी बातों को भी ऐसे पकड़ते हैं जैसे पैसे को दांत से पकड़ा जाता हो।

इसी के ठीक उलट यह मान लेता हूं कि अंग्रेजी वालों के पास पैसा होता है। सोच से प्रोग्रसिव होते हैं। हर छोटी बातों को नहीं पकड़ते।

अगर यह सब हिंदी और अंग्रेजी वालों की सोच में है तो क्या होगा? जरा मजमून पेश करता हूं।

- हिंदी
सबसे पहले तो वह पैसा कमाना चाहेंगे। इसके लिए कुछ काम करेंगे, कुछ मक्खन बाजी, कुछ के अपने उसूल होंगे इन सब के बीच उनकी प्राथमिकता पैसा कमाना ही होगी। येन, केन प्रकारेण।

प्रोग्रेसिव से मेरा सीधा मतलब है कि समय के अनुसार वह नहीं बदलना चाहते। माता-पिता को डैड बोलने पर कहेंगे आजकल के लड़के-लड़कियां पिता को डैड तो कभी डेड कहते हैं। डैड बोलने में दिक्कत क्या है, मुझे समझ नहीं आता। 90 के दशक में जो जींस पहनते थे, उनके बारे में कहा जाता था, लड़का जींस पहनता है(आज वह खुद या उनके बच्चे पहनते होंगे)। इतना बताने के बाद शायद मैं ठीक से समझा पाऊं कि नई चीज को आत्मसात करने में इन्हें दिक्कत होती है। मतलब यह प्रोग्रसिव नहीं होते।

छोटी बात को पकड़ते हैं से मेरा मतलब है, टीवी के एक रियलिटी शो में मलाईका अरोड़ा माइक्रो मिनी पहन कर आती है तो कुछ दोस्त इसी बारे में बात करते हैं कि यार देखो यह छोटे कपड़े पहन कर आती है। और बात आगे बढ़ते हुए मस्त और सेक्सी तक पहुंच जाती है। और उसके बाद बातों ही बातों में बलात्कार भी। ऐसा होता है। हमारे आपके सभी के बीच।

- अंग्रेजी

पैसा तो इनके पास होता ही है तो इस बारे में इनका ख्याल प्राथमिक रूप में नहीं होता है। इनकी स्थिति उसे बढ़ाने को लेकर ही होती।
इनका ध्यान सड़क पर चल रहे कुत्तों की मारपीट में घायल एक कुत्ते पर होता है (मनुष्य मदद मांगे तो शायद नहीं दे पाएं, कुत्तों को देते हैं।)

इन्हें नई चीजों को करने में तकलीफ नहीं होती। खाने से लेकर शराब तक। हर नई चीज के यह दीवाने होते है। आफिस का कपड़ा काफी सलीके का होता है लेकिन जब अपनी सोच पर आएं तो औड चीज को यह पहले अपनाते हैं।

जाति और धर्म को लेकर तो ये भी संवेदनशील होते हैं। लेकिन इनमें कास्ट से ज्यादा क्लास को लेकर फीलिंग होती है। अगर अदर कास्ट वाला भी सेम क्लास का हुआ तो फिर चलेगा। बालीवुड इसका अच्छा उदाहरण है। यहां केवल क्लास की पूछ होती है, कास्ट तो इनके लिए कोई मैटर ही नहीं है।

मैं यह नही कहता की इससे अलग सोच वाले लोग दोनों गुटों में नही होते हैं. बेशक होते हैं. लेकिन बहुतायत इन्ही की है

याद दिलाना मुनासिब समझता हूं कि हम मान रहे हैं। सच्चाई यह नहीं है, या सच्चाई भी यही है.. आप बताएं?

कुछ स्टीरियोटाईप सोच

इत्र केवल मुसलमान लगाते हैं।
मुसलमान भारत को नहीं पाकिस्तान को पसंद करते हैं।
बिहारी चालाक और राजनीति करने वाले होते हैं।
सभी लड़कियां सेक्सी होती हैं।
पुलिस हमेशा खराब होता है।
नेता कभी वादा नहीं निभाते।
औरतें खूब बोलती हैं।
युवा लड़कियां मोबाइल फोन पर सबसे ज्यादा बात करती हैं।

मैं ऐसा नही सोचता। कैसे? पूरा पोस्ट पढ़िये।

चांदनी चौक में रहने वाले शर्मा जी दरीबां की एक छोटी सी दुकान से अपने एक रांची दोस्त (जो दूसरे शर्मा जी हैं) के लिए इत्र खरीदतें हैं। अपने रांची प्रवास के दौरान शर्मा जी सबकुछ भूल जाएं, इत्र नहीं भूलते।

इत्र कोई भी लगा सकता है। शर्मा जी भी और अख्तर साहब भी।

अखबार के एक दफ्तर में पहले ट्वेंटी-20 फाइनल का टीवी में प्रसारण चल रहा था। मुकाबला था इतिहास में एक ही देश कहलाने वाले और वर्तमान के तथाकथित दो दुश्मनों देशों के खिलाफ। मैच का अंतिम ओवर धोनी के चहेते जोगिंदर शर्मा कर रहे थे.. आखिरी गेंद.. और भारत मैच जीत गई। पाकिस्तान हार गया। दफ्तर में शांत रहने वाले मुसलमान नियाज ने हिंदू सोभन का गाल चूम लिया। ..और पैसे मिलाकर मिठाई मंगाई गई लेकिन मुसलमान नियाज ने सबसे ज्यादा 100 रुपये मिलाए।

भारतीय मुसलमान भारत को प्यार करते हैं और वह भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े प्रशंसकों में से एक होते हैं।
यूं तो इस आफिस में भी कुछ नया नहीं था। कुछ भी नया नहीं था से मेरा मतलब कि दिल्ली के हरेक आफिसों की तरह इसमें भी बिहारियों की संख्या सबसे ज्यादा थी। कोस्मोपोलिटन दिल्ली में वह कोस्मोपोलिटन पत्रिका नहीं पढ़ते। प्रवीण झा भी इसी आफिस का हिस्सा है। मध्यम वर्ग परिवारों में होने वाले मूल्यों को लेकर चलने वाला। आफिस में उसे लोग कभी-कभी झा.अुआ कह कर पुकारते। इसका तुक तो प्रवीण को भी नहीं समझ में आता। झा को झा.अुआ कहना, समझ से परे की चीज है। उसकी प्रकृति उसकी निजी थी, किसी प्रांत और इलाके से अलग(सभी की प्रकृति उसकी निजी व्यवहार पर ही होती है, प्रांत और इलाके से अलग)।

बिहारी भी सीधे होते हैं और राजनीति को समझते हैं और नहीं भी समझते।

तीसरे माले में रहने वाले कुछ लड़के तो सड़क से आने जाने वाली हर लड़की को सेक्सी कहते। उनके जेहन में लड़कियां सेक्सी ही होती हैं, जैसा कुछ बैठा हुआ है।

बस में चलते हुए उसी तीसरे माले में रहने वाले एक लड़का, विकास का सामना एक लड़की से हुआ। जिसके बाद वह बस से यह बुदबुदाते हुए उतरा, इसके तो सिंग उगे हुए थे, लड़ने को ही घर से निकली थी।

हुआ कुछ यूं था। बस ने हल्का हिचकोला खाया और विकास का जूता, लड़की के बस की फर्श पर रगड़ खा रही दुप्पटे को खिंच गया (अनजाने में हुआ था यह)। दुप्पटा पूरा नीचे। लड़की ने उसे देखते हुए कहा, आंखे नहीं हैं क्या? देख कर नहीं खड़े हो सकते हैं क्या?
अगले स्टाप पर बस में भीड़ थोड़ी और बढ़ गई। बस ने एक हिचकोला और खाया। विकास लड़की से टकराते-टकराते.. टकरा ही गया। कुछ अंग्रेजी और हिंदी, लड़की ने विकास को इतना सुना दिया कि सभी यात्री विकास को ही देखने लगे। अगला स्टाप विकास का स्टाप था। वह कुछ बुदबुदाते हुए उतर रहा था।

बाकी की बातें अगले पोस्ट में लिखूंगा

अरबपति भारत, विश्व की खाद्यान्न समस्या और कोडंलीजा का बयान

इतिहास गवाह है कि भारत को नजरअंदाज कर कभी भी कोई काम नहीं किया जा सकता। धीमे-धीमे ही सही लेकिन भारत और भारतीय अपनी पहचान विश्व के अन्य भूभाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे रहें हैं।

हलिया में पत्रिका फोब्र्स ने कहा कि 2018 तक भारत में सबसे ज्यादा अरबपति होंगे। आम भारतीय इन्हीं बातों से खुश हो लेता है। लेकिन विदेशियों को यह बातें नागवार लगती होंगी! मैं यहां “होंगी” लिख रहा हूं क्योंकि ऐसा मेरा अंदाजा है। कोई ठोस प्रमाण नहीं है मेरे पास।

इस अंदाजे को और बलवती करती है कोंडलीजा राइस का यह बयान कि विश्व में खाद्यान्न समस्या जो उत्पन्न हुआ है, उसका एक मुख्य वजह भारत है। भारत में इन दिनों खाद्यान्न की खपत बढ़ गई है जिसके कारण विश्व के कई हिस्सों में इसकी कमी हो गई है।

विश्व का सबसे अधिक उर्जा खपत करने वाला देश जब विश्व का सबसे अधिक खाद्यान्न उपजाने वाले देश को ऐसा कुछ बोले तो कुछ समझ नहीं आता।

जिस तेल के लिए अमेरिका ने इराक पर हमला किया था, लाखों डालर खर्च कर दिए अब वही तेल अमेरिका के साथ पूरे विश्व को अपनी धार दिखा रहा है। बांग्लादेश, हैती, जिम्बाब्वे, फिलीपींस व मध्य पूर्व अफ्रीका के देशों में खाने की भारी कमी है। राईस इसी का ठीकरा विश्व के दो सबसे विकास करने वाले देशों (भारत और चीन) पर फोड़ देना चाहती हैं।

अर्जेटीना में हाल ही एक किलो टमाटर की कीमत एक किलो गोश्त से ज्यादा हो गई थी। भारत में तो सब्जियों के दाम किलो में बताए ही नहीं जाते। यहां दुकानदार सब्जियों के दाम 250 ग्राम के हिसाब से बताता है।

हर देश की खाद्यान्न जरूरत बढ़ रही है। इसे दूसरे देश के भरोसे रह कर पूरा नहीं किया जा सकता। भारत में तेल नहीं है तो जापान में खाद्यान्न नहीं तो दुबई में पानी नहीं। इन सब की वैकल्पिक व्यवस्था की जिम्मेदारी वहां की सरकार को करनी चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र ने खदान संकट से निपटने के लिए टास्क फोर्स का गठन किया है.

कुछ संबंधित लिंक्स

Washington Post : Food Crisis

Sunday Herald : Articles on Food Crisis

Time Magazine: After The Oil Crisis, a Food Crisis?

ऐसे भी गर्मी नही जा रही

Heat wave

यह चित्र भारत में बढ़ रही गर्मी के बारे में कुछ कह रही है

बीबीसी हिंदी व असंवेदनशील शीषर्क

पहले इसका शीषर्क देख लें। सुपर मम्मी ने लगाया सिक्सर।

इस शीषर्क को देखकर यही लगा कि बीबीसी हिंदी में भी शीषर्क लगाते वक्त संवेदना जैसी चीजों पर ध्यान नहीं दिया जाता है।

छह बच्चों को जन्म देने वाली मां, सुपर मम्मी हो गई और छह बच्चे को सिक्सर कह संबोधित किया गया।

पंजाब में मजदूरी करने वाला साधारण नागरिक के बारे में यह नहीं समझा गया कि अब इनका गुजर बसर कैसे होगा? बच्चों के ईलाज का खर्च कहां से आएगा?

इसके बरक्श सुपर मम्मी और सिक्सर। क्या और कैसा नजरिया है!!

किसी महिला को लेकर ऐसा शीर्षक क्यों?