अच्छे और बुरे में फर्क

जो काम क्षणिक सुख देगा वह बुरा और जो काम महीनों या वर्षो तक सुख देता रहेगा वह अच्छा। अब इसे किसी भी कार्य या फिर पोस्ट के साथ मिला लें आप नतीजे के काफी करीब होंगे।

धन्यवाद

मनीषा पांडे, अविनाश और यशवंत की चिक चिक

ऐसा नहीं होना चाहिए और अगर हो भी तो इसके बारे में बातें नहीं होनी चाहिए। यह एक आदर्श वाक्य है। लेकिन इसकी परवाह करने वाले कम लोग हैं। घटिया लोगों की मानसिकता घटिया होती है। या कुछ ऐसा कहा जाना चाहिए कि घटिया मानसिकता वाले लोग घटिया होते हैं। कुत्ते का दुम हिलाना वफादारी का संकेत होता है और इंसान का दुम हिलाना चाटुकारी का।

यहां बातें हो रही है- मनीषा पांडे, मोहल्ला के अविनाश और भड़ास के करीब-करीब सभी लोगों के बारे में। लोगबाग क्या कहते हैं इससे इनको कोई लेना देना नहीं है, इनकी ललक शांत हो जाए, बस। इन्हें केवल इतना चाहिए। हर तीसरा पोस्ट इन्हीं के बारे में कुछ लिख पढ़ रहा है।

सबसे पहले मनीषा पांडे के बारे में। मैं इनको नहीं जानता। लेकिन फिर भी इनके बारे में जो पढ़ा उससे केवल इतना ही लक्षित हो रहा है कि यह अपनी लड़ाई खुद लड़े दूसरों की जमात में शामिल होकर वार करना सही नहीं है। अपनी बात रखने से आपको कोई नहीं रोकेगा। लेकिन सबसे जरूरी कि इनके बारे में जो कुछ लिखा गया व पूर्णरूपेण निदंनीय है और मैं उसकी निंदा और केवल निंदा करता हूं।

अविनाश जी के बारे में आज यशवंत जी ने कुछ लिखा है, उसे पढ़े मेरी राय कुछ मिलती जुलती है। प्रियंकर जी ने कुछ लिखा और उसे अविनाश ने जस का तस छाप दिया। लेकिन यह समझ से परे की चीज है कि एक चैट को अविनाश ने अपने पोस्ट में क्यों जगह दी। उससे वह क्या हासिल करना चाहते थे? इतनी समझ तो मैं मान कर चलता हूं कि उन्हें भी समझ आना चाहिए कि इसे ना डाला जाए। लेकिन उसके पीछे का मकसद ही कुछ ऐसा होगा कि वह पोस्ट चला गया।

भड़ासियों के बारे में एक बार मैं लिख चुका हूं। एक बार फिर लिखना चाहूंगा। भड़ास की टैग पंक्ति अगर कोई बात गले में अटक गई हो तो उसे उगल दीजिए, मन हल्का हो जाएगा..। यह जो उगल दीजिए है यह कुछ ऐसा प्रतीत होता है जैसा कि उगलिए लेकिन अभ्रद तरीके से। माफ करना यशवंत जी मैने इसे कई बार देखा है। जब आपने इसे लिखा होगा तो आपके पास तो शब्दों को बांधने की क्षमता हो सकती है लेकिन आपके भड़ासियों में यह कम मालूम जान पड़ती है। ऐसा मुझे लगता है और हो सकता है आपको भी। मैं यहां लोगों को डाउन टू अर्थ होने की बात नहीं कह रहा हूं कि जब भी लिखे अच्छा लिखे। गुडी-गुडी लिखे। जो चाहें मर्जी लिखें लेकिन अपनी भाष को थोड़ी संयत रखें। इतनी अपेक्षा तो की ही जा सकती है। क्योंकि आप एक ऐसे मंच पर लिख रहें हैं जहां यह केवल आपका बनकर नहीं रह जाता है।

कुछ इस प्रकार कि अश्लील फिल्में कमरे की चहारदीवारी में चले तब तो ठीक है लेकिन अगर इसका प्रदर्शन खुले रूप से किया जाए तो यह अच्छा नहीं कहलाता। इन सब बातों का थोड़ा ख्याल जरूर करना चाहिए।

और अंत में मुझे यह पता है कि यह ब्लाग है यहां जो भी लिख रहा है वह केवल उसकी संपति है और वह अपने ब्लाग पर जो मर्जी लिख सकता है। लेकिन हिंदी ब्लाग की दुनिया इतनी छोटी है और एग्रीगेटर्स के कारण यह थोड़ा और संकुचित हो जाता है। इसलिए कुछ अच्छा लिखें।

विकिपिडिया में हिंदी की स्थिति, हैरान हो जायेंगे!!

Language Language (local) Wiki Articles Depth Total Edits Admins Users Images
35 Telugu తెలుగు te 36 259 3 57 133 179 084 10 3 023 2 444
38 Nepal Bhasa नेपाल भाषा new 31 555 2 48 408 129 175 1 132 36
46  Manipuri বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরী bpy 20 828 3 28 754 151 191 1 107 116
54 Bengali বাংলা bn 16 264 36 61 803 211 828 8 1 471 924
59 Hindi हिन्दी hi 13 526 6 24 047 111 291 12 2 342 815
64 Marathi मराठी mr 11 628 15 27 808 125 592 5 1 528 719
65 Tamil தமிழ் ta 11 515 20 27 665 162 053 13 2 135 2 450

आप पहले इस चार्ट को देख लीजिए। (चार्ट सही से नही दिख रहा है. लेकिन उसमे बोल्ड से लिखे गए नम्बर लेखो की संख्या हैं  )इस 15 सितंबर, 12 बजे दोपहर को कापी किया गया। मैं हैरत में हूं। तेलगू, नेपाली, मणिपुरी और बंगाली हमसे आगे हैं। तेलगू की बात तो समझ में आती है लेकिन नेपाली और मणिपुरी भी..। नेपाली के पास हिंदी के मुकाबले दुगने से भी ज्यादा लेख हैं।

भारत में हिंदी का बाजार अंग्रेजी से लड़ने को तैयार है। लड़ने को क्या हराने को तैयार है। लेकिन विकिपिडिया में हिंदी की यह स्थिति..। क्यों? क्या हिंदी के लेखक केवल आत्ममुग्धता और पैसे के लिए ही लिखते हैं? अगर लिखते हैं तो कुछ गलत नहीं करते लेकिन क्या वह अपनी लेखनी का योगदान कुछ अच्छी चीजों में नहीं दे सकते? अगर नहीं देते हैं तो गलत करते हैं।

ब्लागर्स की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है लेकिन विकिपिडिया के लेखों में नहीं..। आइए हम सब मिल जुल विकिपिडिया में योगदान दें। एक पंक्ति ही सही लेकिन लिखिए..। सब मिलकर लिखेंगे तो हम अन्य विदेशी भाषाओं को भी पीछे छोड़ देंगे।

यह लिंक आपको विकिपीडिया के लेखो के बारे में पूरी डिटेल देगी

भडासी हैं बडे प्‍यारे

इनकी लेखनी आपको आहत कर सकती है। इनके शब्‍द या यूं कहें पूरी लेखनी आपको भी इनके लिए भडासी बना सकती है। लेकिन यह हैं बडे प्‍यारे लोग। आज ब्‍लागर्स मीट से आने और जाने के क्रम में दो भडासियों से जान पर‍िचय हुई। यशवंत जी और सच‍िन जी। इनकी बातों से मैंने जो समझा जो जाना कि यह ह़दय से बडे साफ हैं। यह किसी को आहत नहीं करना चाहते।

 हां अपनी बात रखने का ढंग थोडा जुदा है। यही इनकी पहचान है। लेकिन इन्‍हें कुछ चीजों से तो बचना ही चाहिए। अब किन चीजों से बचना चाहिए ये तो वो भी बेहद अच्‍छी तरीके से जानते होंगे।

ओ हिंदी के कर्णधारों जरा ध्यान दो

हिंदी ब्लागों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है। यहां कई लोग लिखाड़ हैं। कई कमाल का लिखते हैं। कई बेफजूल। कई लिखने के लिए लिखते हैं। बड़ी अच्छी बात है कि लिखते हैं, इन सब का परवाह किए बिना।

विकिपिडिया हिंदी में मैं नहीं जानता कितने लोग योगदान देते हैं। देना चाहिए यह तो मैं कहूंगा नहीं लेकिन हां राजनीति पर तो विकिपिडिया में लेख जरूर होना चाहिए। जो नहीं है। मैं तकनीकी कारणों से विकिपिडिया हिंदी में सहयोग नहीं दे पाता। आप तो दे सकते हैं। अगर इच्छा हो तो जरूर दीजिए और नहीं तो हिंदी ये, हिंदी वो का राग मत आलापिये (कई लोग अलापते हैं)।

हिंदी भाषी राजनीति, फिल्म और क्रिकेट पर कभी भी बोलने को तैयार रहता है। तो क्या हम उसे लिख नहीं सकते?

चिट्ठा चोर या ‘भूखा’ चिट्ठेकार

देखने का नजरिया अलग है। किसी ने अगर आलोक पुराणिक जी के चिट्ठे से दो पोस्ट हू बहू कापी कर अपने चिट्ठे में डाल दिया तो क्या वह चोर हो गया? आप कहते होंगे, मैं उसे नहीं मानता। मैं उसे उसकी भूख मानता हूं।

आइडेंटिटी क्राइसिस की भूख। वह अच्छा लिखना नहीं जानता। क्रिएटिविटि नहीं है उसके पास। तो क्या करे! हम आप जो लिखते हैं उसका विचार हम अपने आस पास से लेते हैं। कोई कहीं के लिखे हुए एक लाईन से ही पूरी पोस्ट लिख देता है। कोई कुछ करता है तो कोई कुछ।

अभी कुछ दिन पहले मुझे एक चिट्ठेकार ने एक लिंक देकर यह बताया गया कि इस चिट्ठेकार ने कईयों की पोस्ट को अपने नाम से पब्लिश कर दी है। मैंने कहा यह तो बड़ी अच्छी बात है। मुफ्त में प्रचार हो रहा है। हां, वो अलग बात है कि आपका नाम नहीं दिया गया है। कोई बात नहीं। आपको पढ़ने वाले आपकी लेखनी को जानते हैं। नाहक आप परेशान ना होईए।

उन्होंने कहा कि यह तो गलत बात है कि बिना नाम दिए उसने यह सब काम कर दिया। मैंने कहा गलत तो है लेकिन आप कुछ कर नहीं सकते। और करना भी नहीं चाहिए। तब तक जब तक वह आपका प्रतियोगी ना बन जाए।

आपका लिखा हुआ पोस्ट अगर कोई दूसरा पब्लिश करता है तो वह बेचारा ‘भूखा’ है। आपने उसे खाना दिया है। ठीक है कि वह आपका नाम नहीं ले रहा है, लेकिन दिया आपने ही है। जिसे सब लोग जानते हैं।

इसलिए शोर मत मचाइए, भूखे को खाना देना पुण्य की बात है। खुश हो जाइए। इसमें आपका कोई नुकसान नहीं हो रहा है।

नोट: (आलोक पुराणिक जी का नाम मात्र उदाहरण के लिए दिया गया है)

चौंकाने वाले आंकड़े!

लिखने पढ़ने की आदत ने पहले पत्रकार बनाया और अब ब्लागर। इन दोनों मामलों में मैं अभी नया हूं। पत्रकारिता करते हुए महज दो साल हुए हैं। ब्लागिंग करते हुए 7 महीने।

आज एक लिंक ने मेरा बरबस मन खींच लिया। वर्डप्रेस पर रोजाना ब्लाग की रैंकिंग की जाती है। वहां की लिंक से आज की तारीख में मेरा सपना में कुल दो लोग आए। तो मुझे पता चला कि वर्डप्रेस पर बने ब्लागस पर मेरा सपना 67वें नंबर पर है।

अंग्रेजी के बीच हिंदी के दो ब्लाग टाप 100 में हैं। अमित जी का ‘दुनिया मेरी नजर से’ से 71वें नंबर पर है। इंटरनेट के बारे में जो मेरी जानकारी है वह कहती है कि ‘कंटेंट इज किंग’।

अगर आपके पास अच्छा कंटेंट है और इंटरनेट के दांव पेंच को थोड़ा बहुत भी जानते हों तो आप ही राजा हैं। आप लोगों के लिए मेरा सपना पर प्रतिदिन आने वाले लोगों का एक ग्राफ।

blog visitors

लिखिए और मस्त लिखिए। मुझे पूरा विश्वास है आने वाला समय हम हिंदी वालों का ही है।

मेरा एक दोस्त मुझे इन सब को देखकर कह रहा है कि अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनना। मैंने उसकी बात को सही मान ली। आप भी ऐसा कह सकते हैं। लेकिन मैं सच बताऊं मैं आत्ममुग्ध कम होता हूं।

कमेंट डालने पर ताला मत लगाईए

लोगों को इसके बारे में पता तो होगा ही। अभी-अभी मैंने किसी पोस्ट पर कमेंट दिया और वो कहता है कि बाद अप्रूवल मिलने के बाद कमेंट को अपलोड किया जाएगा। क्यों?? कुछ समझ नहीं आया।

लोग अपने घर में ताला लगा कर रखते हैं कि कोई गलत आदमी प्रवेश ना करे। कुछ चुरा के कोई ना ले जाए। आप कहीं गालियों से डर कर तो यह मोडरेशन नहीं लगा रखा है? अगर हां तो एक बात बता दूं, आप सभी लोगों को कि आप जब किसी के बारे में कुछ बोलते हैं तो आप उस शख्स से कहीं ज्यादा अपने बारे में बता रहें होते हैं कि आप कौन और क्या हैं।

इसलिए डरना छोड़िए आटो अप्रूवल को ऑन कर दीजिए। अगर किसी को तकनीकी परेशानी हो तो श्रीश जी आपकी मदद के लिए हमेशा तैयार हैं। यह मैंने उनसे बिना पूछे लिखा है क्योंकि मुझे उनके बारे में जो पता है वह यह बताती है कि श्रीश जी चिट्ठेकारों के मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।

दिल्ली ब्लॉगर मीट: बतियाते बतियाते सांझ हो गई

अखबार के दफ्तर में हर सोमवार मीटिंग होती है। साथ में चाय-नास्ता भी होता है। बड़ा मजा आता है। चाय नास्ता करने में। मीटिंग में क्या मजा आएगा!

लेकिन कल पहले कैफे काफी हाऊस और बाद में मैथिली जी के यहां मिले। भई मुझे तो मजा आ गया। गणित में थोड़ा कमजोर हूं, गिनती नहीं कर पाया कितने लोग थे। वैसे जो भी थे मजेदार थे।

चाय और काफी की चुस्कियां लेने के बाद अमिताभ जी ने हमलोगों को 500 कैलोरी वाला लड्डू खिलाया। अमिताभ जी को मुबारकबाद दीजिए, उनको घर लक्ष्मी जी आई हैं। नया मेहमान आई हैं। उन्हें लड़की हुई है। उसके बाद हम हो चले मैथिली जी के यहां। बाजार के जानकार आलोक पुराणिक जी जिस बात को बताने के लिए $$$ लेते हैं वो हमने मुफ्त में जान लिया। बाजार किस तरीके से काम करता है, डिमांड एंड सप्लाई का पुराना गुरु मंत्र भी। भई सभी धुरंधर लोग जो पहुंचे थे।

उसके बाद खाने का दौर चला। कैलोरी 2900। अमित जी की साईज में तो बैठे-बैठे अंतर आ गया। सबने अपने अपने विचार रखे। हिंदी के उत्थान की बातें हुई। लोगों ने हिंदी को बढ़ाने के लिए तकनीकी, लेखन सामग्री की विविधता और ऐसे लेखन के बारे में बात की जो कालजयी हों।

परिचर्चा की बात उठी, चूंकि मैं परिचर्चा में शामिल नहीं होता हूं इसलिए मुझे कुछ खास समझ नहीं आ रहा था। लेकिन अब मैं कोशिश करूंगा कि परिचर्चा में भाग लूं।

अंत में पता चला कि यह गोष्ठी या मिलन ब्लागवाणी के आफिशियल या नान आफिशियल शुरुआत के नाम की जाए। तो यह थी बतियाते-बतियाते सांझ हो गई का छोटा विवरण। बड़ा आपके सामने जल्द ही चित्रों के साथ प्रस्तुत होगा।

ब्लागिंग से सड़क तक, सब अहम की लड़ाई लड़ रहे हैं!

मुझे तो ऐसा ही लगता है। जिसको ना लगता हो अपनी असहमति जरूर दर्ज कराएं। साथ में कारण बताएं।

अहम। एक से बढ़कर एक। पेशेवर ड्राइवरों में तो जबरदस्त होती है। वह मेरे से आगे कैसे निकल सकता है। मैं उसे साईड ही नहीं दूंगा। या फिर उसे ‘साईड’ ही लगा दूंगा।

सड़क दुर्घटना की खबर सुनकर मैं थोड़ा परेशान हो जाता हूं। लेकिन भागते दौड़ते शहर में यह रोज होता है और मैं जिस पेशे से जुड़ा हूं वहां रोज दस दुर्घटना की खबर आपको पढ़ने को मिलेगी। इनसब में से कई दुर्घटनाओं की मूल वजह अहम ही होती है।

ब्लागिंग में भी यही हो रहा है। कोई किसी को मेल कर रहा है कोई किसी के बारे में लिख रहा है तो कोई किसी के बारे में। लेकिन कोई भी गलती को नहीं देख रहा है। बहस होने पर तमाम तरीके के जस्टीफिकेशन। अहम ही इसकी जड़ है। वैसे इतना जरूर जानता हूं कि यह अच्छी बात नहीं है।

एक ब्लागर दूसरे को साईड नहीं देना चाहता। ‘साईड’ लगा देना चाहता है। लोगों ने गुट बना लिए हैं। मैं इसके गुट का और वो उसके गुट का। भई साहब मैं किसी गुट का नहीं हूं। मुझे बख्शे। मुझे लिखने की आदत है।

वैसे ऐसा नहीं है कि मैंने सड़क और ब्लागिंग के बारे में लिखा है तो अहम की लड़ाई केवल यहीं है। छोटे बड़े रूप में सभी जगह है।