दिल्ली की एक खास और अजीब बात

एक खास जिनके बारे में लोगों को पता होगा लेकिन लिखा नहीं गया। दिल्ली के खाने के बारे में कतई नहीं लिखूंगा। इस पर ब्लाग तो छोड़िए मोटी-मोटी किताबें लिखी जा चुकी हैं।

दिल्ली में एक फैशन पुरजोर है। हर बड़े शब्द को छोटा कर दीजिए। जिसे कहते हैं, शार्ट फार्म या एब्रीवियेशन। दिल्ली में चलने वाले कुछ पुराने शार्ट फार्म। आईटीओ, डीयू, जीके, साउथ एक्स, सीआर पार्क और भी कई हैं।

कुछ नए शाट फार्म। क्या आप इनके लांग फार्म जानते हैं? इंस्टी, सीसीडी, एनडी..। डीयू के तकरीबन हर कालेज को शार्ट फार्म ही लोग बोलते हैं। एलएसआर, एसआरसीसी, एमएच, सीएलसी, आईपी..।

कुछ न्यूज पेपर। टीओआई, ईटी, एचटी, एफई..।

और इसको बढ़ावा दे रहे हैं यहां के लोग, जो यहां के हैं नहीं। क्योंकि दिल्ली एक कोस्मोपोलिटन शहर है।

कुछ आपको पता हो तो आप इस लिस्ट को बढ़ा सकते हैं।

आईएएस और आईएएस का मक्का मुखर्जी नगर

अगर आपने आट्र्स की पढ़ाई की होगी या कर रहें होंगे तो आप भी आईएएस की तैयारी के बारे में सोचते होंगे। आपका जवाब नहीं है! मुझे सहज रूप से विश्वास नहीं हो रहा। मैं आपसे कहूंगा कि ईमानदारी से जवाब दें। हम भारतीय किसी बात का जवाब थोड़ा कम ईमानदारी से देते हैं।

और अगर आप इतिहास के विद्यार्थी रहे होंगे तो आप..।

मैं बुधवार को मुखर्जी नगर गया था। आईएएस का मक्का कहूं तो शायद कुछ गलत नहीं होगा। इसके दो-तीन किलोमीटर के एरिया में आट्रम लाईन, हकीकत नगर, परमानंद, नेहरू विहार, ढका गांव व अन्य कुछ छोटे जगह शामिल है।

छोटे-छोटे दर्जनों संस्थान से घिरा बत्तरा सिनेमा यहां के होनहारों के लिए शाम को चाय की चुस्की लेने का सबसे पसंदीदा स्पाट है। दो रुपये की चाय, ढाई रुपये की सिगरेट और तीस मिनट दोस्तों से बातचीत। यह शाम का माहौल है।

जागृति, लक्ष्य, दृष्टि, श्योर शाट, क्षितिज, केंद्र और ना जाने ऐसे ही कई प्रेरित करने वाले शब्दों से भरा है। यहां का पूरा आर्थिक बाजार इन विद्याथियों के सहारे ही चलता है। अक्टूबर में यहां मंदी आ जाती है। मेंस के बाद बहुत सारे विद्यार्थी अपने घर चले जाते हैं।

इन सबके साथ यहां के कुछ पार्को में आप उन जोड़ों को देख सकते हैं, जो पढ़ाई के साथ प्यार की पींगे भी बढ़ाते हैं। मेरे लिए वो भी वुड बी आईएएस की तरह हैं। कौन जाने प्यार की तरह वह अपने पढ़ाई पर भी पूरा केंद्रित कर लेते हों।

मेरे एक दोस्त ने बताया कि आज-कल में उनका प्री का रिजल्ट आने वाला है। उन सभी विद्यार्थियों को जिन्होंने आईएएस बनने को अपना सपना चुना है, उन्हें सलाम। क्योंकि मैं उतना हिम्मतवाला कभी नहीं बन सका।

Mukharjee Nagar in Wikimapia

क्या नहीं करना चाहिए

अगर आपको यह पता है कि आपको क्या करना चाहिए तो सच मानिए आप अच्छे हैं। लेकिन अगर आपको यह भी पता है कि आपको क्या नहीं करना चाहिए तो फिर आप ग्रेट हैं। इन सबके उलट अगर आपको यह पता है कि क्या करना चाहिए लेकिन यह नहीं पता कि क्या नहीं करना चाहिए तो मुमकिन है कि आप..।

नजीर पेश करता हूं। मेरे एक दोस्त को शेरो-शायरी का शौक चढ़ा। धीरे-धीरे इस शौक के कारण उसे उर्दू सीखने की ललक जगी। उसने एक लुगत खरीदी और उससे कुछ शब्द अपनी डायरी में नोट करने लगा। करता करता परेशान हो गया। उसे उर्दू तो ना आई सारे दोस्त उसका मजाक उड़ाने लगा।

मेरे दोस्त को यह तो पता था कि उसे उर्दू सीखनी है। भाषा का ज्ञान होना तो बड़ी अच्छी बात है लेकिन उसके लिए उसे क्या नहीं करना चाहिए, उसे नहीं पता था। मेहनत में उसने कोई कमी नहीं की लेकिन गलत दिशा में।

स्टाक एक्सचेंज और अच्छी पत्रकारिता का संबंध

रामनाथ गोयनका पत्रकारिता सम्मान में 24 उत्कृष्ट पत्रकारों को सम्मानित किया गया है। इनमें से कुछ को तो हम पहचानते ही हैं। बाकियों को कुछ जानते होंगे।

कल रात एनडीटीवी पर उस दौरान हुई बहस को देख रहा था। क्या अच्छी पत्रकारिता बुरा व्यवसाय है?

वैसे इसके बीच में बता दूं कि आजकल मैं शेयर मार्केट में खरीद-फरोख्त भी कर रहा हूं। वहीं से जोड़ कर यह विचार आया जिसे मैं यहां लिख रहा हूं।

आज भारत के हिंदी चैनलों पर भूत, सांप, बाबा, औघड़, हाथी आपको खूब मिल जाएंगे। और इनसे तथाकथित खुशी मनाने वाली टीआरपी भी मिल जाती है। यह खबरें नहीं होती हैं वरण टीआरपी का फंडा होता है।

ठीक इसी तरीके से शेयर बाजार में अगर कोई चलताऊ शेयर ले ले और उसे कुछ मुनाफा हो जाए तो उसे यह कतई नहीं समझना चाहिए कि ऐसे स्टाक्स अच्छे होते हैं। आज मिल रहे हैं, कल डूब भी सकते हैं।

लेकिन यदि आप ब्लू चिप्स खरीदते हैं तो आपका पैसा डूबेगा नहीं। भले आप उसे आल टाईम हाई में ही क्यों ना खरीद रहें हों। भारतीय बाजार में अभी अति संभावना है।

अब इसी को हिंदी पत्रकारिता से जोड़ दें। हमेशा ‘ब्लू चिप’ रिपोर्ट बनाने चाहिए इसमें आपको मुनाफा मिल कर ही रहेगा। आज नहीं तो कल। और इसी कारण गोयनका पुरस्कार पाने वालों में सारे ऐसे नाम थे जिन्होंने ‘ब्लू चिप’ रिपोर्ट बनाई थीं।

यह केवल पत्रकारिता और शेयर बाजार के लिए नहीं बल्कि इसे हम आप आम जिंदगी में भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

घर से बहुत दूर हूं, किसी चीज की कमी खली है

दिल्ली में रहते हुए पांच साल से अधिक हो गए। पिछले दो सालों से अकेले रह रहा हूं। उस पर से यह भाव विहीन शहर। मेरा पड़ोसी मेरा नाम नहीं जानता। हां, काम जानता है। वह भी मुझे लगता है कि पत्रकारिता के ग्लैमर के कारण। किसी बैंक में मैनेजर होता तो शायद ही जान पाता।

ना कोई संवाद, ना कोई विवाद। दफ्तर आना और चुपचाप अपने कमरे में चले जाना। किताबें पढ़ना, टीवी देखना। मेरे कमरे में मेरे दोस्त भी नहीं आते। अगर हमें मिलना होता है तो वह मुझे अपने यहां बुला लेते हैं।

मेरे कमरे से नजदीक नोएडा का सेक्टर 18 पड़ता है जहां हम दोस्त कभी-कभार मिल लेते हैं।

खैर जिसकी कमी खली उसके बारे में बात करूं। घर में तीन भाई-बहनों में सबसे छोटा होने के कारण मुझे थोड़ा ज्यादा ही प्यार मिला है। कल दीदी ने फोन किया तो बताया कि हम लोग फुलोरी खा रहे हैं। तो मैंने कहा यहां तो मैंने एक भी जिनोर नहीं खाया है, तो फुलोरी कहां से मिलेगा?

* फुलौरी: मक्के को पीस कर बनाया जाने वाला मीठा खाद्य पदार्थ
* जिनोर: मक्का, भुट्टा

तो भई यह मेरी पीड़ा। दिल्ली में रिश्तेदारों की बात की जाए तो मेरे एक मौसेरे भाई रहते हैं। भाभी इटावा की हैं। उन्हें फुलौरी के बारे में नहीं पता। उन्हें पता है, चिल्ला, मंगौड़े और पता नहीं क्या-क्या। जो मुझे नहीं पता था।

क्या आप लोगों को इस बारे में कुछ पता है? अगर नहीं पता तो इस लिंक को देखें। इसमें से प्याज, धनिया, नमक वाला आइटम हटा कर केवल चीनी डाल दीजिए फुलौरी तैयार हो जाएगा।

चिट्ठेकार माँ/पिता क्या आपने ध्यान दिया है?

आज सुबह मेरा भतीजा स्कूल के लिए तैयार हो रहा था तो मैंने देखा कि उसका स्कूल बैग में बहुत कापी किताब हैं। वह दस साल का है। पांचवीं कक्षा में है।

मैंने जब उस बैग को उठाया तो पता चला कि बैग का वजन कुछ पंद्रह किलो के आसपास होगा। स्कूल सीबीएसई मान्यता प्राप्त है। लेकिन कापियां आप बाजार से नहीं खरीद सकते। स्कूल की अपनी कापियां हैं। बड़ी कापियां। स्कूल के लोगो के साथ।

क्या यह सही है। बच्चा परेशान है। मां-पिता का कहना है कि हम क्या कर सकते हैं। यह बैग परशुराम के धनुष की तरह भारी है। बच्चे की पीठ झुकी जा रही है। क्या आपके बच्चे भी इसी तरह स्कूल जा रहे हैं? अगर हां तो कुछ कीजिए। या फिर आप भी साधारण मां-पिता की तरह यही कह रहे हैं कि क्या किया जा सकता है?

दिल्ली ब्लॉगर मीट: बतियाते बतियाते सांझ हो गई

अखबार के दफ्तर में हर सोमवार मीटिंग होती है। साथ में चाय-नास्ता भी होता है। बड़ा मजा आता है। चाय नास्ता करने में। मीटिंग में क्या मजा आएगा!

लेकिन कल पहले कैफे काफी हाऊस और बाद में मैथिली जी के यहां मिले। भई मुझे तो मजा आ गया। गणित में थोड़ा कमजोर हूं, गिनती नहीं कर पाया कितने लोग थे। वैसे जो भी थे मजेदार थे।

चाय और काफी की चुस्कियां लेने के बाद अमिताभ जी ने हमलोगों को 500 कैलोरी वाला लड्डू खिलाया। अमिताभ जी को मुबारकबाद दीजिए, उनको घर लक्ष्मी जी आई हैं। नया मेहमान आई हैं। उन्हें लड़की हुई है। उसके बाद हम हो चले मैथिली जी के यहां। बाजार के जानकार आलोक पुराणिक जी जिस बात को बताने के लिए $$$ लेते हैं वो हमने मुफ्त में जान लिया। बाजार किस तरीके से काम करता है, डिमांड एंड सप्लाई का पुराना गुरु मंत्र भी। भई सभी धुरंधर लोग जो पहुंचे थे।

उसके बाद खाने का दौर चला। कैलोरी 2900। अमित जी की साईज में तो बैठे-बैठे अंतर आ गया। सबने अपने अपने विचार रखे। हिंदी के उत्थान की बातें हुई। लोगों ने हिंदी को बढ़ाने के लिए तकनीकी, लेखन सामग्री की विविधता और ऐसे लेखन के बारे में बात की जो कालजयी हों।

परिचर्चा की बात उठी, चूंकि मैं परिचर्चा में शामिल नहीं होता हूं इसलिए मुझे कुछ खास समझ नहीं आ रहा था। लेकिन अब मैं कोशिश करूंगा कि परिचर्चा में भाग लूं।

अंत में पता चला कि यह गोष्ठी या मिलन ब्लागवाणी के आफिशियल या नान आफिशियल शुरुआत के नाम की जाए। तो यह थी बतियाते-बतियाते सांझ हो गई का छोटा विवरण। बड़ा आपके सामने जल्द ही चित्रों के साथ प्रस्तुत होगा।

‘Shakira’ कीवर्ड पर एक दिन में 221 हिट

कल मैंने कोई पोस्ट नहीं लिखी थी। और आज सुबह देखता हूं कि अंग्रेजी कीवर्ड Shakira से मेरा सपना में 221 हिट हैं। मैं तो पहले समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हुआ? शकीरा, 221, एक दिन में। कोई आइडिया नहीं। फिर पता चला कि icq.com पर इमेज सेक्सन में शकीरा सर्च करने पर मेरा सपना में डाली गई एक इमेज आती है। सारे लोग वहीं से आ रहे हैं। खैर आएं देखें।

पहले भारत गोल्बल हुआ, उस गोल्बल भारत में शकीरा आई और अब मेरा सपना गोल्बल हो रहा है। पोस्ट देखें।

ब्लागिंग से सड़क तक, सब अहम की लड़ाई लड़ रहे हैं!

मुझे तो ऐसा ही लगता है। जिसको ना लगता हो अपनी असहमति जरूर दर्ज कराएं। साथ में कारण बताएं।

अहम। एक से बढ़कर एक। पेशेवर ड्राइवरों में तो जबरदस्त होती है। वह मेरे से आगे कैसे निकल सकता है। मैं उसे साईड ही नहीं दूंगा। या फिर उसे ‘साईड’ ही लगा दूंगा।

सड़क दुर्घटना की खबर सुनकर मैं थोड़ा परेशान हो जाता हूं। लेकिन भागते दौड़ते शहर में यह रोज होता है और मैं जिस पेशे से जुड़ा हूं वहां रोज दस दुर्घटना की खबर आपको पढ़ने को मिलेगी। इनसब में से कई दुर्घटनाओं की मूल वजह अहम ही होती है।

ब्लागिंग में भी यही हो रहा है। कोई किसी को मेल कर रहा है कोई किसी के बारे में लिख रहा है तो कोई किसी के बारे में। लेकिन कोई भी गलती को नहीं देख रहा है। बहस होने पर तमाम तरीके के जस्टीफिकेशन। अहम ही इसकी जड़ है। वैसे इतना जरूर जानता हूं कि यह अच्छी बात नहीं है।

एक ब्लागर दूसरे को साईड नहीं देना चाहता। ‘साईड’ लगा देना चाहता है। लोगों ने गुट बना लिए हैं। मैं इसके गुट का और वो उसके गुट का। भई साहब मैं किसी गुट का नहीं हूं। मुझे बख्शे। मुझे लिखने की आदत है।

वैसे ऐसा नहीं है कि मैंने सड़क और ब्लागिंग के बारे में लिखा है तो अहम की लड़ाई केवल यहीं है। छोटे बड़े रूप में सभी जगह है।

टिप्पणी में पहचान छुपाने वाले चिट्ठेकार!

चूंकि मैंने ऐसा कभी किया नहीं तो इसका ठीक-ठीक अंदाजा मुझे नहीं पता। हां! इधर मेरे पोस्ट पर बेनाम टिप्पणियां कुछ आ रही हैं। मैंने जानना चाहा और मैं जान गया कि वह कौन है। आईपी सबकुछ बता देता है।

खैर इसके पीछे का मतलब मैं समझ नहीं पाया। मुझे नहीं लगता कि मेरे से कोई डरता होगा। फिर..! शायद वह अपने आप से डरता होगा। हां, यह जरूर हो सकता है। वह अपने आप से ही डरता होगा।

मैंने कई पोस्ट में बेनाम टिप्पणियां देखी हैं और बार यही सोचता था कि यह लोग ऐसी हरकतें क्यों करते हैं। आप ऐसा काम क्यों करते हैं जिससे आपको अपनी पहचान छुपानी पड़ती है। जो लिखे खुल कर लिखें। हां, गालियां तो खुल कर नहीं लिखी जा सकती हैं तो ऐसा करें कि थोड़ी लिखने की प्रैक्टिस करें गालियों से ज्यादा धार दार लिखावट लिखनी आ जाएगी। लेकिन कृप्या बेनाम टिप्पणी लिखना बंद करें। शायद आप बेनाम लोग समझ रहे होगें।