मेरा ऐसा मानना है कि शिक्षा अकेली ऐसी चीज है, जो किसी की प्रकृति को बदल सकती है। चाहे फिर वो किताबों से मिले या किसी की निजी जिंदगी से।
विचारों की उड़ान हो या कल्पनाशीलता की भव्यता, जाति और धर्म को लेकर समझ को बनाने में इन किताबों ने खासा महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन किताबों से चीजों को देखने का नजरिया बदला है।
मेरी भी प्रकृति बदली है, जिसमें कुछ किताबों का खास योगदान है।
संस्कृति के चार अध्याय -रामधारी सिंह दिनकर
द अल्केमिस्ट -पावलो कोहेलो
फ्रीडम एट मीड नाईट - डामिनिक लैपियर और लैरी कोलिंस
टोपी शुक्ला -डा राही मासूम रजा
कितने पाकिस्तान -कमलेश्वर
टोबो टेक सिंह -सहाअदत हसन मंटो
हैरी पाटर सीरिज -जे के रोलिंग
साथ ही कई और लेख, अखबार की कतरने, पत्रिकाएं आदि।
क्या पढ़ना चाहिए से ज्यादा जरूरी जानना है कि क्या नहीं पढ़ना है। यह मैंने अपने स्कूल के दौरान सीखा था लेकिन अब पत्रकारिता में आकर लगता है नहीं सब कुछ पढ़ना चाहिए लेकिन आपमें अच्छे और बुरे को अलग करने का गुण जरूर होना चाहिए।



