पहले दोनों शब्दों के बारे में जानना जरूरी है। बुद्धिजीवी और लड़ाई। सपाट शब्दों में कहूं तो कई विषयों की जानकारी रखने वाला या किसी भी विषय पर कम से कम आधा घंटे का भाषण तो दे ही दे, बुद्धिजीवी कहलाते हैं।
और लड़ाई तो ब्लागरों को पता होगा ही(यहां हर दूसरे महीने लड़ाई तो होती ही है)। लड़ाई कोई जरूरी नहीं है कि शारीरिक रूप से लड़ी जाए, शब्दों के अलावा ऐसे किसी भौतिक वस्तु का इस्तेमाल कर सामने वाले को आहत करना ही मेरे नजर में लड़ाई है।
अब मुद्दे की बात करता हूं। बात पिछले रविवार की है जब लोग तनाव में थे कि भारत आस्ट्रेलिया से पार पाएगा या नहीं। धोनी की टीम कंगारूओं को मात देने के लिए कमर कस रही थी और साथ ही करोड़ों जोड़ी आखें इस तनाव में भागीदार बनने को आतुर थी। उसी समय उर्दू प्रेस क्लब में फासिज्म एंड टेरररिज्म: टू साईड्स आफ द सेम क्वाईन मुद्दे पर बहस के लिए कुछ लोग इकट्ठा हुए थे।
इस पर बहस के लिए बुद्धिजीवियों की मंडली में जो गणमाण्य लोग आए थे, उनके नाम हैं: विहिप के सुरेंद्र जैन, इतिहासकार अमरेश मिश्र, नेशनल कांफ्रेंस सांसद एआर शाहीन, पत्रकार मनोज रघुवंशी, लेखिका अरुंधती राय और कौमी पार्टी के मोहम्मद हसनैन।
पूरा वर्णन मैं यहां नहीं दूंगा कि वहां क्या-क्या हुआ लेकिन कुछ खास बातें बता दूं। अरुंधती राय ने यह कहकर मंच में बैठने से मना कर दिया कि वह नेताओं के साथ मंच पर नहीं बैठती, वह दर्शकदीर्घा में ही बैठी। नेताओं से भरे इस मंच मंडली राम और प्रोफेट मोहम्मद को जो कुछ नहीं कहा जाना चाहिए वह सब कुछ कहा गया। तल्ख बातें हुई मनोज रघुवंशी और हसनैन के बीच। अंत हुआ पुलिस के आने के बाद। लोगों से सुनने में आया कि विहिप के कार्यकर्ता लाठियों के साथ रास्ते में खड़े हैं, जो अफवाह थी या सच, पता नहीं।
पूरा वर्णन पढ़ने के लिए आज का टाइम्स आफ इंडिया पृष्ठ संख्या 10 देखें।
वाह रे बुद्धिजीवी। आप भी जरा पढ़ लें।


