इस शीर्षक को समझने के लिए हिंदी और अंग्रेजी के पत्रकारों से बात किजिए…बात थोड़ी बहुत समझ में आ जाएगी…ऐसा कम हुआ है कि रिपोर्ट हिंदी में लिखी या बनाई गई हो और उसका अनुवाद या प्रोडक्शन अंग्रेजी वालों को करना पड़ा हो. एमजे अकबर जब संडे आब्जर्वर के संपादक थे तब वह एसपी सिंह के नेतृत्व में निकलने वाली रविवार के कुछ रिपोर्ट को अंग्रेजी में अनुवाद कराकर निकालते थे…
आज सुबह ऐसा ही कुछ वाक्या मैंने देखा…मैंने एक रिपोर्ट फाईल की जो हमारे इनहाउस के बारे में थी…मैंने वह रिपोर्ट अंग्रेजी वालों को इसलिए बता दी कि इनहाउस का मामला है वह भी देख लें….मुझसे कहा गया कि मैं उस हिंदी का अंग्रेजी अनुवाद करके दे दूं….
मैं समझ नहीं पाया कि मैं दे दूं….क्यों….मैंने साफ-साफ कहा कि जब हम अनुवाद करते हैं तो क्या कभी कहा कि आप हमें ट्रांसलेट करके दे दीजिए….
मैंने उसका अनुवाद नहीं किया…लेकिन वह तल्ख रवैया तो जरूर देखा….
यह है अंग्रेजी की तल्खी….







सुखद अनुभुति ; ऐसा ही होना चाहिये; यही सहज स्थिति है।
राजेश जी, आजकल हिन्दी रिपोर्टिंग का अंग्रेजी में अनुवाद अनेकों जगह प्रयोग में लाया जा रहा है. पहले एसी स्थितियां नहीं दिखतीं थी.
बस अनुनाद जी के शब्द ही मौजूं लग रहे हैं
सुखद अनुभुति ; ऐसा ही होना चाहिये; यही सहज स्थिति है।
बहुत दिनों बाद नजर आए वो भी गुस्से में….भाई…जमाना इतनी तेज रफ़्तार का है की सब कुछ रेडीमेट चाहिए…..