2008 का नवबंर महीना, मैं पोस्ट लिख रहा हूं, कई लोग लिख रहे होंगे…लेकिन कई लोग ऐसा भी कुछ कर रहे होंगे जिनके बारे में 2012 में कहीं लिखा कहा जाएगा कि यह 2008 में फलां फलां कर रहे थे…
मैं नहीं जानता वह क्या काम करे हैं…हम में से बहुत कम ही लोग होंगे जो यह जानते होंगे….
मैं यह नहीं कहता कि हमारी समाजिक जिम्मेदारियां नहीं हैं या फिर हमें ऐसे चीज में पिले पड़े रहना चाहिए जो केवल समाज को सुधारने का काम करे…ना एकदम नहीं…
सामंजस्य होना चाहिए…
आप सभी लोग उस इंसान के बारे सोचिए जिनके आप कद्रदान हैं…उनके बारे में सोचिए जिनके काम करने के तरीके का आप नकल उतारने की कोशिश करते हैं…उनमें भी कमी होगी…
मैं गांधी को संपूर्ण के करीब मानता हूं…संपूर्ण नहीं मानता क्योंकि गलतियां उन्होंने भी की है…हर कोई करता है. मैं, आप..हम सभी लोग
मैं यह नहीं कहता कि पोस्ट लिखना बेकार है…वाह-वाह करना बेकार है…बधाई देना बेकार है…
लेकिन…
क्या उसे ईमानदारी से जीवन में उतारते भी हैं या सिर्फ पोस्ट ही भर है…
बांग्लादेश के ग्रामीण बैक की स्थापना मोहम्मद युनूस ने 1983 में रखी थी…नोबेल प्राईज उन्हें 2006 में मिला था. एक हम हैं पोस्ट लिखते हैं और पेज रिफ्रेश कर तत्काल देखते हैं कि क्या कोई कमेंट आया है क्या?
गीता में कहा गया है, कर्म करो फल की चिंता मत करो…
मैं कहता हूं…निष्छल भाव से कर्म करो और फल की चिंता मत करो…
इस बातों का भी विरोध करने वाले ढेरों पड़े हुए हैं…
लिखिए, खूब लिखिए लेकिन केवल इतना ही ध्यान रखिए कि जो लिख रहें हैं वैसा ही आप हों भी… मतलब कि लिखने का केवल ढ़ोग ना करें….
अंत में प्रशांत प्रियदर्शी के लिए यह लिंक







नही कर रही लिखने का ढोंग संचिका देखिये..आपसे सहयोग आपेक्षित है
JI mai to in sab chijon me padta hi nahi.
Bas taknik bata hun humor nahi.
Sansaar bada jatil hai.
आपकी भावनाओं की कद्र करती हूँ….मगर आपकी पोस्ट से आंशिक असहमति भी रखती हूँ!मुझे लगता है …जो लोग इस तरह की पोस्ट लिख रहे हैं, वे सभी कहीं न कहीं अपने स्तर पर अपनी समाज के प्रति ज़िम्मेदारी का निर्वाह भी अपने ढंग से करते हैं!लेकिन एक व्यक्ति के द्वारा किया गया छोटा सा प्रयास, इतने बड़े परिद्रश्य पर कहीं दिखाई नही देता!
और जहाँ तक सिर्फ़ पोस्ट लिखने की बात है….जो इस तरह की संवेदनशील पोस्ट लिख रहा है ( मैं अनुराग जी की बात कर रही हूँ) वह अपने विचार , बेचैनी और संवेदनशीलता तो पोस्ट के रूप में हम तक पहुँचा सकता है लेकिन अपने द्वारा किए गए अच्छे काम कभी पोस्ट पर नही लिखेगा! और लिखना कतई ज़रूरी नही है!
इसलिए हर लिखने वाला ढोंग कर रहा है ये कहना सही नही होगा….लेकिन यदि फ़िर भी कोई लोग ऐसा कर रहे हैं तो शायद आपकी पोस्ट पढ़कर अपने लिखे पर अमल भी करेंगे!
बात में दम तो है ! इसीलिए ज्यादा फंडे वाली पोस्ट मैं नहीं लिखता
प्रिय राजेश
सच कहूँ तो वाकई उम्र ओर वक़्त के साथ न हम उतने ईमानदार रहे है न उतने बैचैन …पर शायद उसका एक हिस्सा कही न कही किसी रूप में पैसे कमाने की जद्दो जेहद ओर दूसरी तमाम मसरूफियत के .बावजूद …..हाईटेक होते इस समाज में .. बचा हुआ है ..ओर शायद ये सारी कवायद उसको ही बचाने की है ….
इन साठ सालो की आज़ादी के बाद भी इस देश का केवल एक तबका ” हाईटेक ” हुआ है ….ये देश का दुर्भाग्य ही है ..यही अब्दुल कलाम जिनको पुरा देश नवाजता है जब राष्टपति पड़ के लिए दुबारा नामांकित होते है .तो राजनैतिक गलियों के गठजोड़ में उनकी सारी योग्यता अचानक गायब हो जाती है…..
आख़िर में चलते चलते कभी एक चिन्तक ओर विचारक रामचंद्र ओझा जी का एक लेख मैंने कही पढ़ा था जिसमे उन्होंने कहा था जो केवल भावनाओ से निर्णय ले ,वह वैजानिक सोच नही ….जो सत्य नही वह अभिव्यक्ति नही ….पर इस सबके बीच ये भी महत्वपूर्ण है की “हम संवेदना से परहेज नही कर सकते क्यूंकि संवेदना हमारा मूल है ,हमारे सारे मूल्य ओर यहाँ तक की “लोजिक “की जननी भी संवेदना ही है …बुद्दि-विवेक के साथ उत्तरदायित्व होना भी मनुष्य के लिए जरूरी है ….
रोशन जी
आपके लिखे को एक गुणी दृष्टि से पढ़े जाने की जरूरत है,और मनन भी ,जीवन मैं अतिशय यांत्रिकता मैं खोया आदमी शायद इस पर ध्यान दे ?..विरोधियों की चिंता भी ना करें बस मानवीय सरोकारों की पैरवी हम करें,इतनी सरलता से एक गंभीर मुद्दे पर फोकस करने के लिए आभार.