बचपन में किसी ने पूछा था, क्या बनोगे? ठीक-ठीक याद नहीं कि क्या बोला था.. केंद्रीय विद्यालय से दसवीं, रांची के गोस्सनर कालेज आई काम लेकर इंटरमीडिएट की, क्999 में। तब तक माल कल्चर भारत में नहीं आया था.. और मैं अकाउंटस का हिसाब करोड़ों का बनाया करता  था। हिसाब बनाते वक्त बाहर से कोई सुन ले तो सोचेगा कि पता नहीं कितना रुपये हैं.. उसके बाद इकोनोमिक्स से ग्रेजुएशन कर ली.. भारत की कृषि से लेकर अपने आरबीआई और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पढ़ता रहा…। तब तक मैं नहीं समझ पाया था कि दाल रोटी का जुगाड़ कैसे करूंगा..? दिल्ली आया डेढ़ साल तो मजे में बिता दिए.. उसके बाद फिर से पढ़ाई और फाईनली पत्रकारिता के कीड़े ने मुझे काट लिया..

पिछले तीन साल से दैनिक जागरण का नमक खा रहा था.. बीच में कई लोगों ने कहा, पैसे नहीं इस फील्ड में छोड़ दो.. तात्कालिक सेलरी से दुगने पर किसी वाणिज्यिक कंपनी में बात हुई..लेकिन पत्रकारिता का भूत इतनी जल्दी नहीं उतरता और अब उतरेगा भी नहीं..ऐसा लगता है।

जागरण डाट काम में तीन साल तक काम करता रहा.. खूब मीठे अनुभव, कुछ कसैले भी.. कुल मिलाकर अनुभव खूब मिले। सभी मूड के लोगों के साथ काम किया.. इसके साथ मेरा भी एक मूड मिला.. जलेबी समौसे की पार्टियां खाई… लेकिन अब…
नौकरी बदल रहा हूं.. इंडिया टुडे डाट काम जा रहा हूं…