पिछले दस दिनों में भारतीय राजनीति में जो हुआ उस से मुझे कोई भारी ताज्जुब नहीं हुआ। संसद की लाज किसी ने अगर बचाई तो वह थे अकेले सोमनाथ दा ने। सोमनाथ दा को मेरा नमन। हमारे अच्छे कहलाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जरूर बेदाग प्रधानमंत्री हैं। इसमें किसी को कोई शक-सुबहा नहीं होगा। इसके बावजूद संप्रग के प्रधानमंत्री होने के कारण कई उंगलियां तो उन पर उठेंगी।
विचारधारा की राजनीति करने वाली पार्टी वाम दलों ने दिखाया कि अब वह भी विचारधारा को ताक पर रख सकते हैं। वाम की विचारधारा में जातिगत राजनीति नहीं हैं। लेकिन..। मायावाती के साथ आगे आकर वाम दलों ने अपने विचारधारा की भी मिट्टी पलीद कर दी।
विनाश काले..विपरीत बुद्धि..
शंकर सिंह वाघेला, नटवर सिंह जैसे कई बड़े नेता जो कभी भाजपा में होते हैं तो कभी कांग्रेस में तो कभी सपा, बसपा के साथ..। वाम दलों का कोई नुमाइंदा किसी दूसरी पार्टी के साथ नहीं जा मिलता लेकिन सोमनाथ को पार्टी से निकालने के बाद.. शायद ऐसे कई लोग भी होंगे जो अब लेफ्ट से राईट या सेंटर में जाना पसंद करेंगे।







इतना दुख तो मुझे तब भी नही हुआ था जब संसद पर आतंकवादी हमला हुआ था.. ये तो उस से भी ज़्यादा दर्दनाक है
सोमनाथ दा नमन करने लायक हैं. प्रधानमंत्री बेदाग़ हैं. वैसे अगर अच्छे कामों के लिए लगे तो; ‘दाग अच्छे हैं न.”
सोमनाथ दा को मेरा नमन।
आपसे शत प्रतिशत सहमति के साथ सोमनाथ जी को मेरा भी नमन .और जन्म दिन की बहुत सारी शुभकामना . विश्वास मत के दौरान चल रहे बहस का अद्भुत संचालन उनके भरपूर योग्यता को रेखांकित करता है .यह भी साबित
होता है ग़लत लोगों ने अपना नेता कितना सही व्यक्तित्व वाले को चुना था.
देशहित से बड़ा पार्टी हित नही होना चाहिए . कोई जयचंद नही है . लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले पार्टी के अन्दर राजतन्त्र के पुरजोर पक्षधर दिख रहें हैं .तर्क भी होगा उनके पास .
सतही तौर पर आपकी बातें सच जान पड़ती है
पर अगर कुछ और ही सत्य हुआ तो मसलन मैंने सुना है उनको सौ करोड़ मिले हैं
तो क्या?
क्या ये असंभव है?