भूत-प्रेत से बड़ा है यह डर। कोई काला जादू नहीं लेकिन डर है कि लोग फुसफुसाते हुए भी डरते हैं। यह समाज का डर है। इससे डरते सभी लोग है। इसका मंतर अभी कम लोग सीख पाए हैं। सो डरते रहते हैं। कुछ सीख रहे हैं, कुछ सीखेंगे। धीरे-धीरे..।
उसकी बेटी ने प्रेम विवाह कर लिया।
उसके घर लड़का आता है।
यह फुसफुसहाट है। समाज के अंदर समाज के लोगों की ही। समाज में मान और शान की इतनी फिक्र होती है कि लोग समाज से डरने लगते हैं। किसी घर की लड़की अपनी दादी की मौत में श्मशान घाट जाना चाहती है। चली भी जाती है। और उसके बाद शुरू होता है समाज की फुसफुसाहट..। उसकी लड़की…
मुझे याद है जब मैंने अपना मूंछ साफ कर लिया था। डर तो मेरे अंदर भी था, समाज का। कौन, क्या-क्या बोलेंगे? घर वालों ने कुछ नहीं कहा। मां, पापा, भईया, दीदी किसी ने नहीं। एक पिता के दोस्त ने गौर से पहले देखा..। एक बुजुर्ग मेरे दूर के दादा जी लगते थे, कहा.. इतना पढ़ने के बाद भी तुमलोगों को जब यह ज्ञान नहीं है, तो हमलोग कैसे सिखाएंगे! मैं समाज के डर से चुप रहा। कुछ भी तो नहीं बोला था मैंने।
समाज का डर कई रूप में सामने आता है, कई रूप में आता रहेगा। समाज जरूरी है, कहीं बिखर ना जाए इसलिए इस समाज के डर को करीने से तोड़ने की जरूरत है।







समाज हमारे द्वारा बना हुआ ,नियम भी हमारे .और डर भी हमारा ..पर शुरुआत जरुरी है उन डर को तोड़ने की जो आजादी की साँस लेने से भी रोक लेते हैं
ठीक बात कही आपने..
इस समाज के डर को करीने से तोड़ने की जरूरत है। यह बढ़िया कहा आपने।
घुघूती बासूती
कई सालो से इस समाज को ढूंढ रहा हूँ……..ये कम्बखत मिलता ही नही……
समाज जरूरी है, कहीं बिखर ना जाए इसलिए इस समाज के डर को करीने से तोड़ने की जरूरत है।
–बहुत गहरी बात कही है!!
bahut sahi bhaayaa ………..
e sasura dar jo hai……..
आपकी कलम का क्या कहना.इक गुस्ताखी कर रहा हूँ गर समय मिले तो
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