केहुनी को टेबल पर टिकाए, दाहिने गाल में हाथ रखकर आप कितने को सुनते रहते हैं? सोचते हैं, गुनते हैं। नया साल आने पर रिसोओलूशन लेते हैं, कम बोलूंगा। फिर भी कर नहीं पाते। सुनने की नहीं, ज्यादा बोलने की आदत है आपको।
सामने वाले ने बात पूरी की नहीं है और हड़बड़ाहट इतनी है कि आप कहना शुरू कर देते हैं। गरमागरम माहौल हो जाता है, गर दूसरा भी गुड लिस्नर नहीं रहा तो। ज्यादा बोलने को लोग इगो तक ले जाते हैं।
इस बोलने के चक्कर में लोग पता नहीं क्या-क्या बोल जाते हैं। सामने वाले को ही चुप होना पड़ता है। मेरे एक दोस्त का दोस्त कहता है, कैलाश खेर की आवाज कितनी अच्छी है। पूरे मन से गाता है। दूसरे दोस्त ने ठीक करते हुए कहा, मन नहीं दिल से। वह कहता है, मन से गाता है तभी तो इतना अच्छा गाता है। दूसरा चुप हो गया..।
नवजोत सिंह सिद्धू को लोगों को सुन ही नहीं पाते। उन्हें बोलने की आदत है, शायरी बोलने की, गुरु बोलने की.. कईयों को होती है। के्रडिट कार्ड बेचने वाले काल टेलर को सर बोलने की आदत होती है। वह हर बात के साथ सर को को प्रत्यय और उपसर्ग रूप में जोड़ता/जोड़ती रहता/रहती हैं।
ज्ञान बघारना चाहते हैं लोग। ज्यादा बोलकर, लिखकर..। अपने को ज्यादा समझदार सामने वाले को अपने से कम बेवकूफ समझते हैं। उधर संसद, रैलियों में नेता बोलते हैं। अजी बोलते कम हैं लोगों को वोट के लिए रिझाने की कोशिश करते हैं।
लिस्नर कोई नहीं बनना चाहता। सब आरेटर होना चाहते हैं, वक्ता..। मुंबईया फिल्म की हीरो की तरह..। धैर्य रखिए..लिस्नर बनने की कोशिश कीजिए..।