आतंकवाद से निपटने वाली एक वीडियो

बम विस्फोट और उसके बाद का रुदण.. गहरे घाव छोड़ जाता है। कोई जीवन जीने की सतत प्रक्रिया के तहत इस भूल जाता है तो कोई.. कैसे कोई भूल पाएगा..।

30-32 लोगों की लाईन लगी हुई है। वो ऐसी चीज लेने आए हैं, जिसे कोई लेना नहीं चाहेगा.. कोई नहीं। डेथ सर्टिफिकेट मिलता है यहां। भारी मन से, न चाहते हुए भी.. जिंदगी का कड़वा सच पीना पड़ता है।

कल मेरी एक दोस्त वीडियो को देखना चाहती थी। बचपन की याद के कारण लेकिन मुझे लगा कि इसकी आज ज्यादा जरूरत है। बहुत ज्यादा.. हम आपको इस विडियो को देखना और समझना होगा।

आर यू अ गुड लिस्नर?

केहुनी को टेबल पर टिकाए, दाहिने गाल में हाथ रखकर आप कितने को सुनते रहते हैं? सोचते हैं, गुनते हैं। नया साल आने पर रिसोओलूशन लेते हैं, कम बोलूंगा। फिर भी कर नहीं पाते। सुनने की नहीं, ज्यादा बोलने की आदत है आपको।

सामने वाले ने बात पूरी की नहीं है और हड़बड़ाहट इतनी है कि आप कहना शुरू कर देते हैं। गरमागरम माहौल हो जाता है, गर दूसरा भी गुड लिस्नर नहीं रहा तो। ज्यादा बोलने को लोग इगो तक ले जाते हैं।

इस बोलने के चक्कर में लोग पता नहीं क्या-क्या बोल जाते हैं। सामने वाले को ही चुप होना पड़ता है। मेरे एक दोस्त का दोस्त कहता है, कैलाश खेर की आवाज कितनी अच्छी है। पूरे मन से गाता है। दूसरे दोस्त ने ठीक करते हुए कहा, मन नहीं दिल से। वह कहता है, मन से गाता है तभी तो इतना अच्छा गाता है। दूसरा चुप हो गया..।

नवजोत सिंह सिद्धू को लोगों को सुन ही नहीं पाते। उन्हें बोलने की आदत है, शायरी बोलने की, गुरु बोलने की.. कईयों को होती है। के्रडिट कार्ड बेचने वाले काल टेलर को सर बोलने की आदत होती है। वह हर बात के साथ सर को को प्रत्यय और उपसर्ग रूप में जोड़ता/जोड़ती रहता/रहती हैं।

ज्ञान बघारना चाहते हैं लोग। ज्यादा बोलकर, लिखकर..। अपने को ज्यादा समझदार सामने वाले को अपने से कम बेवकूफ समझते हैं। उधर संसद, रैलियों में नेता बोलते हैं। अजी बोलते कम हैं लोगों को वोट के लिए रिझाने की कोशिश करते हैं।

लिस्नर कोई नहीं बनना चाहता। सब आरेटर होना चाहते हैं, वक्ता..। मुंबईया फिल्म की हीरो की तरह..। धैर्य रखिए..लिस्नर बनने की कोशिश कीजिए..।

आपलोगों को क्या बताऊं, कि ब्लास्ट के बाद क्या-क्या हुआ?

blast

कि एक मृतक परिवार के पिता के आंखों से आंसू नहीं आ रहे
कि मुआवजा लेने के लिए मृतकों को फाइलों में कितनी बार मारा गया
कि राजनेताओं के घर मीटिंग चलेगी, जिसमें आरोप-प्रत्यारोप को लेकर बहस थोड़ी आहिस्ता होगी
कि खून की राजनीति करते नेताओं को शर्म भी नहीं आएगी
कि खून पानी में जा मिला, मानो हमलोग खून और पानी मे विभेद भूल गए हों
कि..
कि..
कि पता ही ना चले कि क्या लिखें….

भावनाएं और संवेदनाएं जम जाती होंगी!

कई बार भूल जाता था वह। उसे जाने का रास्ता याद होता था लेकिन लौटने का..।

ऊंची-ऊंची इमारतों को निशान रूप में देखता था। वह बोर्ड.. जो बताती थी कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का रास्ता मुखर्जी से नगर से राजघाट की ओर आते हुए दाहिने कटेगी..
आह! रेलवे स्टेशन.. घर की याद आती थी उसे। अभी दो महीने होने में तीन दिन बाकी हैं। गहरे डूब जाता था, घर की याद में। तिस पर दिल्ली की उमस भरी गर्मी।

सर्र..सर्र.. बगल से जाती गाडि़यों की आवाज ने उसका ध्यान तोड़ा। शांति वन बस स्टाप पर मुद्रिका का इंतजार कर रहा था। किसी ने बताया था कि मुद्रिका का मतलब जो चक्कर लगाती है। गोल-गोल। अंगूठी के गोलाकार की तरह। और फिर, जहां से चली थी वही आकर मिल जाती हो।
वह भी मुद्रिका बन जाना चाहता था।

तभी बस आ गई। कई लोगों के साथ मैं भी सवार हुआ। बस खाली ही थी। सभी सीट पर लोग बैठे हुए थे। कुछेक लोग खड़े थे। एक वृद्धा भी। अपने लाठी और सीट के हैंडल को पकड़ कर खड़ी थी। महिलाओं की तरफ वाली सीट में सभी महिलाएं और बाकी सीटों पर पुरुषों का कब्जा था। किसी ने खड़ा होना मुनासिब नहीं समझा।

frozen ground

कैसा अजीब शहर है!
भावनाएं और संवेदनाएं भाप की तरह उड़ जाती हैं। कहीं नजर ही नहीं आता।
सोचता हूं..
जनवरी में क्या होता होगा?
शायद भावनाएं और संवेदनाएं जम जाती होंगी!

कई बार बदल देती है यह.. जिंदगी भी

frozen emotions

उस नमक को भी खरोंचा था
बड़ा मीठा सा स्वाद था
जो आज भी है तुम्हारे.. चेहरे पर

कितना खरचा था
और ना जाने कितना खरच होगा
तेरी याद में मेरे.. आंसू

सालती है
वह हंसी और खुशी
जब अब मिली.. जुदाई

कि अब हमने सीखा
मौसम बदलने का मतलब
कई बार बदल देती है यह.. जिंदगी भी

जो वामपंथी हैं और जो नहीं हैं..

left partiesपिछले दस दिनों में भारतीय राजनीति में जो हुआ उस से मुझे कोई भारी ताज्जुब नहीं हुआ। संसद की लाज किसी ने अगर बचाई तो वह थे अकेले सोमनाथ दा ने। सोमनाथ दा को मेरा नमन। हमारे अच्छे कहलाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जरूर बेदाग प्रधानमंत्री हैं। इसमें किसी को कोई शक-सुबहा नहीं होगा। इसके बावजूद संप्रग के प्रधानमंत्री होने के कारण कई उंगलियां तो उन पर उठेंगी।

 विचारधारा की राजनीति करने वाली पार्टी वाम दलों ने दिखाया कि अब वह भी विचारधारा को ताक पर रख सकते हैं। वाम की विचारधारा में जातिगत राजनीति नहीं हैं। लेकिन..। मायावाती के साथ आगे आकर वाम दलों ने अपने विचारधारा की भी मिट्टी पलीद कर दी।

 विनाश काले..विपरीत बुद्धि..

शंकर सिंह वाघेला, नटवर सिंह जैसे कई बड़े नेता जो कभी भाजपा में होते हैं तो कभी कांग्रेस में तो कभी सपा, बसपा के साथ..। वाम दलों का कोई नुमाइंदा किसी दूसरी पार्टी के साथ नहीं जा मिलता लेकिन सोमनाथ को पार्टी से निकालने के बाद.. शायद ऐसे कई लोग भी होंगे जो अब लेफ्ट से राईट या सेंटर में जाना पसंद करेंगे।

सबसे बड़ी लोकतान्त्रिक देश, भारत की राजनीति की एक पेंटिंग

indian politcs

एटमी डील सभी पार्टी चाहते हैं!!

nuclear deal

मैं मजाक नहीं कर रहा हूं। सच कह रहा हूं। आप भी मानेंगे कि एटमी डील के पक्ष में सभी पार्टियां हैं। मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा, समर्थन वापस लेने वाली लेफ्ट और कांग्रेस तो है ही। लेकिन थोड़ा बदलाव चाहती पार्टियां। क्या..?

कांग्रेस : अभी हो जाए एटमी डील सबसे बेहतर।
भाजपा : एटमी डील कांग्रेस के साथ ना होकर हमारे साथ हो तब बेहतर।
लेफ्ट : एटमी डील अमेरिका के साथ ना होकर चीन या रूस के साथ हो तो बेहतर।

यही सच है।

समाज का डर

dark societyभूत-प्रेत से बड़ा है यह डर। कोई काला जादू नहीं लेकिन डर है कि लोग फुसफुसाते हुए भी डरते हैं। यह समाज का डर है। इससे डरते सभी लोग है। इसका मंतर अभी कम लोग सीख पाए हैं। सो डरते रहते हैं। कुछ सीख रहे हैं, कुछ सीखेंगे। धीरे-धीरे..।

उसकी बेटी ने प्रेम विवाह कर लिया।
उसके घर लड़का आता है।

यह फुसफुसहाट है। समाज के अंदर समाज के लोगों की ही। समाज में मान और शान की इतनी फिक्र होती है कि लोग समाज से डरने लगते हैं। किसी घर की लड़की अपनी दादी की मौत में श्मशान घाट जाना चाहती है। चली भी जाती है। और उसके बाद शुरू होता है समाज की फुसफुसाहट..। उसकी लड़की…

मुझे याद है जब मैंने अपना मूंछ साफ कर लिया था। डर तो मेरे अंदर भी था, समाज का। कौन, क्या-क्या बोलेंगे? घर वालों ने कुछ नहीं कहा। मां, पापा, भईया, दीदी किसी ने नहीं। एक पिता के दोस्त ने गौर से पहले देखा..। एक बुजुर्ग मेरे दूर के दादा जी लगते थे, कहा.. इतना पढ़ने के बाद भी तुमलोगों को जब यह ज्ञान नहीं है, तो हमलोग कैसे सिखाएंगे! मैं समाज के डर से चुप रहा। कुछ भी तो नहीं बोला था मैंने।

समाज का डर कई रूप में सामने आता है, कई रूप में आता रहेगा। समाज जरूरी है, कहीं बिखर ना जाए इसलिए इस समाज के डर को करीने से तोड़ने की जरूरत है।

मेरी कविता और राजनीतिक चर्चा

indian politicsमेरा कम पसंदीदा विषय,
राजनीति
अजीब है स्थिति
लाल लाल हुए जा रहे हैं
भगवा को सही-गलत सूझ नहीं रहा
कांग्रेस मोहरों की गणित सीख रही

हर एक इंसान की किसी पार्टी का फालोअर होता है।
किसी को प्रधानमंत्री मेकर लालू पसंद है
किसी को भावी प्रधानमंत्री राहुल
किसी को एनाउंनस्ड प्रधानमंत्री आडवाणी
किसी को वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन
किसी को सुपर प्रधानमंत्री सोनिया
राजनीति में तथ्यपरक बातें कम
वस्तुपरक बातें ज्यादा होती हैं

आप पूरे घटनाक्रम पर नजर डालिए
शेक्सपियर का नाम में क्या रखा है
फेल हो रहा है,
लखनऊ हवाईअडडे का नाम बदल
चौधरी चरण सिंह हवाईअड्डा हो गया
अजीत सिंह, बसपा के करीब हो आए

दोस्तों अपने विचारधारा को टटोलिए
सोचिए, किस पार्टी के साथ हैं आप?
एटमी डील अच्छा है या नहीं?
कांग्रेस जो मोहरे इक्टठे कर रही है,
भाजपा जो ललचाई नजरों से ताक रही है,
लेफ्ट जिनके पास अमेरिका के अलावा और कुछ नहीं है
या उन नेताओं के साथ, जिनको जेल से बेल मिल रहा है..

किनके साथ हैं आप?

यह 22 तारीख तक का गुणा-भाग है
इसके बाद के समीकरण बाद ही बदलेंगे
चुनाव और चुनाव बाद की राजनीतिक चर्चा तो आप भी समझ जाएंगे

तो किसके साथ हैं आप?