..फोटोग्राफर चल दिए इंडिया गेट

दिल्ली में बारिश हुई। अखबार और चैनल से जुडे़ फोटोग्राफर और कैमरामैन चल दिए इंडिया गेट..। मानो पूरा दिल्ली वहीं जुटा हुआ हो। कैमरा रोल हुआ.. आंखे कुछ खास नहीं ढूंढती। उन्हें कुछ सुंदर चेहरों की तलाश होती है। कुछ साल पहले तक केवल लड़कियों के ही चित्र छपते थे। अब थोड़ा जमाना बदल गया है। अगर फोटो किसी जोड़े की हो तो क्या कहने! couple in monsoon

दिल्ली में यह मिल भी जाता है। यहां फोटोग्राफरों को दिक्कत नहीं होती। बाकी खबरों की तरह यहां नहीं कहना पड़ता, थोड़ा हाथ पकडि़ए, ऐसे नहीं.. आप थोड़ा पीछे..। यह सब यहां नहीं चलता। एकदम नैचुरल क्लिक होती है। और कैमरे में कैद हो जाते हैं जोड़े। दिल्ली में रहने वाले किसी अखबार के आज का पहला और दूसरा पन्ना देख सकते हैं। इस बारिश में जो कौमन होता है वह इंडिया गेट और लड़कियां..।

फोटो साभार: हिन्दुस्तान टाइम्स

कुर्सी वाला, जोंक हो जाता है!

चोल, चेर और पाण्डय
मुगल भी आपस में लड़ पड़े
देशी क्या विदेशी भी

इतिहास की बात छोडि़ए
आजकल तो आफिस में भी
कुर्सी की भीषण लड़ाई हो रही…

आजकल सभी,
जोंक होने की चाहत रखते हैं
क्योंकि कुर्सी वाला, जोंक हो जाता है

मैं तुझे मीर कहूं तू मुझे गालिब

मेरे एक ब्लागरोल का नाम है। इसके मुतालिक अनुभवी ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ने एक पोस्ट लिखा। बड़ा अच्छा पोस्ट लिखा है। पाठकगण आप लोग भी इसे पढ़े।

पूरा पोस्ट मैंने भी पढ़ा, वहां टिप्णणी देने के बजाए, सोचा एक पोस्ट लिख देता हूं। लिखने लगा तो दो शे’र याद आने लगे। शायर का नाम याद नही. किसी पाठक को पता हो तो जरुर बताये. अग्रिम धन्यवाद आप भी पढे़,

कहां से आ गई दुनिया कहां, मगर देखो
कहां-कहां से अभी भी कारवां गुजरता है।

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बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ जिंदगी, हम दूर से भान लेते हैं।

किसकी और क्या है दिल्ली!

पिछले सात सालों से दिल्ली में रह रहा हूं, इसके साथ 27 साल की उम्र की समझ के साथ जो दिल्ली को देखा, सुना, पढ़ा, उसी मुतालिक कुछ पंक्तियां जोड़ने की कोशिश..

लुटियंस से लेकर केपी सिंह तक..
कितनों ने बनाया और कईयों ने लूटा..
दिल्ली ही घर है..

देश के अलग अलग हिस्सों से आए
उन 750 सांसदों की,
जिन्होंने देश को देने से ज्यादा इससे लिया है

सुप्रीम कोर्ट में हक के लिए लड़ने आए
देश के कई लोगों की भी..
जो लूटे होते हैं और देश का कानून उन्हें और लूट लेता है

थोड़ा व्याकुल, थोड़ा उत्साहित
रोजगार के लिए गांव से आने वाले उस युवक की भी
जो अभी ट्रेन में बैठा भी नहीं है

चौड़े सड़क पर झूम कर चलने वाले
उन नौजवानों की भी
जो वीकेएंड में अखबार का हिस्सा बन जाते हैं

कुकुरमुत्ते की तरह खुले पत्रकारिता में पढ़ने वाले
युवा पत्रकार से लेकर वरिष्ठ पत्रकारों की भी
जो सीवी, फोन और मुलाकात का सिलसिला नहीं छोड़ते

ब्लू लाईन, व्हाइट लाइन, मुद्रिका और बाहरी मुद्रिका
आफिस से परेशान उन लाखों यात्री की भी
जो जवानी का आधा हिस्सा बस में गुजार देते हैं

नार्थ कैम्पस, साउथ कैम्पस और मुखर्जी नगर
पढ़ने आए उन छात्रों की भी
जिनके हाथों में फरवरी में सुर्ख लाल गुलाब नजर आते हैं

एम्स, अपोलो और सफदरजंग आने वाले
बीमार और उन तीमारदारों की भी
जिन्हें खुशियां तो, कभी गम ज्यादा मिलते हैं

बाकि बचे हम साधारण लोग

काम से छूटे
किराए घर में आए
कुंवारा खाने की, विवाहित अन्य परेशानियों में
लग जाता है..
रात को देर से सोना
..फैशन मान लिया जाता है।
कंम्प्यूटर और लैपटाप में खिटिर फिटिर के बाद
पांच बाई साढ़े छ: के बिस्तर में
..आठ बजे जल्दी उठ जाते हैं।
कई रिपोर्ट और कई लेखनी
दिलवालों से लेकर, संवेदनाओं से मरा हुआ
र्ईट और गारे से भरा हुआ
शहर बता चुके हैं।
लोगों कहते हैं..
दिल्ली का मौसम, अपना नहीं है
राजस्थान इसे गर्मी और हिमाचल सर्दी दे जाता है

नेताओं ने इस बात को सुनकर
पूरी दिल्ली को ही शंघाई बनाने का फैसला किया
करोड़ों खर्च किए
सफर, आस्था और जज्बा बढ़ाने वाले
मेट्रो, मंदिर और खेल गांव बनवाए

दिल्ली का दिल धड़कता है-

नेता, आरोपी बेरोजगार और नौजवानों में
पिछे नहीं हैं छात्र, पत्रकार और बीमार

इंडिया गेट, लाल किला, कुतुब मीनार
जनपथ, मोनेस्ट्री और पालिका बाजार
यही है यहां की पहचान
इसी से बढ़ती है दिल्ली की शान

विचारों के ताने-बाने

puzzle

कितना शोर है
चारो ओर
मेरे विचार भी उलझने लगते हैं,
इन सब में।

सुलझाना जो चाहता हूं, मैं इनको
कोई एक और विचार आ जाता है
सुलझने नहीं देता
मेरे विचारों को

आह!! करके जो मैंने छोड़ दिया
अपने विचारों को,
सुलझने लगे यह खुद ब खुद…

सरकार राज, क्यों जाए कोई दर्शक देखने?

Sarkar raj posterतेज बजता बैकग्राउंड म्यूजिक, क्लोजअप कैमरा, अंधेरे कमरे में बातचीत। पूरी फिल्म में यही तीन चीजें सबसे ज्यादा मिलेंगी। फिल्म का अंतिम संवाद, अनिता राज (ऐश्वर्या राय बच्चन) बोलती हैं, एक कप चाय देना..। जिस राजनीति को इतना गंदा और “काला”  दिखाया गया है उसे अनिता कुछ ही दिनों में समझ जाती है.

कैलाश खेर की आवाज में फिल्म की थीम की तरह बार-बार गूंजती है..
साम, दाम, दंड, भेद।
साम, दाम, दंड, भेद ..

राजनीति का काला चेहरा दिखाने वाली फिल्म सरकार राज पिछली फिल्म सरकार से 19 है। शायद 18..।

फिल्म के पोस्टर में अभिषेक बच्चन अमिताभ बच्चन और ऐश्वर्या के बीच में दिखते हैं। लगता है कि अभिषेक को प्रोमोट करने के लिए फिल्म बनाई गई है लेकिन सशक्त भूमिका वाला शंकर नागरे का किरदार भी अभिषेक वैसा नहीं कर पाए, जैसा उनके फैन उनसे उम्मीद रखते हैं।

गोविंद नामदेव और सय्याजी शिंदे भी नकारात्मक भूमिका में नहीं जमे। एक पल को तो लगता है कि फिल्म को बच्चन परिवार को दिखाने के लिए बनाया गया है, या फिर इसके निर्माता अमिताभ बच्चन हैं।

महाराष्ट्र में एक पावर प्लांट लगना है और उसको लेकर हो रही राजनीति के ताने बाने के चारो तरफ घूमती है, सरकार राज। फिल्म शुरुआती हफ्ते में बच्चन परिवार के कारण थोड़ी जरूर भीड़ खींच ले जाए लेकिन इसके बाद सरकार राज को कोई भी सरकार (डिस्ट्रिब्यूटर) नहीं रखना चाहेगी।
 

21वीं सदी का शनिवार!!

इस शनि का उदय इसी 21वीं सदी में हुआ है। जब भारत की सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में सबसे ज्यादा देर रहने का रिकार्ड बना रही थी। चुपके से शनि भी भारतीय लोगों पर अपनी जगह बना रहा था। नए-नए शनि मंदिर खुल रहे थे। मैं दक्षिण दिल्ली के एक शनि मंदिर को जानता था। आज दिल्ली में ही पांच शनि मंदिर हैं। काला लिबास इसकी पहचान है। आपको अपने शहर के ट्रैफिक लाईट में शनि के भक्त उस बरतन को लिए खड़े मिल जाएंगे, जिससे आप कल तक दूध लाया करते थे। थोड़ा तेल भरा हुआ है। कुछ सिक्के पड़े हुए हैं।

यह शनि वार एक अलग तरीके का शनिवार है। अभी कल ही तो अपने पति को फिजूल की बाईक राईडिंग पर पत्नी ने झिड़की लगाई थी। पेट्रोल की कीमत इतनी बढ़ गई है और आप हैं कि बाईक इधर-उधर डोलाए जा रहे हैं। और आज पत्नी घर से सरसो का तेल कटोरी में निकाल कर दान करने जा रही हैं। महंगाई गई तेल लेने।

21वीं सदी के शुक्रवार को ही मीडिया शनिवारमय हो जाती है। शनि दोस्त है, दुश्मन नहीं। सात माला पहने, लैपटाप रखे पंडित जी दर्शकों के सवालों का जवाब देते दिखते हैं। ग्राफ्कि्स से बताया जाता है कि यह शनिवार कई मायनों में अद्भुत है। दर्शक को समझ नहीं आता कि यह डरने वाला शनिवार है, या खुश होने वाला।

21वीं सदी का शनिवार गांवों तक नहीं पहुंचा है। इसका वार अभी केवल बड़े शहरों तक ही है।

इस शनिवार का गणित के सापेक्ष के फार्मूला की तरह लगती है। Saturday is directly relate to Money। शनिवार को सीधा सीधा मतलब पैसे से है।  आपके पास पैसा है तो आप शनि का वार आप पर हो सकता है। नहीं है तो किसी का वार आप पर नहीं हो सकता है। आप बेकार हैं।

मैं और पेड़

अपने आस पास के पेड़ो को देखकर कई बार कुछ सोचता हूं। कैसे कैसे पेड़। उन्हीं पेड़ों की प्रकृति और मेरी प्रकृति की घालमेल है यह कविता…

cactus and desert

मैं पीपल बनना नहीं चाहता,
बड़ा ही सामंती पेड़ है।
औरों को बढ़ने ही नहीं देता।

मैं बोंस्आई की किस्म बनाना भी नहीं चाहता,
चाहता हूं कि प्रकृति ने जिसे जो दिया वह उसे मिले
अपनी बांहे फैलाएं, वह टहनियां, जिसे विज्ञान रोकता है।

मैं कैक्टस बनना चाहता हूं,
कम संसाधन में अपनी जिंदगी को जिऊं
रेगिस्तान में लोगों को आशातीत करता रहूं , जिंदगी यहां भी संभव हैं।

भाजपा या वाम की सरकार होती तो क्या नहीं बढ़ते तेल के दाम?

भाजपा ने कहा, आर्थिक आतंकवाद है यह। माकपा ने अपने तीनों शासित राज्यों में हड़ताल कर दिया है। इस तेल की पाठशाला में क्या फेल हो गए मनमोहन?

राय बनाने से पहले कुछ खबर, जो जरूरी है-
भारत: तेल कीमतों में 10 फीसदी की वृद्धि।

मलेशिया: यहां पेट्रोल 1.92 रिंगेट है। (24 रुपये लीटर) सरकार को तेल की कीमते कम रखने केलिए 55 बीलियन रिंगेट (71400 करोड़ रुपये) की सब्सिडी देनी पड़ती है।

ताईवान: तेल की कीमतों में 13 फीसदी की वृद्धि।

श्रीलंका : 14 से 47 फीसदी तक बढ़ाए गए पेट्रोल और डीजल के दाम।

बांग्लादेश: 37 से 80 फीसदी तक दाम बढ़ाए जाने का प्रस्ताव।

एक महीने की यह गतिविधि कुछ तो समझा ही सकती है।

कच्चा तेल की कीमत में दो महीने में 25 फीसदी से ज्यादा की उछाल।
क्या इन सब को देखते हुए भी किसी को लगता है कि भाजपा या वाम की केंद्र में सरकार होती तो नजारा कुछ और होता.. राय देकर बता ही सकते हैं? क्या पता आपके पास आईडिया हो जो सरकार के पास ना हो…

भारतीय राजनीति को दिखाने वाले शब्द

सेज-सेतु, मंदिर-नंदीग्राम
तेल-खेल, धार-हड़ताल
चुनाव-वोट, भाजपा-कांगे्रस
वाम-धमकी, मान-मन्नौव्वल
नेता-गिरी, नेतागिरी
इस्तीफा-हल्ला, संसद-मछलीबाजार
मीडिया-रिपोर्ट, स्टूडियो-खद्दर
बयान-मुकरना, नीति-अनीति-राजनीति

ढेर सारे शब्द हैं! कुछ आप भी जोड़ दें..