
कुछ इसे साहित्यिक, कुछ किताबी, कुछ फितूर भी कह सकते हैं। मेरा एक जिगरी यार इसे थ्योरिटिकल कहता है। कहता है, थ्योरी के लिए ठी क है, प्रैक्टिकल का भान नहीं है तुम्हें..
मैंने कहा झूठ बोलना बुरी बात है लेकिन कई बार लोग झूठ इसलिए बोलते हैं क्योंकि वह प्रैक्टिकल है। मैं भी इसे सही मानता हूं। और आलोचना की स्वतंत्रता को भी.. प्रैक्टिकल रूप में..।
आलोचना की स्वतंत्रता की एक खास बात यह है कि इसमें आलोचना करने वाला से खास आलोचना सुनने वाला होता है। अपनी आलोचना..। भई सीधी सी बात है, एकदम सीधी.. आपकी आलोचना तभी कोई करेगा जब उसे कुछ दिखेगा। आलोचना करने वाला कौन है? उसका आलोचना करने का ढंग क्या है? ..भाषा क्या है? ..लहजा क्या है?
नासमझ है। ..एक सीमा तक आप उसे इग्नोर कीजिए।
अनजाना है। ..एक सीमा तक आप उसे इग्नोर कीजिए।
परीचित है और समझदार है। ..गौर कीजिए, उसके सामने अपने आपको रखिए। तर्क दीजिए। समझाइए।
निंदक नीयरे राखिये, आंगन कुटी छबाये..
हर इंसान अपने समझ को जानता है (कई बार नहीं भी जानता है)। आप अपनी आलोचना सुन नहीं सकते तो समझिए कमी कहीं आपके अंदर ही है। सामने वाले को इतना स्पेस आप दें कि वह आपको ना भी कह सके। आप के गलत को ना कहने में वह झिझके ना।
मैं अपने ब्लाग में माडरेशन नहीं रखता। ना रखना चाहता हूं। कई बार लोगों ने बुरा कहा.. कभी खुलकर, ज्यादातर बेनामी। मैं उनसे अपने पाठकों, मित्रों से निवेदन करता हूं कि आलोचना करें.. तो खुलकर करें। मुझे आप अपने तर्क से सहमत कर दें। मैं सहज रूप से आपकी बात मानने को तैयार हो जाऊंगा।
आलोचना की स्वतंत्रता का मैं पक्षधर हूं। लोग हों ना हों..