रेड लाईट

traffic lightयह पिछले पोस्ट वाला रेड लाईट नहीं है। यह है ट्रैफिक की रेड लाईट। कभी ग्रीन तो कभी रेड। आरेंज तो बस होता ही भर है..। अपने संस्कारों के लिए जाना जाने वाला यह देश, इन लाइटों का सम्मान कम ही करता है।

एक अजीब मानसिकता है। आपने भी किया होगा या फिर महसूस तो किया ही होगा। अभी रेड लाईट की गिनती कम हो रही है..9, 8, 7, 6, 5 और यह क्या लोग अपनी मोटरसाइकिल और कार के एक्सीलेरेटर पर पांव रख देते हैं और उधर ग्रीन वाल भी यही चाहता है 5, 4, 3, 2, 1 एक बाद भी वह चल सकता है। सभी को जल्दी होती है। रूकने वाला रूकता नहीं है और चलने वाला कुछ जल्दी ही जाना चाहता है।

छोटे शहर की ट्रैफिक देख कर लगता है कि हां, भारत में भगवान बसते हैं। कोई आ रहा है, कोई जा रहा है। किधर से आ रहा है और किधर जाएगा केवल चलाने वाला ही जानता है।

साइकिल वालों को तो ना रेड लाईट से मतलब है ना ग्रीन लाईट से। उनके लिए केवल दिल्ली में ही नाम के नियम हैं। बाकी भारत तो उनके लिए खुला है। दिल्ली में भी वह चले जा रहे हैं।

दो पहिया में चलाने वाला और पीछे बैठने वाले के लिए हेलमेट पहनना जरूरी है (दिल्ली में)। अगर महिला हो तो इसकी छूट है, क्यों? किसी को पता हो तो जरूर बताईगा। क्या दुर्घटना होने पर महिलाओं को चोट नहीं लगेगी?

इसी रेड लाईट की दुनिया पर फिल्म बन गई ट्रैफिक लाईट।

दिल्ली की चौड़ी सड़कों पर गाडि़यों का बढ़ता दबाव, किलर ब्लू लाईन बसें, बीआरटी कोरीडोर, मेट्रो का विस्तारीकरण और उसके बाद हमलोग का जल्दीपना।

आराम से चलिए या फिर आप जानिए, यह भारत की ट्रैफिक है, बाबू साहब।

रेड लाईट एरिया की सेक्स वर्कर

Red Light Areaकोई हर दिन मारा जा रहा है
…और कोई इसे ही लाइफ बन गई बता रहा है
ये बुझने के बाद और भड़कने वाली आग है
कोई जानबूझकर तो कोई जबरदस्ती झोंका जा रहा है.
ये मर्ज है या दवा?
इसकी खोज ख़बर किया नही जा रहा है.
डाक्टर अनुराग जी के पोस्ट से प्रेरित 

सचिन तेंदुलकर: घर की मुर्गी दाल बराबर

दाल कितनी भी अच्छी क्यों ना बने मुर्गे जैसी तो नही ही बन सकती. चाहे आप हींग, घी या किसी और का ही तड़का क्यों ना लगा दे. लेकिन अगर मुहावरा बना है की घर की मुर्गी दाल बराबर तो इसका कुछ तो मतलब जरुर बनता होगा.

सचिन तेंदुलकर: भारत की खेल दुनिया के अब तक के सबसे बड़े खिलाड़ी. Anjali, sara and arjun tendulkarअपने बच्चो अर्जुन और सारा के लिए दाल के ही बराबर हैं. क्योंकि दोनों बच्चे सचिन के नही खली के फैन हैं. सचिन ने जब बच्चो को खली से मिलवाया उसके बाद सचिन ने कहा शायद अब बच्चे मेरी बात माने क्योंकि मैंने उनलोगों के उनके सबसे बड़े फैन से मिलवाया है.

बच्चे भी… :) :)

आओगे जब तुम.. अंगना फूल खिलेंगे..

बहुत ही खूबसूरत बोल हैं इसके और उतनी खूबसूरती से आवाज दिया है इसे उस्ताद राशिद खान साहब ने। मैंने फिल्म नहीं देखी है। फिल्म का विडियो कुछ समझ नहीं आ रहा लेकिन फिर गाने का स्टैंडर्ड इतना हाई है कि इस मैं पिछले एक घंटे में आठ बार सुन चुका हूं। Hats Off to Whole Team of This Song।

गाने को सुनिए और बोल गुनगुनाना चाहें तो वह भी हाजिर है।

आओगे जब तुम सजना
आओगे जब तुम सजना
अंगना फूल खिलेंगे

बरसेगा सावन,
बरसेगा सावन
झूम झूम के
दो दिल ऐसे मिलेंगे

आओगे जब तुम सजना
अंगना फूल खिलेंगे

नैना तेरे कजरारे
नैनों पे हम दिल हारे हैं

अंजाने ही तेरे नैनों ने
वादे किए किए सारे हैं
सांसों ही लहर   मद्धम चले
तो से कहे

बरसेगा सावन
बरसेगा सावन
झूम झूम के
दो दिल ऐसे मिलेंगे

आओगे जब तुम सजना
अंगना फूल खिलेंगे

चंदा को उठा रातों में
है जिंदगी तेरे हाथों में
पलको पे झिल मिल तारे हैं
आना भरी बरसातों में
सपनों का जहां
होगा खिला खिला

बरसेगा सावन,
बरसेगा सावन
झूम झूम के
दो दिल ऐसे मिलेंगे

फिल्म- जब वी मेट
संगीतकार- संदेश शांडिल्य
गीतकार- इरशाद कामिल
गायक- उस्ताद राशिद खान 

शहर का सहरा बनना

metro citiesसहरा काट कर शहर बना
लेकिन…
हंसी है लेकिन बनावटी
बातें हैं लेकिन बतकही नही
दोस्त हैं लेकिन मतलबी
अपने हैं लेकिन अपनापन नही

यही मिजाज है शहर का. यह शहर नही सहरा होता जा रहा है

रवीश को पढने के बाद ये ख्याल आए सो उंगलिया चल निकली

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सहरा: जंगल

समाज

indian societyअभी नेपथ्य से किसी ने आवाज़ लगाई
मंच पर तो कोई भी नही था
तमाशबीन बहुधा थे
एक हुंकार हुई
और सब चले गए

संवेदनाओं का मरना क्या होता है?

एमबीबीएस मुन्नाभाई ने कहा, यह शरीर है। प्रयोग करने की प्रयोगशाला नहीं।
प्रोडक्ट और लैब की तरह इसका उपयोग हो रहा है।
दो रुपये और दो जान के खेल में एक लाख का मुआवजा
इस खबर पर आंखों से आंसू भी नहीं निकलते।
केवल दिल से निकलती है एक आह!
क्या संवेदनाओं का मरना इसी खबर को कहते हैं?

बहुत कुछ दरक रहा है।

कुछ तो दिख जाता है, कुछ दिखता हीं नहीं। लोगबाग कभी-कभी महसूस कर लेते हैं। बिना आवाज के। हर रोज कहीं ना कहीं। नामालूम होने वाली आवाज के साथ। कभी कहीं तो कभी कहीं। कभी देख कर भी नहीं देख पाते। कोई जरूरी नहीं कि इसकी कीमत हम ही चुकाएं, लेकिन कोई तो जरूर चुकाएगा। कभी अनजाने तो कभी जाने पहचाने।

चिडि़यां का चहचहाना गायब। उसकी जगह कार के हार्न बजेंगे।
शेर की दहाड़ गायब, उसके जगह मेट्रो रेल दौड़ेगी।
नदी की कलकल आवाज गायब, लोगो की चीखें गूजेंगी।
समाज से संवेदना गायब, रुदन और सन्नाटा कायम।
चैन, मौन में बदला, शब्द गायब, महसूस करने वाले गायब

आमिर और “शाहरुख़” ब्लॉग पर और टिप्पणियों में गालियों की बौछार

ब्लॉग का नशा आप और हम पर ही नही है यह आज कल बॉलीवुड भी पहुँच चुका है. आमिर खान तो पिछले साल भर से ब्लॉग लिख रहे हैं अमित जी ने अभी शुरू किया है. कई और  सेलिब्रिटी भी लिखते हैं.

आमिर के नए ब्लॉग पर “शाहरुख़” को जगह मिली है. अपने किंग खान शाहरुख़ नही, आमिर खान के पंचगनी में जो कुत्ता है, उसका नाम है शाहरुख़. पूरा ब्लॉग क्या है वो तो आप यहाँ पढ़ लीजिये लेकिन जो टिप्पणिया मिली है और बिना मोदेरेशन के वह टिप्पणिया पड़ी है. वो काबिले गौर है. टिप्पणिया नही हैं या तो प्रशंसा है या फ़िर गालिया. आमिर को गालिया, उनकी पत्नी किरण को गालिया.

ये गालिया भड़ास हैं या फ़िर पोस्ट आप पढ़ कर सोचे और समझे 

जयपुर में ब्लास्ट, क्या इनका कोई पैटर्न होता है??

आतंकवाद का कोई पैटर्न नही होता. वो कही भी हो सकता है. वहा जहा ज्यादा से ज्यादा लोग हताहत हो. इनका काम होता है लोगो में खौफ पैदा करना. एक साथ पूरे राज्य पूरे देश में. इनका कुछ होता है या नही होता है नही मालूम लेकिन कोई धर्म कोई मजहब तो एकदम नही होता है. यह बच्चों, बुजुर्गो, मुसलमानो, हिन्दुओ सबसे घृणा करते हैं. भारत में यह हिन्दुओ को पाकिस्तान में मुसलमानों को, अमेरिका में ईसाईयो इनको नफरत है. यही है इनका पैटर्न.
यह लिस्ट आप लोगो को बताने के लिए काफी होगा की आतंकवाद की ना ही जात है ना ही कोई मजहब. कभी कही धमाका तो कही किसी प्लेन का अगवा. ये Destrctive Mind के होते हैं. बस यही है इनका पैटर्न.