एमबीबीएस मुन्नाभाई ने कहा, यह शरीर है। प्रयोग करने की प्रयोगशाला नहीं।
प्रोडक्ट और लैब की तरह इसका उपयोग हो रहा है।
दो रुपये और दो जान के खेल में एक लाख का मुआवजा
इस खबर पर आंखों से आंसू भी नहीं निकलते।
केवल दिल से निकलती है एक आह!
क्या संवेदनाओं का मरना इसी खबर को कहते हैं?







यह और ऐसी ही अनेकों खबरें हमारे आस पास रोज हैं जो संवेदनाओं के मरने को परिभाषित करें. आप सही कह रहे हैं.
आज कुछ ऐसा ही हमने भी सोचा …..
दुनिया जहान मे हमेशा कुछ नकुछ घटते रहने पर ऐसा ही महसूस होने लगता है …