जीभों पर कांटे उगे, मन में उगे बबूल।
रिश्ते कोई प्यार के, कैसे करे कबूल॥
चादर से बाहर हुए, नई सदी के पांव।
भाई-भाई में चले, ‘शकुनी’ वाले दांव॥
बड़के को नथनी मिली, छुटके को जंजीर।
बिटिया के हाथों लगी, अम्मा की तस्वीर॥
मान-पान सम्मान सब, चाह रहे है आप।
ये सब पाना था बना, क्यों बेटी का बाप॥
सांई इस संसार में, ऐसे मिले फकीर।
भीतर से ‘लादेन’ है, बाहर दिखे कबीर॥
धूप सयानी हो गयी, बौनी होती छांव।
रिंग रोड पर सोचते, कहां खो गया गांव॥
काबिज है गोदाम पर, मिस्टर सत्यानाश।
‘सवासेर गेहूँ’ नहीं, प्रेम चन्द्र के पास॥
[डॉ. सुरेश अवस्थी]
117/233, नवीन नगर, काकादेव, कानपुर
मैंने इसे पढ़ा तो लगा कि यह तो आज के बारे में कहा गया है. इसलिए आपलोगों के सामने पेश कर रहा हू. डाक्टर सुरेश जी को इनती अच्छी कविता के लिए मेरी ओर से बधाई
साभार: दैनिक जागरण







बहुत अच्छा डॉ सुरेश जी की ये रचना आज के आपसी रिश्ते की कलई खूब ढंग से खोलती है…मज़ा आ गया सुरेश जी के साथ साथ आप भी बधाई के पात्र हैं जो इस कविता को चुन कर हमारे लिये लाए हैं….
सुंदरतम। शानदार। जानदार। ऐसी ही और रचनाएँ पढ़वाने की कृपा करें।
एक एक दोहा अनमोल है…अवस्थी जी की जितनी प्रशंशा की जाए कम है…ऐसे दोहों की दिल में जगह होती है इसलिए उनका शब्दों से आंकलन नहीं किया जा सकता.
इतने सुंदर दोहे पढ़वाने के लिए साधुवाद.
नीरज
शुक्रिया राजेश
आभार आपका डाक्टर सुरेश जी की रचना को हम सब के साथ बांटने के लिये. मेरी ओर से भी डॉ सुरेश अवस्थी जी को बधाई.
सभी बेहतरीन दोहे…
***राजीव रंजन प्रसाद
dohe bahut achchhe hain