रंगा सियार!!

ओ भाई, थोड़ा आगे चाल, गाडी पूरी खाली पडी है। गेर के रास्ता कूं खड्डा हे।

हाथ में हैरी पाटर की किताब थी और मैं उसका पूरा रस्सावदन कर रहा था।

किलर लाइन से प्रचलित दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन सेवा ब्लू लाइन पर कई दिनों बाद सवारी कर रहा था।

मैंने सर उठाकर देखा, बाल बिखरे हुए, हाथों में दस, बीस और पचास के नोट एक खास अंदाज में मोड़े हुए दूर से मुझ पर चीख रहा था। नीली वर्दी पर काला बैज पर लिखा था, संवाहक संजय

मेरे दिमाग में अचानक ख्याल आया- रंगा सियार

जिंदगी की चाह और जिंदगी की राह

आप जो सोचते हैं वह जिंदगी का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जिंदगी नहीं। जिंदगी वह जो आपके साथ हो रहा है।

मेरा कोई दोस्त अपनी अपनी सरकारी बैंक की नौकरी को छोड़ चाट्र्ड अकाउंटेंट की तैयारी करने की सोच रहा है। उसने मुझे बताया, बरबस मेरे मन में ख्याल आया कि..

जो सवाल हर बच्चे से किया जाता है, कभी मुझसे भी किया गया था। क्या बनना चाहते हो। बड़ी धुंधली सी याद है, मैंने कहा, पायलट। प्लेन में उड़ना, इतनी ही समझ थी पायलट को लेकर। और वह पायलट कलम, हमेशा साथ भी तो रखता था। अच्छी यादें हैं।

वह पायलट की याद अब समय के साथ मद्धिम हो रही थी और मेरी पढ़ाई भी। इंजीनियर को लेकर मेरे मन में कुछ अच्छी तस्वीर नहीं बन रही थी और दसवीं पास होने के बाद मैंने कामर्स ले लिया।

गोस्सनर कालेज, रांची की बिल्डिंग बड़ी सुंदर थी उतनी अच्छी मेरी अकाउंटस में समझ नहीं थी। शाम के धुंधलके में हम कुछ दोस्त सीए और सीएस की बातचीत करते थे। वो रुतबा, वो सिग्नेचर की स्टाइल। काफी कुछ लुभाता था। लेकिन दूसरे साल में मैंने यह कहना शुरू कर दिया था कि अकाउंट्स में कमांड नहीं बन रहा है। और पास होते ही हर बिहारी(तब तक झारखंड अलग नहीं हुआ था, उसके दूसरे साल झारखंड अलग हो गया) की तरह यूपीएससी और आईएएस के बीच में सही अंतर जाने हुए भी आईएएस की सोचने लगा। पटना कालेज में एडमिशन के बाद जिंदगी एकदम से तेज हो गई थी जो मेरी पकड़ से बाहर थी। कालेज को छोड़ना पूरी जिंदगी के सोच में शामिल नहीं थी लेकिन जिंदगी में यह शामिल हो गया।

उसके बाद आईएएस की सोच भी छूटी लेकिन दिल्ली का साथ पकड़ लिया इस बीच अर्थशास्त्र से स्नातक पूरी हो चुकी थी।

कहीं काम करते हुए पूरा देश घूम चुका था। कई समझ अंकुरित हो रही थी जो पूरे पेड़ का रूप ले ही रही थी कि दैनिक जागरण में कब आ गया पता भी नहीं चला।

पूरी जिंदगी का मजा ले रहा हूं और जहां पड़ाव मिले वह असल में मेरे लिए पड़ाव नहीं ब्रेकर जैसे थे। मैंने चलना नहीं छोड़ा। और आज सबके सामने हूं।

छोटी नहीं, बड़ी जिंदगी और मजेदार जिंदगी के मजे लीजिए।

गालियों के केंद्र में महिला क्यों?

इस ओर कभी ख्याल ही नहीं गया था। किसी ने बातों बातों में कहा और मैं सोचने लगा। हिंदी में दी जाने वाली ज्यादातर गालियों में महिलाओं को केंद्र में रखा जाता है।

 गालियों का दिमागशास्त्र लिखते वक्त भी मैंने यह सोचा था कि सबसे गाली किसने दी होगी। लेकिन अब तो बात यह है कि दी होगी तो क्या सोचकर ऐसी बात कही होगी कि सामने वाले को सबसे ज्यादा बुरा लगे। इंसानी दिमाग का एक कड़वी सच्चाई है कि उसकी पहचान(आईडेंटिटी)पर सवाल उठाईये, वह बौखला जाएगा।

 गालियों में महिलाओं को केंद्र में रखने का भी यही समझ हो सकता है। पुरुष अगर भावनात्मक रूप से किसी से सबसे ज्यादा जुड़ा होता है तो वह हैं, मां, पत्नी और बेटी। और आप पाएंगे कि गालियों में उसी को सबसे ज्यादा टारगेट किया गया है।

 यह बात हर उस समाज या भाष की है, जहां महिलाओं का पलड़ा पुरुषों के मुकाबले हल्का होता है। यह काफी निंदनीय है। अव्वल तो गाली ही बात करने की विषय नहीं है और उसके बाद आप ऐसी गाली दे रहे होते हैं जिसे सीधे औरतों से जोड़ दिया जाता है।

 पता नहीं कब वह समय आएगा जब इंसान इसे बदल पाएगा!!