आप जो सोचते हैं वह जिंदगी का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जिंदगी नहीं। जिंदगी वह जो आपके साथ हो रहा है।
मेरा कोई दोस्त अपनी अपनी सरकारी बैंक की नौकरी को छोड़ चाट्र्ड अकाउंटेंट की तैयारी करने की सोच रहा है। उसने मुझे बताया, बरबस मेरे मन में ख्याल आया कि..
जो सवाल हर बच्चे से किया जाता है, कभी मुझसे भी किया गया था। क्या बनना चाहते हो। बड़ी धुंधली सी याद है, मैंने कहा, पायलट। प्लेन में उड़ना, इतनी ही समझ थी पायलट को लेकर। और वह पायलट कलम, हमेशा साथ भी तो रखता था। अच्छी यादें हैं।
वह पायलट की याद अब समय के साथ मद्धिम हो रही थी और मेरी पढ़ाई भी। इंजीनियर को लेकर मेरे मन में कुछ अच्छी तस्वीर नहीं बन रही थी और दसवीं पास होने के बाद मैंने कामर्स ले लिया।
गोस्सनर कालेज, रांची की बिल्डिंग बड़ी सुंदर थी उतनी अच्छी मेरी अकाउंटस में समझ नहीं थी। शाम के धुंधलके में हम कुछ दोस्त सीए और सीएस की बातचीत करते थे। वो रुतबा, वो सिग्नेचर की स्टाइल। काफी कुछ लुभाता था। लेकिन दूसरे साल में मैंने यह कहना शुरू कर दिया था कि अकाउंट्स में कमांड नहीं बन रहा है। और पास होते ही हर बिहारी(तब तक झारखंड अलग नहीं हुआ था, उसके दूसरे साल झारखंड अलग हो गया) की तरह यूपीएससी और आईएएस के बीच में सही अंतर जाने हुए भी आईएएस की सोचने लगा। पटना कालेज में एडमिशन के बाद जिंदगी एकदम से तेज हो गई थी जो मेरी पकड़ से बाहर थी। कालेज को छोड़ना पूरी जिंदगी के सोच में शामिल नहीं थी लेकिन जिंदगी में यह शामिल हो गया।
उसके बाद आईएएस की सोच भी छूटी लेकिन दिल्ली का साथ पकड़ लिया इस बीच अर्थशास्त्र से स्नातक पूरी हो चुकी थी।
कहीं काम करते हुए पूरा देश घूम चुका था। कई समझ अंकुरित हो रही थी जो पूरे पेड़ का रूप ले ही रही थी कि दैनिक जागरण में कब आ गया पता भी नहीं चला।
पूरी जिंदगी का मजा ले रहा हूं और जहां पड़ाव मिले वह असल में मेरे लिए पड़ाव नहीं ब्रेकर जैसे थे। मैंने चलना नहीं छोड़ा। और आज सबके सामने हूं।
छोटी नहीं, बड़ी जिंदगी और मजेदार जिंदगी के मजे लीजिए।