ओरकुट में एक कम्यूनिटी है आई हेट एकता कपूर। इस कम्यूनिटी के हजारों सदस्य हैं, पुरुष और महिला दोनों लेकिन कम्यूनिटी बनाने वाला पुरुष है। एकता कपूर के धारावाहिकों को देखकर ही लोग कहते हैं कि महिलाओं की समझ पुरुषों के मुकाबले कम होती हैं (यह बात इससे भी पहले से कही जा रही है)।
मां, बहन, बेटी, पत्नी और ऐसे ही ना जाने कितने रिश्तों में महिलाओं से हमारा संबंध होता है। और सभी रिश्तों के साथ भावना जुड़ी होती है इन सबके बावजूद पुरुषों को हमेशा लगा है कि महिलाओं के पास व्यावहारिक ज्ञान कम होता है और शैक्ष्णिक ज्ञान ज्यादा। मुझे अच्छे से याद है कि मेरे स्कूल की टापर भी तो लड़की ही थी, उससे पहले वाले साल में भी और उससे पहले वाले में भी। शायद यही किस्सा हम आप में से सभी के यहां हुआ होगा। और नहीं हुआ होगा तो कोई बात नहीं सीबीएसई में हमेशा से होता रहा है।
लड़कियों या महिलाओं के बारे में एक बात और मशहूर है, उनकी बातें। जैसे मेरी मां। खूब बातें करती है। यहां की बातें, वहां की बातें। मुझे पसंद है लेकिन और महिलाओं का करना पसंद नहीं। (मां से भावनात्मक रिश्ता जो है)। आफिस में, घर पर हर जगह बातें करने को तैयार होती है। मोबाइल फोन तो उनका सबसे अच्छा दोस्त हो चला है। एक दिन बिना खाए रह सकती हैं लेकिन एक दिन बिना फोन के, इंपासिबल।
यह या तो चीजों को बना सकती हैं या फिर तीन-तेरह, नौ-अट्ठारह। घर-घर नहीं रहेगा, आफिस-आफिस नहीं। यही इनका सबसे सबल पक्ष है और सबसे भयावह भी। मैंने कितने टूटे घरों को इनको जोड़ते देखा है और कई घरों को तोड़ते हुए।
भारत में यही देवी हैं और यही चंडी भी। शीशे में उतारने की कला इनसे अच्छा कोई नहीं जानता। अगर यह निभाती हैं तो सात जन्मों के लिए और अपने पर उतर आए तो सात जन्मों तक आपको यह नानी की याद दिलाती रहेंगी।
पुरुष हमेशा इनकी निजी जिंदगी के बारे में जानने को इच्छुक रहा है। लेकिन यह कभी यह नहीं जानने देना चाहता है कि मैं जानना चाहता हूं। पुरुष जितना महिलाओं से दूर जाना चाहता है ठीक उसके उलट वह उनसे जुड़ी चीजों को जानना चाहता है। महिलाओं की बातें, उनके कपड़े, उनके आभूषण। सभी चीजें। बड़ी बारीक नजर से उनकी पड़ताल करना चाहता है। अपने दोस्तों से पूछता है, लंबी बातें चलती हैं। लेकिन यह अनढका सच उन्हें मिल नहीं पाता।
आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपर कई लोग महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं। लेकिन महिलाएं क्या चाहती हैं। मैंने जितनी बातें की है उस आधार पर महिलाएं खुद दो भागों में बंटी होती हैं। वैसी महिलाएं जो अपने पैरों पर खड़ी है, बहुधा चाहती है कि हमें कोई आरक्षण नहीं चाहिए, हम अपने हक के लिए लड़ेगें। और वो जो घर में काम काजी हैं लेकिन शिक्षित हैं, उन्हें महिलाओं का हक चाहिए। महिला आरक्षण बिल चाहिए।
पुरुषों के लिए आज भी महिला कमतर कर के आंकी जाने वाली चीज है। जितनी काबलियत है, उससे कम। इसमें केवल पुरुष ही नहीं कभी-कभी महिलाएं स्वयं भी होती है। उत्तर भारत में लिंग विभेद और कन्या भ्रूण हत्या के मामले इसकी पुष्टि करतें हैं। एक मां को भी पहले बेटा चाहिए, बेटी नहीं। बेटा हो गया तो सिर का दर्द कम हो जाता है।
भारतीय समाज और भारतीय पुरुष की मानसिकता हमेशा महिलाओं को कम आंकती आई हैं लेकिन आशा है कि यह मानसिकता समय के साथ बदल जाए। काश! यह समय जल्दी आ जाए।