इस राजनीतिक विचारधारा की क्या बात है!!

मैं भारतीय नागरिक हूं। दिल और दिमाग दोनों से। यहां की हर एक विचारधारा का सम्मान करता हूं। जहां अच्छाई होती है, खुल कर प्रशंसा करता हूं और जहां बुराई होती है, थोड़ा मुंह फेर लेता हूं या हल्क लहजे में उसकी बुराई कर देता हूं।

कांग्रेस, भाजपा और वामपंथियों तीनों की अपनी-अपनी विचारधारा है। इन तीनों के विचारों का मैं सम्मान करता हूं। लेकिन इनके कृत्यों पर अपना पक्ष भी रखता हूं। यह लोग विचारों की राजनीति नहीं करते हैं। यह कुर्सियों की राजनीति करते हैं।

84 के दंगों के बारे में कांग्रेसियों को बोलिये या फिर भगवा रंग वालों को गोधरा या बाबरी मस्जिद के बारे में, इनका रुख तीखा और थोड़ा आरोप देने वाला हो जाएगा। ठीक इसी प्रकार नंदीग्राम और कन्नूर की घटनाओं के बारे में जवाब देते हुए वामपंथियों को तकलीफ देती हैं।

अब आम इंसान को उसके विचारधाराओं की गलतियों की ओर इंगित करेंगे तो वह आप पर आग बबूला हो या तो गाली देना शुरू करेगा या फिर दूसरे विचारधारा वाले की गलती को बताना शुरू कर देगा। यह कुछ ऐसा है, मेरी कमीज तेरी कमीज से कम गंदी है।

इसका सबसे अच्छा सबूत हमेशा तथाकथित बुद्धिजीवी ही पेश करते हैं। चाहे वो हमारे सम्मानीय नेतागण हों या फिर ब्लागवीर लोग

पैसा या पावर?

खाने की अहमियत आप तभी समझेंगे जब आपको भूख लगी होगी। यह केवल खाने के साथ नहीं है। किसी भी चीज की अहमियत कोई तभी जानेगा जब उसका अभाव उसे हो

कई दिनों से मैं भी यही जानने की कोशिश कर रहा हूं कि लोगों को क्या पहले चाहिए, पावर या पैसा।

हिंदी भाषी क्षेत्रों में पावर को समझाने और सबझने के लिए लाठी शब्द का प्रयोग किया जाता। लाल बत्ती की चाहत इसी कारण से लोगों में ज्यादा होती है। एक पहर का भूखा इंसान भी पहली बार लाल बत्ती लगी गाड़ी पर बैठता है तो वह अपना भूख भूल जाता है।

लोगों की सीधी सोच बनती है। पावर मिलेगा तो पैसा तो खुद ब खुद मिलने लगेगा। पैसा मिलने के बाद भी पावर कईयों को नहीं मिलता है, यह बात तो सही है। यह हिंदी भाषी मानसिकता है। साथ ही उनके साथ होता है जो शहरीकरण से थोड़े दूर खड़े हैं।

अभाव में जीने वाला इंसान प्रभावित चीजों को लेकर हमेशा फंतासी जैसी चीजें को लेकर बात करता रहता है। अगर मेरे पास पैसा होता तो मैं.. अगर मैं मंत्री होता तो इसका नक्शा ही बदल देता।

खर जो समझने वाली बात है वह है कि पावर और पैसा बनाने वाले किसी ना किसी तरीके से इसे बना ही रहें और अपनी कुंठा शांत कर लेते हैं।

प्रेमी का गुड मार्निग और गुड नाइट

कितना सुखद। कितना अच्छा। देश, काल, परिस्थिति इन सब से ऊपर। प्रेमी का गुड मार्निग और गुड नाइट कहना।

पिछले तीन साल से अकेले रह रहा था। अभी हफ्ते दिन पहले कमरा बदला है। तीन और लोग साथ में हैं, जिनमें मैं केवल एक को जानता हूं बाकी दो उसी के दोस्त हैं। खर मुझे वहां अपने को वहां ढालने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। मेरे दोस्त मुझे टमाटर बुलाते हैं कहीं भी घुल मिल जाने वाला।

यह तो मैं पहले से ही जानता हूं कि भारतीयों के पास खाली समय काफी होता है। क्रिकेट, तीन घंटे की फिल्म, फोन पर लंबी-लंबी बातें, एक डमरू की आवाज में मजमा लगा देना मेरे विश्वास को हमेशा से बढ़ाता रहा है।

खर मैं बात कर रहा था साथ रहने वाले एक की जिसे मैं अपना दोस्त कह ही सकता हूं। देर रात तक फोन पर बात करना और गुड नाइट के साथ बिस्तर पर आफिस की थकान मिटाने के लिए लेट जाना। और फिर लेट से उठना (जिसे हमेशा वह जल्दी कहता है) आठ बजे तक। एक बार फिर अपने पहलू में रखे मोबाइल को देखता और एक गुड मार्निग का मैसेज करता हुआ उठता।

इन सब से बेफिक्र मैं भी यही सोचता हूं कि अच्छा है कि उसकी सुबह और रात तो अच्छी होती है।

वैसे तो यह उसके निजी जिंदगी में मेरा ताकना झांकना कहा जा सकता है लेकिन मैं ऐसा करना नहीं चाहता और ना ही मुझे पसंद है। इन सबके बावजूद मुझे यह चाहते, ना चाहते हुए भी यह पता चलता रहता है सो बिना नाम लिखे मैंने इसे लिख दिया। आशा है कि इससे उसे बुरा नहीं लगेगा।

आतंकवाद से बड़ा खतरा है समलैंगिकता

अब यह कितना बड़ा खतरा है इसका केवल अंदाजा भर लगाया जा सकता है। लेकिन अंदाजा लगाने का पैमाना क्या हो, इस पर थोड़ी जिरह हो सकती है।

किसी ने कहा है कि किसी देश को बरबाद करना हो तो वहां के युवा वर्ग को बरबाद कर दो देश खुद ब खुद बरबाद हो जाएगा।

बात हो रही है समलैंगिकता की। अमेरिका में ओकलाहोमा सिटी की रिपब्लिकन सैली कर्न ने कहा कि अमेरिका के लिए आतंकवाद और इस्लाम से भी बड़ा खतरा समलैंगिकता है।

क्या यह खतरा है? अगर यह खतरा है तो क्या सचमुच इतना बड़ा खतरा है?

समलैंगिकों को मानना है कि यह एक तरीके की आजादी है। अगर हम आजाद हैं तो हमारी अपनी आजादी भी होनी चाहिए। हम चाहें जिसके साथ चाहें रहें, सरकार को इसमें कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।

सरकार का कहना है कि यह प्रकृति के खिलाफ इसलिए इसका कोई आधार नहीं है और यह अवैध है।

सरकार और समलैंगिकों की इस लड़ाई के बीच 2001 में सबसे पहले नीदरलैंड ने समलैंगिकों के विवाह को कानूनी मान्यता दी। उसके बाद बेल्जियम, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, और स्पेन ने भी समलैंगिकों के आगे घुटने टेके। अमेरिका में यह लड़ाई 50 राज्यों में लड़ी जा रही है। कई राज्यों में मान्यता मिल चुकी है और कई इस ओर अग्रसर हैं।

भारत में इसका प्रभाव समाज के हर क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। फिल्में बन रही हैं, विश्वविद्यालयों में बहस कराए जा रहे हैं, किताबें लिखी जा रहीं हैं।

अभी तक भारत में इसके आभास भर से दोस्त यार फब्तियां कसते नजर आते हैं। मुझे नहीं पता कि यह इसके होने से भारत का युवा वर्ग कब गर्व करने लगेगा। इसके एहसास से ही एक कंपन सी होती है। मेरी निजी राय के मुताबिक मैं इसका विरोध तो नहीं कर सकता लेकिन इसको प्रोत्साहन कभी नहीं दूंगा।

अच्छे और बुरे में फर्क

जो काम क्षणिक सुख देगा वह बुरा और जो काम महीनों या वर्षो तक सुख देता रहेगा वह अच्छा। अब इसे किसी भी कार्य या फिर पोस्ट के साथ मिला लें आप नतीजे के काफी करीब होंगे।

धन्यवाद

गालियों का दिमागशास्त्र

गाली। सबसे पहले किसने किसे दी होगी? क्यों दी होगी? कब दी होगी? मैं ना तो इनके जवाब जानता हूं और ना ही कोई इच्छा है कि जानूं। लेकिन गाली देने वाले का दिमागशास्त्र क्या होता होगा? क्या सोच बरबस ही उसके जबान में गाली आ जाती होगी?

जो मैं समझ पाता हूं, उसका एक सीधा समझ यह होता है कि गाली देने वाला वैसा कुछ चाहता नहीं है, जैसा उस गाली का मतलब होता है। बचपन से यहां-वहां सुनता हुआ वह बढ़ता है और गुस्सा आने पर बरबस ही गाली निकल आती है।

गुस्सा, कुंठा, रौब जमाना या यूं कह लें कि संस्कार की कमी के कारण ही गाली उसके जबान पर आती है। (हो सकता है कई और कारण से भी आते हों)।

हमारे हिंदी ब्लाग जगत में भी गाली देने वालों की संख्या कुछ ज्यादा ही बढ़ रही है। उन सभी लोगों से मेरा विनम्र निवेदन है कि उस उर्जा को कहीं और अच्छी जगह लगाएं। कृप्या गालियां ना दें। आशा है आप सभी लोग मेरी भावना को समझ कर इसका पालन करने की कोशिश करेंगे।

इस पंक्ति को याद रखें: इंसान दूसरे के बारे में जब कह रहा होता है तो वह दूसरे से ज्यादा अपने बारे में बता रहा होता है कि मैं क्या हूं।

बुद्धिजीवियों की लड़ाई

पहले दोनों शब्दों के बारे में जानना जरूरी है। बुद्धिजीवी और लड़ाई। सपाट शब्दों में कहूं तो कई विषयों की जानकारी रखने वाला या किसी भी विषय पर कम से कम आधा घंटे का भाषण तो दे ही दे, बुद्धिजीवी कहलाते हैं।

और लड़ाई तो ब्लागरों को पता होगा ही(यहां हर दूसरे महीने लड़ाई तो होती ही है)। लड़ाई कोई जरूरी नहीं है कि शारीरिक रूप से लड़ी जाए, शब्दों के अलावा ऐसे किसी भौतिक वस्तु का इस्तेमाल कर सामने वाले को आहत करना ही मेरे नजर में लड़ाई है।

अब मुद्दे की बात करता हूं। बात पिछले रविवार की है जब लोग तनाव में थे कि भारत आस्ट्रेलिया से पार पाएगा या नहीं। धोनी की टीम कंगारूओं को मात देने के लिए कमर कस रही थी और साथ ही करोड़ों जोड़ी आखें इस तनाव में भागीदार बनने को आतुर थी। उसी समय उर्दू प्रेस क्लब में फासिज्म एंड टेरररिज्म: टू साईड्स आफ द सेम क्वाईन मुद्दे पर बहस के लिए कुछ लोग इकट्ठा हुए थे।

इस पर बहस के लिए बुद्धिजीवियों की मंडली में जो गणमाण्य लोग आए थे, उनके नाम हैं: विहिप के सुरेंद्र जैन, इतिहासकार अमरेश मिश्र, नेशनल कांफ्रेंस सांसद एआर शाहीन, पत्रकार मनोज रघुवंशी, लेखिका अरुंधती राय और कौमी पार्टी के मोहम्मद हसनैन।

पूरा वर्णन मैं यहां नहीं दूंगा कि वहां क्या-क्या हुआ लेकिन कुछ खास बातें बता दूं। अरुंधती राय ने यह कहकर मंच में बैठने से मना कर दिया कि वह नेताओं के साथ मंच पर नहीं बैठती, वह दर्शकदीर्घा में ही बैठी। नेताओं से भरे इस मंच मंडली राम और प्रोफेट मोहम्मद को जो कुछ नहीं कहा जाना चाहिए वह सब कुछ कहा गया। तल्ख बातें हुई मनोज रघुवंशी और हसनैन के बीच। अंत हुआ पुलिस के आने के बाद। लोगों से सुनने में आया कि विहिप के कार्यकर्ता लाठियों के साथ रास्ते में खड़े हैं, जो अफवाह थी या सच, पता नहीं।

पूरा वर्णन पढ़ने के लिए आज का टाइम्स आफ इंडिया पृष्ठ संख्या 10 देखें।

वाह रे बुद्धिजीवी। आप भी जरा पढ़ लें।

महिलाएं: पुरुषों की दृष्टि से

ओरकुट में एक कम्यूनिटी है आई हेट एकता कपूर। इस कम्यूनिटी के हजारों सदस्य हैं, पुरुष और महिला दोनों लेकिन कम्यूनिटी बनाने वाला पुरुष है। एकता कपूर के धारावाहिकों को देखकर ही लोग कहते हैं कि महिलाओं की समझ पुरुषों के मुकाबले कम होती हैं (यह बात इससे भी पहले से कही जा रही है)।

मां, बहन, बेटी, पत्नी और ऐसे ही ना जाने कितने रिश्तों में महिलाओं से हमारा संबंध होता है। और सभी रिश्तों के साथ भावना जुड़ी होती है इन सबके बावजूद पुरुषों को हमेशा लगा है कि महिलाओं के पास व्यावहारिक ज्ञान कम होता है और शैक्ष्णिक ज्ञान ज्यादा। मुझे अच्छे से याद है कि मेरे स्कूल की टापर भी तो लड़की ही थी, उससे पहले वाले साल में भी और उससे पहले वाले में भी। शायद यही किस्सा हम आप में से सभी के यहां हुआ होगा। और नहीं हुआ होगा तो कोई बात नहीं सीबीएसई में हमेशा से होता रहा है।

लड़कियों या महिलाओं के बारे में एक बात और मशहूर है, उनकी बातें। जैसे मेरी मां। खूब बातें करती है। यहां की बातें, वहां की बातें। मुझे पसंद है लेकिन और महिलाओं का करना पसंद नहीं। (मां से भावनात्मक रिश्ता जो है)। आफिस में, घर पर हर जगह बातें करने को तैयार होती है। मोबाइल फोन तो उनका सबसे अच्छा दोस्त हो चला है। एक दिन बिना खाए रह सकती हैं लेकिन एक दिन बिना फोन के, इंपासिबल।

यह या तो चीजों को बना सकती हैं या फिर तीन-तेरह, नौ-अट्ठारह। घर-घर नहीं रहेगा, आफिस-आफिस नहीं। यही इनका सबसे सबल पक्ष है और सबसे भयावह भी। मैंने कितने टूटे घरों को इनको जोड़ते देखा है और कई घरों को तोड़ते हुए।

भारत में यही देवी हैं और यही चंडी भी। शीशे में उतारने की कला इनसे अच्छा कोई नहीं जानता। अगर यह निभाती हैं तो सात जन्मों के लिए और अपने पर उतर आए तो सात जन्मों तक आपको यह नानी की याद दिलाती रहेंगी।

पुरुष हमेशा इनकी निजी जिंदगी के बारे में जानने को इच्छुक रहा है। लेकिन यह कभी यह नहीं जानने देना चाहता है कि मैं जानना चाहता हूं। पुरुष जितना महिलाओं से दूर जाना चाहता है ठीक उसके उलट वह उनसे जुड़ी चीजों को जानना चाहता है। महिलाओं की बातें, उनके कपड़े, उनके आभूषण। सभी चीजें। बड़ी बारीक नजर से उनकी पड़ताल करना चाहता है। अपने दोस्तों से पूछता है, लंबी बातें चलती हैं। लेकिन यह अनढका सच उन्हें मिल नहीं पाता।

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपर कई लोग महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं। लेकिन महिलाएं क्या चाहती हैं। मैंने जितनी बातें की है उस आधार पर महिलाएं खुद दो भागों में बंटी होती हैं। वैसी महिलाएं जो अपने पैरों पर खड़ी है, बहुधा चाहती है कि हमें कोई आरक्षण नहीं चाहिए, हम अपने हक के लिए लड़ेगें। और वो जो घर में काम काजी हैं लेकिन शिक्षित हैं, उन्हें महिलाओं का हक चाहिए। महिला आरक्षण बिल चाहिए।

पुरुषों के लिए आज भी महिला कमतर कर के आंकी जाने वाली चीज है। जितनी काबलियत है, उससे कम। इसमें केवल पुरुष ही नहीं कभी-कभी महिलाएं स्वयं भी होती है। उत्तर भारत में लिंग विभेद और कन्या भ्रूण हत्या के मामले इसकी पुष्टि करतें हैं। एक मां को भी पहले बेटा चाहिए, बेटी नहीं। बेटा हो गया तो सिर का दर्द कम हो जाता है।

भारतीय समाज और भारतीय पुरुष की मानसिकता हमेशा महिलाओं को कम आंकती आई हैं लेकिन आशा है कि यह मानसिकता समय के साथ बदल जाए। काश! यह समय जल्दी आ जाए।

शेयर बाजार

Bombay Stock Exchange

मैं कई दिनों से निबंध लिखने की सोच रहा हूं। एक एक शब्दों को लेकर। मसलन भीड़, क्रिकेट, मोबाइल, कंप्यूटर, काल सेंटर, कर्मचारी आदि आदि। इन सभी शब्दों को सुनकर जो मेरे दिमाग में चित्र बनता है बस केवल उसे उकेरने की कोशिश करूंगा। मुझे नहीं पता कि मैं इसमें कितना सफल हो पाऊंगा लेकिन अपनी इच्छा को पूरी करने के लिए जो समय मिल पाएगा उसके लिए यह सही जगह है।

तो आज से ही इसकी शुरुआत करता हूं।

शेयर बाजार

नाम सुनते ही बंबई स्टाक एक्सचेंज की बिल्डिंग दिखने लगती है। साथ ही अग्रेंजी में लिखा हुआ दलाद स्ट्रीट का वह बोर्ड जो यह बताता है कि इसका पिन कोड 400001 है।

ज्योतिष के बाद यही एक बाजार है जो भारत में तेजी से फल फूल रहा है। ज्योतिष की तरह इसमें भी मात्र संभावना ही लगाई जा सकती है। शर्तिया रूप से बता पाने का केवल विज्ञापन दिया जा सकता है, बताया नहीं जा सकता है।

यह बाजार लोगों को एक दिन में हजारपति, लखपति, करोड़पति, अरबपति तक बना देती है। यहां के एक उछाल से मुकेश अंबानी भारत के ही लेकिन लंदन में बैठे मित्तल से आगे निकल जाते हैं।

इसकी खबरें अखबार के 14वें पन्ने से निकलकर पहले पन्ने में छा गई। पहले यह अखबार केवल लंबी गाड़ियों के पीछे बोर्ड पर नजर आती थीं। लेकिन अब यह ऐसी छाई कि बिजनेस अखबार का अपना एक बाजार आ गया। जी बिजनेस, सीएनबीसी आवाज, एनडीटीवी प्रोफिट और सीएनबीसी टीवी-18 के साथ रिलायंस बंधुओं ने भी इसको जन जन तक पहुंचाने में बड़ा काम किया।

आज से पांच महीने पहले यहां एक दिन की सबसे बड़ी उछाल का रिकार्ड सचिन के शतक की तरह टूटता रहता था। जैसे सचिन के शतक के रिकार्ड को सचिन ही तोड़ता है ठीक उसी प्रकार सेंसेक्स अपनी रिकार्ड को तोड़ नई रिकार्ड बनाता था जिसे फिर तोड़ता देता था। लेकिन अब समय ने पलटी मारी है और फिर सचिन के शून्य में आउट होने के रिकार्ड की तरह शेयर बाजार में भी गिरावट का रिकार्ड जारी है।

आज ही शेयर बाजार अपनी दूसरी सबसे बड़ी गिरावट के साथ बंद हुआ है। 900 अंकों की गिरावट। निफ्टी अपने 200 दिन के औसत स्तर से नीचे बंद। आंकड़ों का खेल है यह शेयर बाजार। किसी ने इसे जुआ कहा, किसी ने किस्मत तो किसी ने कहा कि लाटरी है। मेरे हिसाब से यह शेयर बाजार है केवल और केवल शेयर बाजार।

मनीषा पांडे, अविनाश और यशवंत की चिक चिक

ऐसा नहीं होना चाहिए और अगर हो भी तो इसके बारे में बातें नहीं होनी चाहिए। यह एक आदर्श वाक्य है। लेकिन इसकी परवाह करने वाले कम लोग हैं। घटिया लोगों की मानसिकता घटिया होती है। या कुछ ऐसा कहा जाना चाहिए कि घटिया मानसिकता वाले लोग घटिया होते हैं। कुत्ते का दुम हिलाना वफादारी का संकेत होता है और इंसान का दुम हिलाना चाटुकारी का।

यहां बातें हो रही है- मनीषा पांडे, मोहल्ला के अविनाश और भड़ास के करीब-करीब सभी लोगों के बारे में। लोगबाग क्या कहते हैं इससे इनको कोई लेना देना नहीं है, इनकी ललक शांत हो जाए, बस। इन्हें केवल इतना चाहिए। हर तीसरा पोस्ट इन्हीं के बारे में कुछ लिख पढ़ रहा है।

सबसे पहले मनीषा पांडे के बारे में। मैं इनको नहीं जानता। लेकिन फिर भी इनके बारे में जो पढ़ा उससे केवल इतना ही लक्षित हो रहा है कि यह अपनी लड़ाई खुद लड़े दूसरों की जमात में शामिल होकर वार करना सही नहीं है। अपनी बात रखने से आपको कोई नहीं रोकेगा। लेकिन सबसे जरूरी कि इनके बारे में जो कुछ लिखा गया व पूर्णरूपेण निदंनीय है और मैं उसकी निंदा और केवल निंदा करता हूं।

अविनाश जी के बारे में आज यशवंत जी ने कुछ लिखा है, उसे पढ़े मेरी राय कुछ मिलती जुलती है। प्रियंकर जी ने कुछ लिखा और उसे अविनाश ने जस का तस छाप दिया। लेकिन यह समझ से परे की चीज है कि एक चैट को अविनाश ने अपने पोस्ट में क्यों जगह दी। उससे वह क्या हासिल करना चाहते थे? इतनी समझ तो मैं मान कर चलता हूं कि उन्हें भी समझ आना चाहिए कि इसे ना डाला जाए। लेकिन उसके पीछे का मकसद ही कुछ ऐसा होगा कि वह पोस्ट चला गया।

भड़ासियों के बारे में एक बार मैं लिख चुका हूं। एक बार फिर लिखना चाहूंगा। भड़ास की टैग पंक्ति अगर कोई बात गले में अटक गई हो तो उसे उगल दीजिए, मन हल्का हो जाएगा..। यह जो उगल दीजिए है यह कुछ ऐसा प्रतीत होता है जैसा कि उगलिए लेकिन अभ्रद तरीके से। माफ करना यशवंत जी मैने इसे कई बार देखा है। जब आपने इसे लिखा होगा तो आपके पास तो शब्दों को बांधने की क्षमता हो सकती है लेकिन आपके भड़ासियों में यह कम मालूम जान पड़ती है। ऐसा मुझे लगता है और हो सकता है आपको भी। मैं यहां लोगों को डाउन टू अर्थ होने की बात नहीं कह रहा हूं कि जब भी लिखे अच्छा लिखे। गुडी-गुडी लिखे। जो चाहें मर्जी लिखें लेकिन अपनी भाष को थोड़ी संयत रखें। इतनी अपेक्षा तो की ही जा सकती है। क्योंकि आप एक ऐसे मंच पर लिख रहें हैं जहां यह केवल आपका बनकर नहीं रह जाता है।

कुछ इस प्रकार कि अश्लील फिल्में कमरे की चहारदीवारी में चले तब तो ठीक है लेकिन अगर इसका प्रदर्शन खुले रूप से किया जाए तो यह अच्छा नहीं कहलाता। इन सब बातों का थोड़ा ख्याल जरूर करना चाहिए।

और अंत में मुझे यह पता है कि यह ब्लाग है यहां जो भी लिख रहा है वह केवल उसकी संपति है और वह अपने ब्लाग पर जो मर्जी लिख सकता है। लेकिन हिंदी ब्लाग की दुनिया इतनी छोटी है और एग्रीगेटर्स के कारण यह थोड़ा और संकुचित हो जाता है। इसलिए कुछ अच्छा लिखें।

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