आप इसे देख कर हस पड़ेंगे

Copies of decision

फोटो देख लिया. हसी नही आई. अब जरा नीचे का कैप्शन पढ़ ले. याकूब मेनन के घर में कितनी कॉपिया गई होंगी. यह सोचकर तो मुझे और हसी आ रही है. इसे कोर्ट से घर ले जाने का किराया कोर्ट देगी या ये ख़ुद ही ले जायेंगे. कम से कम एक ऑटो तो बुक करना पड़ेगा. मजेदार :) 

फोटो साभार: इंडियन एक्सप्रेस

साफ सड़क और गन्दा मुंह

Gutkha

पैकेट के अन्दर से हल्का गर्द उड़ा. उसने अपने सख्त उंगलियों से गुटखा के पैकेट को फाडा था. पैकेट ऊपर आया और फ़िर सारा माल मुह के अन्दर. और उसने गुटखे की पुडिया को साफ सुथरे सड़क पर उड़ने के लिए फेक दिया.  साथ चल रहे दोस्त ने कहा की तुमने यह क्यों फेका, देख नही रहे सड़क साफ सुथरी है.

मैं पीछे ही चल रहा था. मॅन में ख्याल आया, क्या उसका मुह साफ सुथरा नही है जो अपने अन्दर कूड़े को डाल लिया. फ़िर सोचा अगर वो इतना ही समझदार होता तो गुटखा खाता क्यों?

एक कार्टून: दूर की नजर है

Dalai lama met bush

मोदी का पानी मांगना..क्या संकेत देता है?

पोस्ट लिखते हुए पहले हेडिंग देने की इच्छा हो रही थी मोदी का आखिरी इंटरव्यू। लेकिन लिखा नहीं..! कारण सीधा सा, मैं भविष्य नहीं देख सकता।

आज सीएनएन आईबीएन के मशहूर प्रोग्राम डेविल्स एडवोकेट में मोदी इंटरव्यू के बीच से माइक निकाल कर चले गए। उससे पहले पानी मांगा, पिया और..।

अनिल कपूर की फिल्म नायक में भी ऐसा ही कुछ एक सीन है। अनिल कपूर सवाल पूछता जाता है और मुख्यमंत्री बने अमीरश पुरी इसका जवाब देते जाते हैं लेकिन पुरी भी एक बार फंस जाते हैं और ऐसे ही बीच इंटरव्यू छोड़ कर जाना चाहते हैं। अनिल कपूर ने तो पुरी को रोक लिया था लेकिन करण थापर वाक पटु नरेंद्र मोदी को रोक नहीं पाए।

खैर जो थापर ने सवाल किया था उसे आप यहां पढ़ सकते हैं। और उसके फुटेज आपको यहां मिलेंगे।

मैं नहीं जानता कि नरेंद्र मोदी इस बार जीत पाएंगे या मेरा नहीं लिखा जाने वाला हेडिंग सही हो जाएगा। जो भी होगा अगर मेरी बात सही हुई तो मोदी अपना उन सारे बाबाओं से अपना राशिफल दिखवा लें, मुमकिन है उनका खराब दौर शुरू हो जाएगा। मुमकिन है शुरुआती दिनों में वह भी अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ लेंगे।

और अगर वह नहीं भी हारते हैं तो यह राजनीति है यहां कोई अजेय नहीं है। कभी तो हारेंगे.. और जिस दिन भी हारेंगे वहीं से खराब दिन शुरू हो जाएगा।

मुझे लोकतंत्र पर पूरा भरोसा है अगर मोदी की जीत होती है तो मोदी सच में बहुमत गुजरातियों के लिए अच्छे होंगे लेकिन नहीं.. तो फिर आप राजनीति का बदला और कानून का कसाव देख पाएंगे।

मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है…

अभी मैं इस गाने को ४ बार सुन चुका हू. कभी ये भी समय था की ऐसे गाने सुनने वालो को मैं अजीब तरीके से देखा करता था. आज मुझे मेरा भतीजा मुझे उसी नजरो से देखता है. उसकी आंखो में मैं वही भाव देखता हू जो कभी मेरी आंखो में हुआ करता था. क्या समय था और क्या समय है!!! :) :) सच में बड़ी अजीब सी दुनिया है कभी जिससे आप नफरत कर रहे होते हैं कभी उसी से प्यार हो जाता है. ये गाना कुछ वैसा ही है. मेरे ब्लोगिन्ग में आने का भी यही एक कारन है की जो मैं आज लिख रहा हू वो साल भर बाद क्या होगा. उसे पढने में बड़ा मजा आता है. खैर इन सब बातो को छोड़िये इस गाने का मजा लीजिये. ११६ चाँद की राते और वो तुम्हारे कंधे पर काला तिल. गुलज़ार साहब भी…. :)

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क्या चापलूसी सीखनी चाहिए?

मेरा एक दोस्त मुझे बहुत प्यार करता है. मेरा भला चाहता है. और वो कहता है की मुझे चापलूसी सीखनी चाहिए. और मैं इसका कडा विरोध करता हू. क्या मेरा दोस्त ग़लत है? क्या मैं ग़लत हू? या हमदोनो ग़लत हैं? जो इसका जवाब अपना नाम बदल कर देना चाहते हैं दे सकते हैं? मुझे इसका उत्तर चाहिए

मान गया लड़कियों को..

हजारीबाग की जिला मजिस्ट्रेट हैं हिमानी पांडे। हिमानी पांडे हिंदुस्तान की संपादक मृणाल पांडे की पुत्री हैं। हिमानी पांडे के बारे में मैं कुछ जांच पड़ताल कर रहा था। तो मुझे एक वेबसाइट दिखी, और उसमें जो देखा वो कुछ नया नहीं था लेकिन फिर भी..।

हिमानी पांडे दिल्ली विश्वविद्यालय से वर्तमान में बीए अंग्रेजी(प्रतिष्ठा) कर रही हैं। अब यह वही हिमानी पांडे हैं या नहीं यह तो मैं नहीं जानता लेकिन.. इससे मेरे निष्कर्ष पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हिमानी को 400 में 258 अंक मिले हैं। इससे ज्यादा जिनको भी नंबर आया है सभी लड़कियां हैं। केवल स्टीफेंस कालेज के प्रणव प्रकाश ही एकमात्र छात्र हैं जिन्हें ज्यादा अंक मिला है।

कहीं का रिजल्ट निकले लड़कियां ही आगे होती हैं। मान गया लड़कियों को..।

तो अमिताभ बताएं कैसे उत्तर प्रदेश में है जुर्म कम!!?

Amitabh Bachchan

देश की दशा और दिशा बदलने के लिए भारत में दो कानून बने। और सच में दोनों कानून कुछ हद तक अपना काम कर रही हैं। पहला है राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना। दूसरा है सूचना का अधिकार।

दोनों कानून का प्रभाव भरपूर है। एक गरीबों के उत्थान के लिए है, जिसका फर्क तो दिख रहा है लेकिन उतना नहीं जितना होना चाहिए। लेकिन मुझे विश्वास है कि एक दिन इसका असर ताजमहल की चमक की तरह ही दिखेगा। दूसरे कानून का मैं एक क्रांतिकारी कानून की तरह देखता हूं। इससे सभी सरकारी महकमा त्रस्त है। सुप्रीम कोर्ट, प्रधानमंत्री कार्यालय और यूपीएससी ने अर्जी देकर कहा है कि हमें सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत ना लाया जाए। यह है इसका प्रभाव। अच्छी बात यह है कि इसे माना नहीं गया है।

खैर मैं बात कर रहा था सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की, जो क्रिकेट मैचों के ब्रेक के दौरान ठंडा तेल, चाय तो कभी जोड़ों के दर्द का बाम बेचते नजर आते हैं। यही अमिताभ बच्चन सात-आठ महीनों पहले टीवी पर यूपी है दम क्योंकि जुर्म है यहां कम.. कहते नजर आते थे।

भारत का कोई नागरिक सूचना के अधिकार के कानून के तहत यह जानना चाहता है कि..
अमिताभ किस आधार पर यह बात कहते थे?
वह केंद्रीय रिपोर्ट कब की बनी हुई है?
उसमें कौन-कौन से राज्य शामिल हैं?
जुर्म का आधार कब से कब तक का लिया गया है?
और..
इस प्रसारण के लिए अमिताभ को कितना पारिश्रमिक मिला था?

ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सब अमिताभ से तत्कालीन उत्तर प्रदेश विकास परिषद के सदस्य होने के नाते पूछा गया है। जवाब 15 अक्टूबर को देना है।

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