मेरा एक दोस्त मुझे बहुत प्यार करता है. मेरा भला चाहता है. और वो कहता है की मुझे चापलूसी सीखनी चाहिए. और मैं इसका कडा विरोध करता हू. क्या मेरा दोस्त ग़लत है? क्या मैं ग़लत हू? या हमदोनो ग़लत हैं? जो इसका जवाब अपना नाम बदल कर देना चाहते हैं दे सकते हैं? मुझे इसका उत्तर चाहिए







आदर्श रुप से उत्तर दें तो जवाब होगा नहीं, व्याहारिक तौर पर उत्तर दें तो होगा हाँ।
तो लोगो को आदर्श स्थिति में चलना चाहिए या व्याहारिक स्थिति में???
किसी के अच्छे कार्य की सच्चे मन से सराहना करना और स्वार्थ सिद्धी के लिये चापलूसी करने के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है, लकीर के इसी तरफ सतता बरकरार रहती है और दूसरी तरफ क्षणिकता. उस पार तात्कालिक लाभ तो मिल सकता है मगर निरंतर लाभ इसी तरफ है.
शायद मैं अपनी बात रख पाया.
ये तो एकदम मेरी वाली बात कह दी. मैंने अपने दोस्त को यही उत्तर दिया था. जो भी काम आपको तात्कालिक सुख देता है वो बुरा है और जो काम लंबे समय तक आपको सुख दे वो अच्छा काम है.
शायद और कुछ उत्तर मिले. सब की अपनी समझ है और अपने विचार. हर कोई अपने मॅन के अनुरूप काम करने को स्वतंत्र है
समीर जी ठीक कह रहे हैं। ऐसे सच्चे मन से तारीफ या चाटुकारिता करना या फिर उसे ठीक तरह से प्राप्त करना भी कला है। इस बारे में एक प्रसिद्ध पुस्तक You’re Too Kind – A Brief History of Flattery है।
मेरे विचार से यदि किसी की कोई बात अच्छी लगे तो सराहना करनी ही चाहिए। सराहना व चापलूसी में अन्तर है। यदि हम सब लोगों की अच्छी बातों को सराहें तो जब किसी ऐसे की बात को भी सराहेंगे जो व्यक्ति हमारे लिए महत्वपूर्ण हो तो यह चापलूसी नहीं कहलाएगी। किन्तु जब केवल अपना काम निकालने के लिए सराहें तो चापलूसी ही कहलाएगी। मन से निकली सच्ची सराहना चापलूसी नहीं होती। जिन्हें हरेक में दोष ढूँढने की आदत होती है वे ऐसी सराहना को भी चापलूसी कहेंगे, क्योंकि उन्हें सराहना करना आता ही नहीं। स्वार्थ सिद्धि के लिए की गई झूठी प्रशंसा गलत है।
घुघूती बासूती