Simply Outstanding, बेहतरीन, लाजवाब

इसे कहते है Simply Outstanding . एआर रहमान और नुसरत फतह अली खान की आवाज. इसके बोल लाजवाब हैं अगर आप सुन सकते हैं तो जरुर सुनिये

पति होने के क्या मतलब हैं?

कहीं से कोई बात निकली और मेरी एक शादी शुदा महिला मित्र ने कहा जब शादी हो तो अपनी होने वाली बीवी से पूछ लेना। मैंने पूछा क्या..? जवाब में रूप में मौन और खामोशी मिला।

मैंने कहा क्या वह मुझसे शादी के बाद काफी मांग करेगी। हो सकता है.. उसका जवाब। मैंने कहा कोई बात नहीं। और उसके बाद दोनों की खामोशी और बात नहीं बढ़ी लेकिन मैं कुछ सोचने लगा..।

किसी का पति होने के क्या मतलब हैं? सबसे पहले तो मैं समझता हूं कि यही एक रिश्ता है जो हमलोग इस धरती पर अपने हिसाब से बनाते हैं। एक मात्र रिश्ता। बाकी के सारे रिश्ते बने बनाए होते हैं। आपने जन्म लिया इसके साथ ही कोई आपका पिता तो कोई आपकी मां। भाई, बहन, चाचा, बुआ, मौसा..आदि। सारे के सारे रिश्तों में आप कुछ नहीं कर सकते हैं। यह सब डिफाल्ट मेड होते हैं। डिफाल्ट कहने का मतलब पहले से बने बनाए।

लड़की अपना सारा घर द्वार छोड़कर पति के घर आती है। इसका मतलब कि ब्याही लड़की का पूरा का पूरा दायित्व पति पर होता है। वह उस घर में पति के साथ आती है। पति की पूरी जिम्मेवारी होनी चाहिए कि वह अपनी पत्नी का सौ फीसदी ख्याल रखे। इसका कतई मतलब नहीं है कि वह जोरू का गुलाम बन जाए लेकिन वह अपनी पत्नी को वह सब कुछ दे जो उसे उसके मां-पिता के घर में मिलता था। तभी आप बन पाएंगे एक सफल पति।

(नोट: मैं कुंवारा हूं। अगले दो-तीन साल तक शादी नहीं करूंगा। इसको पढ़ कर कोई मुझे प्रपोज ना करे।)

दूरदर्शन की 48वीं सालगिरह और बहस का वहीं पुराना मुद्दा

ईमानदारी से बोलूं तो दूरदर्शन तो मैं कम ही देखता हूं। ईद के चांद की तरह। देख लिया तो देख लिया नहीं तो कोई बात नहीं। लेकिन दूरदर्शन है ईद का चांद ही। पाक भी और साफ भी। इसे अपना दायित्व पता है और उसी के माफिक यह चलता है। कल रात दूरदर्शन की 48वीं सालगिरह के मौके पर एक बहस का आयोजन किया गया। विषय था- भारतीय टीवी चैनलों का दायित्व।

इस पर प्रभु चावला इंडिया टुडे समूह (इसी का ‘आज तक’ भी है)के मुखिया कहते हैं कि हमारा काम बदलते भारत को दिखाना है। हम कौन होते हैं जिम्मेदारी वहन करने वाले?

मैं नहीं समझता यह जिम्मेदारी भरा वक्तव्य है। आप लोकतंत्र के चौथा खंभा होने को तैयार हैं लेकिन दायित्व निभाने के लिए तैयार नहीं हैं। अतार्किक बातें।

राजदीप सरदेसाई कहते हैं कि हमारे रिपोर्टर अच्छे हैं लेकिन हम संपादक लोग खराब हो गए हैं!! क्यों हो गए हैं आप खराब? आप तो सुधरिए। कथनी को करनी में भी लाइए।

बहस में जो दर्शकगण बैठे थे वो दर्शक नहीं किसी न किसी संस्थान से जुड़े पत्रकार ही थे।

नंबर वन बनने की ऐसी दौड़ लगी है कि पता ही नहीं चल रहा कि हम अपने कपड़े भी गंदे कर रहे हैं। बहस का संचालन कर रहे आलोक मेहता इसके लिए ‘भेड़ चाल’ शब्द का प्रयोग करते हैं।

शक्तिमान फेम मुकेश खन्ना कहते हैं कि हर चैनल यह बताता फिरता है कि घटना कि पहली तस्वीर हमारे पास है। क्यों बता रहें हैं, जब आप ही के पास है तो लोग तो वैसे भी जान जाएंगे।

‘आंखों देखी’ वाली नलिनी सिंह कहती है कि पटियाला में जब कैमरामैन और रिपोर्टर आत्महत्या करने वाले व्यापारी को बताते हैं कि आग ऐसे लगाओ, अभी नहीं..। वह पत्रकार को भारत का जिम्मेदार नागरिक बनने को कहती हैं। यह बहस तो चलती रहेगी कि पत्रकार क्या करे, अपना काम या फिर लोगों को पुलिस को इन सब कार्यो को करने से रोके।

रामानंद सागर (रामायण के निर्माता-निर्देशक) के छोटे भाई कहते हैं कि हमने बिना टीआरपी को सोचे हुए रामायण बनाई, जिसे सब लोगों ने पसंद किया।

एनडीटीवी के पंकज पचौरी कहते हैं कि हम मिलजुल कर समिति बनाएंगे जो यह देखने का काम करेगा कि कुछ गलत तो नहीं हो रहा है।

लेकिन कब..।

इस बहस में जो बात मुझे समझ में आई कि यह एक प्रोग्राम बना जिसे दिखाया गया। इसका कोई खास असर हमें नहीं दिखेगा। हम पैसे की अंधी दौड़ के लिए दौड़ रहे हैं जिसकी लालसा बमुश्किल रुक पाएगी।

विकिपिडिया में हिंदी की स्थिति, हैरान हो जायेंगे!!

Language Language (local) Wiki Articles Depth Total Edits Admins Users Images
35 Telugu తెలుగు te 36 259 3 57 133 179 084 10 3 023 2 444
38 Nepal Bhasa नेपाल भाषा new 31 555 2 48 408 129 175 1 132 36
46  Manipuri বিষ্ণুপ্রিয়া মণিপুরী bpy 20 828 3 28 754 151 191 1 107 116
54 Bengali বাংলা bn 16 264 36 61 803 211 828 8 1 471 924
59 Hindi हिन्दी hi 13 526 6 24 047 111 291 12 2 342 815
64 Marathi मराठी mr 11 628 15 27 808 125 592 5 1 528 719
65 Tamil தமிழ் ta 11 515 20 27 665 162 053 13 2 135 2 450

आप पहले इस चार्ट को देख लीजिए। (चार्ट सही से नही दिख रहा है. लेकिन उसमे बोल्ड से लिखे गए नम्बर लेखो की संख्या हैं  )इस 15 सितंबर, 12 बजे दोपहर को कापी किया गया। मैं हैरत में हूं। तेलगू, नेपाली, मणिपुरी और बंगाली हमसे आगे हैं। तेलगू की बात तो समझ में आती है लेकिन नेपाली और मणिपुरी भी..। नेपाली के पास हिंदी के मुकाबले दुगने से भी ज्यादा लेख हैं।

भारत में हिंदी का बाजार अंग्रेजी से लड़ने को तैयार है। लड़ने को क्या हराने को तैयार है। लेकिन विकिपिडिया में हिंदी की यह स्थिति..। क्यों? क्या हिंदी के लेखक केवल आत्ममुग्धता और पैसे के लिए ही लिखते हैं? अगर लिखते हैं तो कुछ गलत नहीं करते लेकिन क्या वह अपनी लेखनी का योगदान कुछ अच्छी चीजों में नहीं दे सकते? अगर नहीं देते हैं तो गलत करते हैं।

ब्लागर्स की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है लेकिन विकिपिडिया के लेखों में नहीं..। आइए हम सब मिल जुल विकिपिडिया में योगदान दें। एक पंक्ति ही सही लेकिन लिखिए..। सब मिलकर लिखेंगे तो हम अन्य विदेशी भाषाओं को भी पीछे छोड़ देंगे।

यह लिंक आपको विकिपीडिया के लेखो के बारे में पूरी डिटेल देगी

गुस्से का ज्ञान और विज्ञान

यह प्रकृति है। गुस्सा कोई भी हो सकता है। इस पर किसी का जोर नहीं है। डा अस्थाना का भी नहीं(मुन्ना भाई एमबीबीएस वाले)। कई तो इसी के लिए जाने जाते हैं। स्पेन के सांड, भारत के नेता गण। भारतीय पत्रकारों में तो यह खूब पाया जाता है। हमेशा अपने सवालों से दूसरों को नीचा दिखाना चाहते हैं।

वैज्ञानिक इस पर शोध करने लगते हैं। सर्वे करने वाले प्रश्नों की पूरी लिस्ट तैयार कर देते हैं। मजमून देखिए-

आप कौन-कौन सी बातों पर गुस्सा करते हैं?
क्या आप गुस्सा केवल अपने से छोटों पर करते हैं?
क्या आपको अपने बारे में सच्ची और कड़वी बात सुनने पर गुस्सा आ जाता है?

वगैरह-वगैरह..

यह चेतन प्राणी होने का एक सबूत है। इसका सबूत माइक टायसन ने इवांडर होलीफील्ड का कान काटकर दिया था। और सिद्धू ने बैंक के कर्मचारी को लात-घूंसे मारकर। आपलोगों ने भी सबूत कहीं ना कहीं, किसी ना किसी को तो दिया ही होगा।

Angry man

मैंने आज किसी को इसका सबूत दिया है। अपने एक अजीज दोस्त को। उसने ऐसा तो कुछ नहीं किया था लेकिन मेरे से गलती हो गई। जिसका दुख मुझे अब हो रहा है। वह तो इसे नहीं पढ़ पाएगा लेकिन आप लोग ही मुझे माफ कर देना।

झारखण्ड में दो नए जिलों का निर्माण

Jharkhand

एक तो रामगढ और दूसरा खूंटी. रामगढ के बारे में कुछ बता दू. यहा पर १९४० में कॉंग्रेस पार्टी का वार्षिक अधिवेशन हुआ था. जिसकी अध्यक्षता मौलाना अबुल कलम आजाद ने की थी.  इन दोनों जिलों के निर्माण के बाद झारखण्ड में जिलों की संख्या २२ से बढ़कर २४ हो गई है. यह मेरा नया गृह जिला बन गया है. 

मेरे घर के चारों खंभे हिलते हैं!!

मैं जिस घर में पैदा हुआ वही मेरा घर हो गया। मेरा घर मुझे बहुत प्यारा लगता है। यह सबके साथ होता है। इसमें नया कुछ भी नहीं है।

इसके आसपास खूब विकास हो रहा है। मेरे घर में भी विकास हो रहा है। अब मेरा घर सुबह-शाम चमकता रहता है। वैसे तो यह घर बहुत पुराना है। काफी पुराना लेकिन मेरे ‘बापू’ को यह 60 साल पहले मिला था। सो मैं या बाहर के लोग भी इसे 60 साल पुराना ही मानते हैं।

इधर मेरे घर में काफी शोर हो रहा है। मैं थोड़ा परेशान हूं और हो जाता हूं। अपने घर वाले ही घर के अंदर ही शोर मचा रहे हैं। मेरे भाई, मेरी बहन। लेकिन फिर भी ‘बापू’ के संस्कारों से घर सही से चल रहा है।

तो मैं कह रहा था कि मेरे घर के चारो खंभे कभी-कभी हिलते हैं। पता नहीं क्यों? वैसे तो मुझे लगता रहता है कि घर की बनावट में सब कुछ ठीक है लेकिन फिर भी कभी-कभी..।

विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और चौथा प्रेस(यह कभी सबसे मजबूत तो कभी सबसे कमजोर खंभा नजर आता है।)

Indian Parliament

न्यायपालिका रूपी खंभे पर तब थोड़ी कंपन हुई जब कोई आदेश देता है कि गीता को धर्मशास्त्र का दर्जा मिलना चाहिए। मेरे घर का यह सबसे मजबूत खंभा है। अगर इसमें कंपन होती है तो घर में दरकने का खतरा हमेशा बना रहेगा।

विधायिका रूपी खंभा तो कई बार हिला है। तहलका का खुलासा हो, सांसदों के प्रश्न के बदले पैसे मांगने का मामला। जिसे सबसे ज्यादा मजबूत होना चाहिए, वही सबसे ज्यादा कमजोर है। मेरे घर का सबसे ज्यादा बोझ इसे ही वहन करना है।

कार्यपालिका रूपी खंभा को हिलाने के लिए दो-तीन शब्द कहना चाहूंगा। बोफोर्स, झामुमो रिश्वत कांड। इसका काम करने का तरीका थोड़ा ढंका हुआ होता है। हां! आरटीआई के आने से यह जरूर साफ हुआ है।

और अंत में

प्रेस। इसके पास एक कलम है। और आजकल यह कहता फिरता है, पेन इज माइटर दैन शोर्ड। यह दंभी हो रहा है। मेरे पास पावर है। मुझे यह करने की छूट है। मैं यह कर सकता हूं। यह अपना दायित्व भूलता जा रहा है। कैमरे के जरिए अब यह काले काम कर रहा है। अगर यह सशक्त रहा तो मेरा घर हमेशा आबाद रहेगा। इसे अपने दायित्वों को समझना होगा।

मेरे घर के चारो खंभे एक दूसरे के पूरक हैं। इन्हें मिलकर काम करना होगा। तभी हमारा भारत महान हो पाएगा।

जयदीप साहनी, चक दे… के असल हीरो

Jaideep Sahni

जी हां यही हैं चक दे! इंडिया के असल हीरो। साहनी ने जो काम किया है, वह कमाल का है। आप सभी लोगों ने अब तक तो फिल्म देख ही ली होगी। और नहीं देखी होगी तो सुना जरूर होगा। जिन्होंने चक दे.. देखी है इनका काम भी देख होगा। इन्हें नहीं देख पाए! जयदीप शाहनी और कोई नहीं चक दे.. के स्क्रिप्ट राइटर है। अब तो आप मानते होंगे कि चक दे.. के असल हीरो यही हैं।

वैसे तो इनके पिता आईएएस आफिसर थे और मां स्कूल टीचर लेकिन परिवार काफी साधारण था। साधारण परिवार को समझने के लिए आप इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि ‘खोसला का घोसला’ फिल्म की पटकथा इनके परिवार के साथ हुई घटना पर आधारित है।

जयदीप साहनी ने अपनी पढ़ाई दिल्ली के केंद्रीय विद्यालय के बाद डीपीएस, आरकेपुरम से की। उसके बाद उन्होंने दिल्ली में NIIT में एक साल तक कंप्यूटर प्रोफेशनल के रूप में काम किया। और फिर 6 साल तक किसी एड एजेंसी के लिए। वहां से जब उन्होंने अपना स्वतंत्र काम करने का सोचा तो इस्तीफा पत्र में लिखा, तेरी दो टकिया की नौकरी में मेरा लाखों का सावन जाए..।

रामगोपाल वर्मा को जयदीप साहनी के बारे में किसी ने बताया और उसके बाद उन्होंने लिखा ‘जंगल’। जंगल से जो सिलसिला शुरू हुआ वह ‘कंपनी’, ‘बंटी और बबली’, ‘खोसला का घोसला’ और अब चक दे! इंडिया।

आत्मविश्वास से भरे जयदीप शाहनी एक साक्षात्कार में कहते हैं कि पटकथा लिखने के लिए आपके आस पास चीजों को महसूस करना पड़ता है।

भडासी हैं बडे प्‍यारे

इनकी लेखनी आपको आहत कर सकती है। इनके शब्‍द या यूं कहें पूरी लेखनी आपको भी इनके लिए भडासी बना सकती है। लेकिन यह हैं बडे प्‍यारे लोग। आज ब्‍लागर्स मीट से आने और जाने के क्रम में दो भडासियों से जान पर‍िचय हुई। यशवंत जी और सच‍िन जी। इनकी बातों से मैंने जो समझा जो जाना कि यह ह़दय से बडे साफ हैं। यह किसी को आहत नहीं करना चाहते।

 हां अपनी बात रखने का ढंग थोडा जुदा है। यही इनकी पहचान है। लेकिन इन्‍हें कुछ चीजों से तो बचना ही चाहिए। अब किन चीजों से बचना चाहिए ये तो वो भी बेहद अच्‍छी तरीके से जानते होंगे।

इससे बड़ा (कु)तर्क हो नहीं सकता

जनता: आप लोग अपने चैनल पर यह भूत-प्रेत, सांप-नेवला, नरकलोक-स्वर्गलोक क्यों दिखाते हैं?

संपादक: आप जनता देखते हैं इसलिए हम दिखाते हैं।

यह कुतर्क है। मेरा मानना है। ऐसे लोग जो इसे तर्क मानते हैं वह बिना कु के ही पढ़े।