ईमानदारी से बोलूं तो दूरदर्शन तो मैं कम ही देखता हूं। ईद के चांद की तरह। देख लिया तो देख लिया नहीं तो कोई बात नहीं। लेकिन दूरदर्शन है ईद का चांद ही। पाक भी और साफ भी। इसे अपना दायित्व पता है और उसी के माफिक यह चलता है। कल रात दूरदर्शन की 48वीं सालगिरह के मौके पर एक बहस का आयोजन किया गया। विषय था- भारतीय टीवी चैनलों का दायित्व।

इस पर प्रभु चावला इंडिया टुडे समूह (इसी का ‘आज तक’ भी है)के मुखिया कहते हैं कि हमारा काम बदलते भारत को दिखाना है। हम कौन होते हैं जिम्मेदारी वहन करने वाले?

मैं नहीं समझता यह जिम्मेदारी भरा वक्तव्य है। आप लोकतंत्र के चौथा खंभा होने को तैयार हैं लेकिन दायित्व निभाने के लिए तैयार नहीं हैं। अतार्किक बातें।

राजदीप सरदेसाई कहते हैं कि हमारे रिपोर्टर अच्छे हैं लेकिन हम संपादक लोग खराब हो गए हैं!! क्यों हो गए हैं आप खराब? आप तो सुधरिए। कथनी को करनी में भी लाइए।

बहस में जो दर्शकगण बैठे थे वो दर्शक नहीं किसी न किसी संस्थान से जुड़े पत्रकार ही थे।

नंबर वन बनने की ऐसी दौड़ लगी है कि पता ही नहीं चल रहा कि हम अपने कपड़े भी गंदे कर रहे हैं। बहस का संचालन कर रहे आलोक मेहता इसके लिए ‘भेड़ चाल’ शब्द का प्रयोग करते हैं।

शक्तिमान फेम मुकेश खन्ना कहते हैं कि हर चैनल यह बताता फिरता है कि घटना कि पहली तस्वीर हमारे पास है। क्यों बता रहें हैं, जब आप ही के पास है तो लोग तो वैसे भी जान जाएंगे।

‘आंखों देखी’ वाली नलिनी सिंह कहती है कि पटियाला में जब कैमरामैन और रिपोर्टर आत्महत्या करने वाले व्यापारी को बताते हैं कि आग ऐसे लगाओ, अभी नहीं..। वह पत्रकार को भारत का जिम्मेदार नागरिक बनने को कहती हैं। यह बहस तो चलती रहेगी कि पत्रकार क्या करे, अपना काम या फिर लोगों को पुलिस को इन सब कार्यो को करने से रोके।

रामानंद सागर (रामायण के निर्माता-निर्देशक) के छोटे भाई कहते हैं कि हमने बिना टीआरपी को सोचे हुए रामायण बनाई, जिसे सब लोगों ने पसंद किया।

एनडीटीवी के पंकज पचौरी कहते हैं कि हम मिलजुल कर समिति बनाएंगे जो यह देखने का काम करेगा कि कुछ गलत तो नहीं हो रहा है।

लेकिन कब..।

इस बहस में जो बात मुझे समझ में आई कि यह एक प्रोग्राम बना जिसे दिखाया गया। इसका कोई खास असर हमें नहीं दिखेगा। हम पैसे की अंधी दौड़ के लिए दौड़ रहे हैं जिसकी लालसा बमुश्किल रुक पाएगी।