एक कार्टून: पाकिस्तान कि सही तस्वीर

Pakistan real image

शिल्पा शेट्टी को डाक्टरेट और गांधी जी से तुलना

Shilpa shetty

मेरे साथ काम करने वाले मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी ने कहा क्या किसी को भी डाक्टरेट दिया जा सकता है? उनका यह सवाल शिल्पा शेट्टी को लंदन की लीड्स विश्वविद्यालय द्वारा डाक्टरेट की मानद उपाधि देने पर था।

मैंने छूटते ही कहा क्यों लंदन में उसने जो लड़ाई लड़ी यह उसका पुरस्कार है। शिल्पा शेट्टी आज लंदन ही नहीं पूरे ब्रिटेन में सबसे चर्चित शख्सियतों में से एक है।

‘बिग ब्रदर’ में ना जाने शिल्पा को क्या-क्या कहा गया और उसने उसका जिस तरीके से सामना किया वह काबिले तारीफ है। साथ ही मैंने कहा अगर शिल्पा ने कोई बड़ा काम नहीं किया है तो फिर गांधी जी भी कोई बड़ा काम नहीं किया है। क्या किया उन्होंने? अपने देश को अंग्रेजों से छुड़वाया। भई अगर अपनी चीज आप किसी से लेते हैं या तो फिर आपने कोई बड़ा काम थोड़े ही किया है।

पहले शिल्पा शेट्टी के बारे में कुछ। उन्हें ‘बिग ब्रदर’ में शामिल होने के लिए 31.5 मीलियन डालर मिले। यह उनका व्यावसायिक डील था। शिल्पा शेट्टी ने प्रोग्राम शुरू होने के बाद चार दिनों तक नहाया नहीं क्योंकि बाथरूम में कैमरा लगा हुआ था। उन्हें अपनी पब्लिशिटी से ज्यादा अपनी संस्कृति की ज्यादा फिक्र थी। या फिर अपनी इज्जत की तो कम से कम थी ही। उसके बाद उन्हें जो कहा गया वह आप इस लिंक में देख सकते हैं।

शिल्पा ने बिग बास के शुरुआत में ही कहा था कि इसमें जीतने के उन्हें शून्य फीसदी आशा है, मेरे लिए सबसे बड़ी चीज होगी अपने सम्मान और संस्कृति को बचा कर रखना।

अब जरा गांधी जी की बात। गांधी जी के पिता करमचंद गांधी पोरबंदर के दीवान थे। बचपन में पढ़ने लिखने में अच्छे ना होने के बावजूद गांधी जी को 18 साल की छोटी आयु में विदेश पढ़ने के लिए भेजा गया। उस समय जब लोग अपने शहर से दूसरे शहर नहीं जा पाते थे। गांधी जी का पहनावा किसी राजकुमार से कम नहीं होता था। लेकिन फिर भी दूसरे देश दक्षिण अफ्रीका में पहले उन्हें सिर से पगड़ी हटाने के लिए कहा गया और बाद में ट्रेन के फ्रस्र्ट क्लास के कोच से धक्का देकर निकाल दिया गया।

मेरे विचार से गांधी जी सौ फीसदी सुधारवादी व्यक्ति थे। जब तक उन्होंने कोट और टाई पहना कोट और टाई की बड़ाई करते रहे। जब उन्होंने धोती पहनना शुरू किया धोती के लाभ गिनाने लगे।

गांधी जी ने भी अपना आत्मसम्मान और संस्कृति नहीं जाने दिया। ठीक वही काम शिल्पा शेट्टी ने लंदन के रियलिटी शो ‘बिग ब्रदर’ में किया।

अमिताभ बच्चन सत्तर के दशक में इसलिए पोपुलर हुए कि उन्होंने ऐसी फिल्मों में अभिनय किया जो आम युवाओं से मिलती थी। परेशान युवा को हर कोई सताने वाला होता था बचाने वाला कोई नहीं। और उन फिल्मों को देख तब का युवा मन अमिताभ को अपने से जोड़ता था।

आज लंदन में रहने वाले भारतीय व एशियाई मूल के लोग भी शिल्पा शेट्टी से अपने को जोड़ कर देख रहे हैं। शिल्पा ने पहले तो यह काम पैसों के लिए जरूर किया लेकिन बाद में प्रोग्राम के दौरान पैसा गौण हो गया। अपना आत्मसम्मान सर्वोच्च हो गया।

हमें लोगों की प्रशंसा हृदय से करनी चाहिए। अगर उसने सच में अच्छा काम किया है तो।

मेरा सच में मानना है कि शिल्पा शेट्टी ने जो काम किया उसका प्रभाव जरूर गांधी जी के द्वारा किए गए दक्षिण अफ्रीका के काम से कम हो लेकिन काम दोनों एक ही है।

बंडल फिल्म ‘नकाब’

Naqaab

अगर आपको आगे निकलना तो आप आगे निकले हुए किसी के भी पद चिन्हों पर ना चले। आप आगे नहीं निकल पाएंगे। आपको कुछ अलग करना होगा। लेकिन अलग अगर ‘नकाब’ की तरह हो तो फिर पद चिन्हों पर ही चलना ज्यादा अच्छा है।

अब्बास-मस्तान थ्रिलर एक्शन फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। ‘नकाब’ में ना तो कहीं थ्रिल है और ना ही कहीं एक्शन।

टेलीविजन पर एकबारगी आ रही रियलीटी शो से प्रेरणा लेकर ‘नकाब’ बनाया गया। लेकिन मेरी नजर में ‘नकाब’ पर से परदा उठाना समय और पैसा दोनों की बरबादी है।

चिट्ठेकार माँ/पिता क्या आपने ध्यान दिया है?

आज सुबह मेरा भतीजा स्कूल के लिए तैयार हो रहा था तो मैंने देखा कि उसका स्कूल बैग में बहुत कापी किताब हैं। वह दस साल का है। पांचवीं कक्षा में है।

मैंने जब उस बैग को उठाया तो पता चला कि बैग का वजन कुछ पंद्रह किलो के आसपास होगा। स्कूल सीबीएसई मान्यता प्राप्त है। लेकिन कापियां आप बाजार से नहीं खरीद सकते। स्कूल की अपनी कापियां हैं। बड़ी कापियां। स्कूल के लोगो के साथ।

क्या यह सही है। बच्चा परेशान है। मां-पिता का कहना है कि हम क्या कर सकते हैं। यह बैग परशुराम के धनुष की तरह भारी है। बच्चे की पीठ झुकी जा रही है। क्या आपके बच्चे भी इसी तरह स्कूल जा रहे हैं? अगर हां तो कुछ कीजिए। या फिर आप भी साधारण मां-पिता की तरह यही कह रहे हैं कि क्या किया जा सकता है?

मैं आतंकवादी बनना चाहता हूं

terrorist jpg
मैं दिन भर में औसतन 20 से 30 कीवर्ड सर्च करता हूं। अपने मतलब की। लेकिन एक खबर और एक कीवर्ड main terrorist banna chahta hon, जो मेरे ब्लाग पर मुझे दिखा उससे मैं चौंक गया। रोमन में सर्च किया गया यह कीवर्ड गूगल से मेरे ब्लाग पर उपयोगकर्ता को लाया है।

मुझे नहीं पता कि उपयोगकर्ता इसे क्यों सर्च कर रहा था। लेकिन मैं जब यह खबर बना रहा था तब मुझे पता चला कि लोग इंटरनेट पर ऐसा भी कहीं पब्लिक डोमेन में रखते हैं।

यह एक भयावह सच है। हमें इसे समझना होगा।

जब मैं इस मामले में अपने एक दोस्त से बात कर रहा था तो उनका कहना था, 12:52 kripal:

12:54 abey ek search ke liye itna bawal :)

  barbad hain tu bhi

12:55 me: tujhe lagata hai ki ye ek serach hai

  mujhe lagta hai ki bahut badi baat hai

यह मैंने उनके सहमति के बाद डाला है।

कहने का मतलब है कि इसके प्रति हम सभी लोगों को थोड़ा गंभीर व सजग होना होगा।

दिल्ली ब्लॉगर मीट: बतियाते बतियाते सांझ हो गई

अखबार के दफ्तर में हर सोमवार मीटिंग होती है। साथ में चाय-नास्ता भी होता है। बड़ा मजा आता है। चाय नास्ता करने में। मीटिंग में क्या मजा आएगा!

लेकिन कल पहले कैफे काफी हाऊस और बाद में मैथिली जी के यहां मिले। भई मुझे तो मजा आ गया। गणित में थोड़ा कमजोर हूं, गिनती नहीं कर पाया कितने लोग थे। वैसे जो भी थे मजेदार थे।

चाय और काफी की चुस्कियां लेने के बाद अमिताभ जी ने हमलोगों को 500 कैलोरी वाला लड्डू खिलाया। अमिताभ जी को मुबारकबाद दीजिए, उनको घर लक्ष्मी जी आई हैं। नया मेहमान आई हैं। उन्हें लड़की हुई है। उसके बाद हम हो चले मैथिली जी के यहां। बाजार के जानकार आलोक पुराणिक जी जिस बात को बताने के लिए $$$ लेते हैं वो हमने मुफ्त में जान लिया। बाजार किस तरीके से काम करता है, डिमांड एंड सप्लाई का पुराना गुरु मंत्र भी। भई सभी धुरंधर लोग जो पहुंचे थे।

उसके बाद खाने का दौर चला। कैलोरी 2900। अमित जी की साईज में तो बैठे-बैठे अंतर आ गया। सबने अपने अपने विचार रखे। हिंदी के उत्थान की बातें हुई। लोगों ने हिंदी को बढ़ाने के लिए तकनीकी, लेखन सामग्री की विविधता और ऐसे लेखन के बारे में बात की जो कालजयी हों।

परिचर्चा की बात उठी, चूंकि मैं परिचर्चा में शामिल नहीं होता हूं इसलिए मुझे कुछ खास समझ नहीं आ रहा था। लेकिन अब मैं कोशिश करूंगा कि परिचर्चा में भाग लूं।

अंत में पता चला कि यह गोष्ठी या मिलन ब्लागवाणी के आफिशियल या नान आफिशियल शुरुआत के नाम की जाए। तो यह थी बतियाते-बतियाते सांझ हो गई का छोटा विवरण। बड़ा आपके सामने जल्द ही चित्रों के साथ प्रस्तुत होगा।

‘Shakira’ कीवर्ड पर एक दिन में 221 हिट

कल मैंने कोई पोस्ट नहीं लिखी थी। और आज सुबह देखता हूं कि अंग्रेजी कीवर्ड Shakira से मेरा सपना में 221 हिट हैं। मैं तो पहले समझ ही नहीं पाया कि ये क्या हुआ? शकीरा, 221, एक दिन में। कोई आइडिया नहीं। फिर पता चला कि icq.com पर इमेज सेक्सन में शकीरा सर्च करने पर मेरा सपना में डाली गई एक इमेज आती है। सारे लोग वहीं से आ रहे हैं। खैर आएं देखें।

पहले भारत गोल्बल हुआ, उस गोल्बल भारत में शकीरा आई और अब मेरा सपना गोल्बल हो रहा है। पोस्ट देखें।

ब्लागिंग से सड़क तक, सब अहम की लड़ाई लड़ रहे हैं!

मुझे तो ऐसा ही लगता है। जिसको ना लगता हो अपनी असहमति जरूर दर्ज कराएं। साथ में कारण बताएं।

अहम। एक से बढ़कर एक। पेशेवर ड्राइवरों में तो जबरदस्त होती है। वह मेरे से आगे कैसे निकल सकता है। मैं उसे साईड ही नहीं दूंगा। या फिर उसे ‘साईड’ ही लगा दूंगा।

सड़क दुर्घटना की खबर सुनकर मैं थोड़ा परेशान हो जाता हूं। लेकिन भागते दौड़ते शहर में यह रोज होता है और मैं जिस पेशे से जुड़ा हूं वहां रोज दस दुर्घटना की खबर आपको पढ़ने को मिलेगी। इनसब में से कई दुर्घटनाओं की मूल वजह अहम ही होती है।

ब्लागिंग में भी यही हो रहा है। कोई किसी को मेल कर रहा है कोई किसी के बारे में लिख रहा है तो कोई किसी के बारे में। लेकिन कोई भी गलती को नहीं देख रहा है। बहस होने पर तमाम तरीके के जस्टीफिकेशन। अहम ही इसकी जड़ है। वैसे इतना जरूर जानता हूं कि यह अच्छी बात नहीं है।

एक ब्लागर दूसरे को साईड नहीं देना चाहता। ‘साईड’ लगा देना चाहता है। लोगों ने गुट बना लिए हैं। मैं इसके गुट का और वो उसके गुट का। भई साहब मैं किसी गुट का नहीं हूं। मुझे बख्शे। मुझे लिखने की आदत है।

वैसे ऐसा नहीं है कि मैंने सड़क और ब्लागिंग के बारे में लिखा है तो अहम की लड़ाई केवल यहीं है। छोटे बड़े रूप में सभी जगह है।

एक कार्टून: आम आदमी, भूत और टीवी चैनल

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ये एक मजाक है टीवी चैनल वालो पर

टिप्पणी में पहचान छुपाने वाले चिट्ठेकार!

चूंकि मैंने ऐसा कभी किया नहीं तो इसका ठीक-ठीक अंदाजा मुझे नहीं पता। हां! इधर मेरे पोस्ट पर बेनाम टिप्पणियां कुछ आ रही हैं। मैंने जानना चाहा और मैं जान गया कि वह कौन है। आईपी सबकुछ बता देता है।

खैर इसके पीछे का मतलब मैं समझ नहीं पाया। मुझे नहीं लगता कि मेरे से कोई डरता होगा। फिर..! शायद वह अपने आप से डरता होगा। हां, यह जरूर हो सकता है। वह अपने आप से ही डरता होगा।

मैंने कई पोस्ट में बेनाम टिप्पणियां देखी हैं और बार यही सोचता था कि यह लोग ऐसी हरकतें क्यों करते हैं। आप ऐसा काम क्यों करते हैं जिससे आपको अपनी पहचान छुपानी पड़ती है। जो लिखे खुल कर लिखें। हां, गालियां तो खुल कर नहीं लिखी जा सकती हैं तो ऐसा करें कि थोड़ी लिखने की प्रैक्टिस करें गालियों से ज्यादा धार दार लिखावट लिखनी आ जाएगी। लेकिन कृप्या बेनाम टिप्पणी लिखना बंद करें। शायद आप बेनाम लोग समझ रहे होगें।