भारत में पत्रकारो कि जवाब देही के बारे में मैं क्या कहू … यहा कि टीवी पत्रकारिता ”C” पर चलती है । सेक्स, सिनेमा, क्राइम और क्रिकेट । राजनीती तो ये मज़बूरी में दिखाते हैं । रही बात एग्जिट पोल कि तो आप मुझे ये बता दे कि १००-२०० रुपये प्रति दिन में कोई लड़का चुनाव चेत्र में जाकर क्या काम करेगा। ये सैफोलोजिस्ट अपने बारे में बडे बडे दावे करते हैं । इसी से उनकी रोजी रोटी चलती है । indian media ke baare BBC ki yah report bhi dekhe
एक बात तो कहना भूल ही गया की इस पोस्ट को पढ़ते हुए सृजन शिल्पी जी का यह पोस्ट जरूर पढे।
जी हां इस बार मायावती कि सोशल इंजीनियरिंग जरूर काम कर गई है। मैं तो इसका कायल हु। ये बात लेकिन महत्वपूर्ण है कि इसे वो बाना के रख पाती हैं या नही … मायावती अपनी बात बिना लाग लपेट के बहुजन समाज को कहती रही। चाहे वो खुद को देवी बनाने वाली बात हो या फिर खुद पर चादावे वाली। नेपथ्य के पीछे बोलना और काम करना मायावती कि प्रकृति में नही है।
बस अब इस तीसरे पैराग्राफ से मैं सृजन शिल्पी जी के लेख सहमत नही हू। चाहे बात किताबो कि हो या असलियत कि सोनिया गाँधी कम से कम आज भारतीय राजनीति कि सबसे ताकतवर और शस्कत महिला है। मेरे महिला कहने का मतलब ये नही है कि कोई पुरुष सोनिया गाँधी से ताकतवर है। रही बात राष्ट्रपति के चुनाव कि तो मायावती के पास विकल्प है ही नही। भैरो सिंह शेखावत को माया का समर्थन मिलने से रहा। बाक़ी किसी को भी माया के अकेले समर्थन से राष्ट्रपति चुना नही जा सकता है। बात एक दम पक्की है।
जहा कॉंग्रेस का कोई जनाधार ही नही है वहा राहुल बाबा और प्रियंका क्या कर सकती हैं? सपा और भाजपा कि तो यहा लुटिया दूब गई फिर हम आप कैसे सोच सकते हैं कि ये यहा के तुरुप हैं!!!
आपकी अगली पंक्ति मुझे हसी दिला रही है
:) आप बेशक कॉंग्रेस को पसंद करे या ना करे लेकिन एक बुद्धिजीवी होने के नाते आपको नेताओ के तरह बयाँ नही देने चाहिऐ। आपके पास कोई एक ठोस जवाब है जिससे आप ये बता पाये कि कॉंग्रेस अब सत्ता में क्यों नही लौटेगी?
क्या आप लोगो को ये पता है कि अगले लोकसभा चुनाव तक १९ राज्यों में विधान सभा के चुनाव होंगे? राजस्थान और मध्य प्रदेश दो बडे राज्यों के चुनाव भी इसी बीच होंगे। आरक्षण के बारे में मैं क्या कहू ?? आपके पोस्ट में जिन लोगो ने बधिया विश्लेषण लिखा है वही लोग इस पोस्ट में भी अच्छा लिख चुके हैं। अब मैं कुछ नही कह सकता। ये रहा आपका पोस्ट और ये आरक्षण पर लिखा गया रवीश का पोस्ट। जरा गौर से देखियेगा ।
इसके बाद जो आपने लिखा है उसके बारे में तो यही कहा जा सकता है कि हिंदी पट्टी को एक घातक बिमारी लगी है…. जातिप्रथा की। गावो में कहा जाता है, अपनी बेटी और अपना वोट अपने ही जात वालो को देना चाहिऐ।
और अंत में मेरा अपना मानना है की जैसे जैसे भारत में जागरूकता और साक्षरता बदेगी । देश में केवल विकास की राजनीती चलेगी। इसके बावजूद हिंदी पट्टी के बारे में मुझे थोड़ी बहुत शंका जरूर है। साथ में मैं यह कहना नही भूलूंगा की… काश !!! भारत में विकास की राजनीति जल्दी शुरू हो।