सिगरेट न पीने वालों की सोच

यार एक बार ट्राई करने में क्या है? सभी तो पीते हैं। फिर मैं क्यों नहीं? घर वालों को पता तो नहीं चल जाएगा? दोस्तों को पता तो नहीं चल जाएगा? पता नहीं क्या-क्या ख्याल आता है? कभी पीने को लेकर तो कभी न पीने को लेकर। क्या सिगरेट में भी नशा होता है?

कितना सिगरेट पीता है? यार यह कौन सी सिगरेट है? लंबी गाड़ी के अंदर बैठे शख्स को देख मन कहता है, कोई मंहगी सिगरेट होगी। मैं तो नाम भी ठीक से नहीं ले पाता.. मालबोरो.. नहीं मार्लबोरो।

कई बार दोस्तों ने जिद किया लेकिन यह सोच कर नहीं पिया कि दोस्त समझेंगे कि यह भी बिगड़ गया। कई ‘दोस्त’ हैं जो कई बार कहते रहते हैं एक बार पी लो। और कई दोस्त एक बात बार-बार कहते हैं कि कभी सिगरेट मत पीना।

बच्चे जब सिगरेट पहली बार पीते हैं तो उसके लिए कई बार प्लानिंग बनती है। स्थान का चयन होता है। समय के बारे में ध्यान दिया जाता है। ब्रांड सुझाए जाते हैं। यह नहीं वो..। यार!!! वो बड़ा हार्ड होता है। और ना जाने कई बातें..।

अब पीना चाहिए कि नहीं इसमें तो लंबी बहस हो सकती है लेकिन जो बात मेरे पल्ले पड़ी है वो है.. सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

प्रेस का स्टीकर भी बोलता है!!!

दिल्ली व दिल्ली से सटे नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गांव व बहादुरगढ़ के लोगों को कई सारी परेशानियां झेलनी पड़ती है। जो लोग रहते हैं उन्हें बखूबी मालूम होगा। कोई परेशानी होने पर आप 100 नंबर नहीं लगा सकते। चूंकि यह दिल्ली पुलिस मुख्यालय को ट्रांसफर हो जाएगा इसलिए एनसीआर में रहने वाले लोगों को थोड़ी परेशानी होती है। और भी कई छोटी बड़ी परेशानी होती है।
आज मैंने एक गलती कि लेकिन मैं परेशानी से बच गया। परेशानी और उसके निकलने की घटना बताने से पहले..। मैं दिल्ली में रहता हूं। मेरा आफिस नोएडा में है। जाने का रास्ता मुख्य सड़क से हटकर है।
हां!!! तो गलती यह हुई कि आज जब घर से आफिस आया तो मैंने हेलमेट नहीं लगाई थी। लेकिन दोपहर को खाना खाने दिल्ली के वसुंधरा इलाके में चला गया, बिना हेलमेट पहने। खाना बड़ा स्वादिष्ट था। मजा आ गया। उसके बाद एक गिलास जूस। पौष्टिक भोजन।
लेकिन जब लौटने लगा तो देखा कि दिल्ली-नोएडा बार्डर चेक पोस्ट पर कुछ सात-आठ पुलिसकर्मी वाहनों की जांच कर रहे थे। मुझे तो एहसास ही नहीं था कि मैंने कोई गलती की है। 40 किमी/प्रति घंटे की रफ्तार से चला आ रहा था। तभी एक पुलिस ने रोकने के इशारे से हाथ दे दिया। मेरा मन ठिठका। फिर एहसास हुआ कि हेलमेट..। सोचा बेटा आज अच्छे फंसे हो!!! नजदीक पहुंचते ही गाड़ी मैंने धीमी कर दी। देखा, कि कई दुपहिया-चार पहिया वाहनों को एक कतार से रोका गया है। किसी से रजिस्ट्रेशन तो किसी को चालान की गुलाबी कापी के साथ। तभी एक पुलिस वाले ने कहा कि अरे!!! इन्हें जाने दो। स्टाफ की गाड़ी है। और आगे जाने के लिए रास्ता दिया।
मेरे गाड़ी के आगे लाल अक्षरों में प्रेस, दैनिक जागरण लिखा हुआ था।

मूल बात
मैंने यह गलती आज कि है, मैं इसे मानता हूं और आइंदा से मैं बिना हेलमेट नहीं चलूंगा। हेलमेट पहनना हमारी सुरक्षा के लिए कानून रूप में शामिल किया गया है।

नई खोज: विवाद में शामिल हो जाइए और हिट पाइए

आप नए ब्लागर हैं? आपके ब्लाग की हिट कम है? फेमस होना चाहते हैं? कोई बात नहीं मैंने एक नई खोज की है। शर्तिया है। कुछ so called (तथा कथित) मशहूर ब्लागरों के लफड़े में फंस जाएं। और उनके नाम से एक पोस्ट लिख दें। बस!!! हो गया काम। आप देखिए आपके ब्लाग को खूब सारी हिट मिलेंगी।

एक और तरकीब है। राजनीति के दो विरोधी गुटों के बारे में लिखना शुरू कीजिए। राइटिस्ट व मोरल पुलिसिंग को खूब भला-बुरा कहिए। कोई ना कोई आपको काउंटर जरूर करेगा। ना हो तो उनका सपोर्ट करिए। क्योंकि आपका उद्देश्य विचार रखना नहीं है। आपका उद्देश्य सस्ती लोकप्रियता और हिट पाना है। लोगों को अशांत कर दीजिए। आपके ब्लाग को हिट ही हिट मिलेंगे।
ऐसे मुद्दों पर एकदम बात ना करें जो थोड़ी स्वस्थ बहसें हो सकती हैं। उन पर आपका ध्यान होना चाहिए जो विवाद को बढ़ावा दे।

मूल बात

हर चौथा हिंदी ब्लागर यही कर रहा है। माना कि ब्लाग में ब्लागर अपनी निजी, सामजिक और पसंद की बातों को लिख सकता है। लेकिन केवल लिखने के लिए ही ब्लाग लिखना.. ना भाई ना।
सुनीता नारायण को कोई नहीं जानता था लेकिन एक रिसर्च और उसके बाद रिपोर्ट ने उसे रातों-रात लोगों के जुबान पर ला दिया। मेहनत करें। और कुछ अच्छा लिखें। अच्छा ना लिखें, तो कम से कम विवाद तो ना फैलाएं। पहले नेता लोग अतिक्रमण करते थे अब हम ब्लागर करने लगे हैं। कितनी शर्म की बात है।

सभी में पांच, पाक पोर्टल पर छह की मौत

मुझे नहीं पता कि यह क्यों है लेकिन गुगल के न्यूज सर्विस पर जब मैंने हैदराबाद ब्लास्ट के बारे में देखा तो मुझे मिला कि ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, कनाडा वालों को मालूम है कि भारत के दक्षिण राज्य आंध्र प्रदेश में एक विस्फोट हुआ जहां पांच की मौत हो गई लेकिन हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के एक समाचार पोर्टल को जानकारी है कि छह लोग मारे गए। ऐसा कैसे हो सकता है?? मुझे लगता है कि इनका कुछ नहीं हो सकता है।

blast screenshot

खबर बदल ना जाए इसके लिए मैं इस पेज को स्कीनशाट लगा रहा हूं।

चाचू!!! 34, इसपे cartoon आता है!!!

आपके घर में कोई छोटा बच्चा है। 5 से 15 साल तक काफिर तो आपको हेडिंग समझ में जाएगाऔर अगर ना समझ में आये तो मैं बता देता हुकन्नू, मेरा भतीजा११ साल का है।  सभी बच्चो कि तरह टीवी, विडो गेम उसे बेहद पसंद हैऔरो से अलग उसे सारे स्पोर्ट्स पसंद हैंखेलना नही देखनाक्रिकेट, हॉकी, फूटबाल और WWF। आज मैं उसके साथ बैठा टीवी पर कुछ देख रहा था तभी मैंने चैनल बदलाबोर हो रहा कन्नू कहता है चाचू!!! ३४ लगाओ ना उसपे कार्टून आता है। 

क्या हमलोगो ने कभी बच्चो कि बात मानकर उनके साथ कार्टून देखा हैहंगामा, कार्टून, जेतिक्ष्  और भी कई चैनल हैंसब कुछ है इनमेपॉवर रेंजर्स, पिकाचू, स्पिदेर मन….और ज्यादा मुझे नाम याद नही रहेकार्टून के सभी देशी-विदेशी चरित्र आपको इन चैनल्स में मिल जायेंगेलेकिन वो बात नही हैइन सब का व्यावसायिकरण हो गया हैयाद कीजिये आपने अपने दादा-दादी से कहानिया सुनी होंगी।  जिसके बाद हम बडे खुस हो जाया करते थेऔर अगले दिन फिर दुसरी कहानी सुनाने को जिद करते थे

तेनालीराम किताबो से निकलकर अब टीवी पर गया हैमैं चंदामामा में उसे पढ करता थामेरे लिए तब कार्टून का मतलब केवल He-MAN और Spider Man ही थाकहानिया मैं सुमन सौरभ, चंदामामा या फिर नन्दन में पढा करता था

आज के बच्चे स्य्लुबस कि कहानिया तो पढ़ ले… !!! हमे ही समझना होगा कि हम इन्हें क्या पढ़ाना चाहते हैंक्योंकि बच्चे शास्वत रुप से हमेशा भोले होते हैं

क्या पढ़े, क्या देखे? इंफोरमेशन ओवरलोड का जमाना है

स्कूल से लेकर काम करने तक। पढ़ाई, पढ़ाई और पढ़ाई। अब तो बच्चा बोलना शुरू करता है तो उसकी मम्मी ए, बी, सी पढ़ाना शुरू कर देती हैं। बेटा यह क्या है? नोज बोलो नोज। यह ईयर, यह आई, टीथ, चीक..बच्चे को पारंगत बनाने की पूरी तैयारी चलती होती है। इसके पीछे का कारण जानिए।

जब अपार्टमेंट में रहने वाली सारी महिलाएं मिलती हैं तो सभी को अपने बच्चे के बारे में बताना होता है कि चिंटू तो अब ऐसे जवाब देता है कि पूछिए मत !!! विक्की के तो इस बार अंग्रेजी में नाइंटी फाइव मार्क्‍स आए हैं। मेरी सोनू तो स्कूल से आने के बाद सबसे पहले अपना होमवर्क बना लेती है। और ना जाने क्या..क्या..।

हर कोई दूसरे की बात काट कर अपनी बात बताना चाहता है। सुनने वाले कम हो गए हैं। बनाने वाले ने मुंह एक और कान दो बनाए हैं ऐसे तर्को में लोग फंसना नहीं चाहते।

किसी अंजान से चैटिंग करो तो वहां आपको कम सुनने के लिए मिलेगा। मेरे साथ भी यही हुआ। मैं भी सीमा जी से चैंटिंग कर रहा था। उन्होंने पूछा आप क्या करते हैं। मैंने विकिपीडिया का अपना यूजर लिंक दे दिया। उसके बाद उन्होंने कुछ पूछा जिसका जवाब मैंने दिया। और मैंने लिखा Need to explore more । सीमा जी ने aadmi kya kya explore kare? waise bhi इंफोरमेशन ओवरलोड का जमाना है!!! मैने सोचा भई बात तो सही है लेकिन हमें क्या पढ़ना चाहिए से ज्यादा जरूरी है कि हमें क्या नहीं पढ़ना चाहिए।

इंटरनेट पर सवार हम ‘नवाब’ क्या देखते हैं। इसकी एक बानगी मैंने हमें मस्ती और सेक्स चाहिए पोस्ट में की थी। हम जो भी करते हैं उसके लिए जिम्मेवार भी हम ही हैं।

”संभावना व संघर्ष” दोनों में है जबर्दस्त दम

खुशी लोगों के पास कम देर रहती है। आती भी है तो चली जाती है। लेकिन दुख हमेशा रहता है। खुशी के मौके पर चिंता व कष्ट बना रहता है। लेकिन जिंदगी चलने का नाम है..। यह चलती रहती है, अपनी चाल से..। चाहे सुख हो या दुख। आपको पता भी नहीं चलेगा।

क्या आपको याद आता है कि आपने कब दसवीं पास की थी? क्या आपको याद आता है कि आपने कब नौकरी ज्वाइन की थी? क्या आपको याद आता है कि आपने चिट्ठा लिखना कब शुरू किया है? क्या आपके बचपन के शौक और अब के शौक में बदलाव आ गया है? यह कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो आपको खुशी दे सकते हैं।

मेरी अपनी समझ कहती है कि जीवन में आपने ‘संभावना और संघर्ष’ से दोस्ती की है तो आप कुछ भी कर सकते हैं। हर जंग जीत सकते हैं। अगर आप दुख से हार कर बैठ गए तो आपके हाथ कुछ हासिल नहीं होगा। कुछ भी नहीं। कोशिश करें हौसला ना खोएं और योजना के साथ आऐ बढ़े।

परिस्थिति चाहे कोई भी हो संभावना उससे उबरने की जरूर होती है। और संघर्ष आपको जीत दिला देती है।

मैंने यह चिट्ठा अपने एक दोस्त के कहने पर लिखा है। आशा है कि वह इसे पढ़कर कुछ समझ पाए।

धन्यवाद॥
राजेश रोशन

सोनिया, मायावती, करुणानिधि, मुलायम… : पार्टी बड़ी या नेता

आज का अखबार तो आप लोगों ने देखा होगा। सभी अखबार के पहले पन्ने पर यह खबर थी। हेडिंग लगी हुई थी। दयानिधि मारन का इस्तीफा। पार्टी सुप्रीमो के कहने पर मारन ने इस्तीफा दिया। क्यों?

भारत में भाजपा व लेफ्ट को छोड़कर अमूमन सभी पार्टियों का कोई ना कोई एक परमानेंट मुखिया है। कांग्रेस तो नेहरू-गांधी परिवार की जागीर की तरह है। मान्यवर कांशीराम के जाने के बाद मायावती अकेली ‘मालकिन’ है बसपा की। मुलायम सिंह यादव केवल नाम से मुलायम हैं समाजवादी पार्टी में इनकी पकड़ बड़ी कठोर है। रामविलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, जयललिता सरीखे नेता पार्टी पर हमेशा अपनी पकड़ मजबूत रखते हैं।

आप लोगों ने मायावती के शपथ समारोह में बसपा पार्टी नेताओं को मायावती का पांव छूते तो देखा होगा!!! क्या पार्टी से बड़ी इनकी शख्सियत है? क्या नेता पार्टी के नाम पर चुनकर आते हैं या अपने सुप्रीमो के नाम पर या अपने काम-नाम के बूते। यह भारत का राजनीतिक मिजाज है। साथ ही यह हमारा सामाजिक व्यवस्था को भी बतलाती है।

Maya power

आपको किसी भी आफिस में कोई भी कर्मचारी यह कहता मिल जाएगा कि अगर तरक्की पानी है तो बॉस से जुगाड़ बना के रखो। भले ही बॉस कंपनी का मालिक ना हो।

भारत के वर्तमान राष्ट्रपति ने अभी कुछ दिन पहले कहा कि भारत में दो दलीय व्यवस्था होनी चाहिए। इससे भारत की विकास की गति तेज होगी। कई पार्टियों ने इसका विरोध किया।

लेकिन क्या यह जो व्यवस्था चल रही है उससे भारत का मिशन-2020 पूरा हो पाएगा? मेरा व्यवस्था कहने से मतलब अपनी हेडिंग की ओर ध्यान दिलाने से है। मारन की क्या गलती थी यही कि वह उस अखबार के मालिक के छोटे भाई हैं जिस पर वह सर्वे छपा था कि करुणानिधि के बाद उनका उत्तराधिकारी कौन होगा? दयानिधि मारन को तरजीह क्यों नहीं दी गई?

इन सब बातों को सोचकर कई लोग यह कह देते हैं.. 100 में से 80 बेईमान, फिर भी मेरा भारत महान।

मायावती: कुछ तस्वीरे, कुछ कह रही हैं…

बदले बदले से सरकार नजर आते हैं …..इनके तो बर्बादी के आसार नजर आते हैं

Mulayam in oath ceremony

मायावती का माँ प्रेमMaya mummy

अपने आंखो से पट्टिया हटाओहाथी नही… “बहुत बड़ाहाथी है

Cartoon

मायादेवी

Maya power

और साथ ही आज के कुछ अखबारो के शीर्षकअमर उजाला : छक्के पे छक्का

जनसत्ता: मुख्यमंत्री बनते ही माया ने दिखाए तेवर

दैनिक जागरण: सीएम बनते ही फार्म में दिखी मायावती

राष्ट्रीय सहारा: चुनाव घोषणा बाद के सभी फैसले रद्द

Hindusatan Times: UP bureaucrats realise Maya is memsahib

Times of India: Maya in saddle, goes after SP

भारत कि भावी राजनीति साथ ही सृजन शिल्पी के चिट्ठे का जवाब

भारत में पत्रकारो कि जवाब देही के बारे में मैं क्या कहूयहा कि टीवी पत्रकारिता ”C” पर चलती हैसेक्स, सिनेमा, क्राइम और क्रिकेटराजनीती तो ये मज़बूरी में दिखाते हैंरही बात एग्जिट पोल कि तो आप मुझे ये बता दे कि १००-२००  रुपये प्रति दिन में कोई लड़का चुनाव चेत्र में जाकर क्या काम करेगाये सैफोलोजिस्ट अपने बारे में बडे बडे दावे करते हैं । इसी से उनकी रोजी रोटी चलती है । indian media ke baare BBC ki yah report bhi dekhe

एक बात तो कहना भूल ही गया की इस पोस्ट को पढ़ते हुए सृजन शिल्पी जी का यह पोस्ट जरूर पढे

जी हां इस बार मायावती कि सोशल इंजीनियरिंग जरूर काम कर गई हैमैं तो इसका कायल हुये बात लेकिन महत्वपूर्ण है कि इसे वो बाना के रख पाती हैं या नहीमायावती अपनी बात बिना लाग लपेट के बहुजन समाज को कहती रहीचाहे वो खुद को देवी बनाने वाली बात हो या फिर खुद पर चादावे वालीनेपथ्य के पीछे बोलना और काम करना मायावती कि प्रकृति में नही है

बस अब इस तीसरे पैराग्राफ से मैं सृजन शिल्पी जी के लेख सहमत नही हू।  चाहे बात किताबो कि हो या असलियत कि सोनिया गाँधी कम से कम आज भारतीय राजनीति कि सबसे ताकतवर और शस्कत महिला हैमेरे महिला कहने का मतलब ये नही है कि कोई पुरुष सोनिया गाँधी से ताकतवर हैरही बात राष्ट्रपति के चुनाव कि तो मायावती के पास विकल्प है ही नहीभैरो सिंह शेखावत को माया का समर्थन मिलने से रहाबाक़ी किसी को भी माया के अकेले समर्थन से राष्ट्रपति चुना नही जा सकता हैबात एक दम पक्की है

जहा कॉंग्रेस का कोई जनाधार ही नही है वहा राहुल बाबा और प्रियंका क्या कर सकती हैं? सपा और भाजपा कि तो यहा लुटिया दूब गई फिर हम आप कैसे सोच सकते हैं कि ये यहा के तुरुप हैं!!!

आपकी अगली पंक्ति मुझे हसी दिला रही है :) :) आप बेशक कॉंग्रेस को पसंद करे या ना करे लेकिन एक बुद्धिजीवी होने के नाते आपको नेताओ के तरह बयाँ नही देने चाहिऐआपके पास कोई एक ठोस जवाब है जिससे आप ये बता पाये कि कॉंग्रेस अब सत्ता में क्यों नही लौटेगी?

क्या आप लोगो को ये पता है कि अगले लोकसभा चुनाव तक १९ राज्यों में विधान सभा के चुनाव होंगे? राजस्थान और मध्य प्रदेश दो बडे राज्यों के चुनाव भी इसी बीच होंगे। आरक्षण के बारे में मैं क्या कहू ?? आपके पोस्ट में जिन लोगो ने बधिया विश्लेषण लिखा है वही लोग इस पोस्ट में भी अच्छा लिख चुके हैंअब मैं कुछ नही कह सकताये रहा आपका पोस्ट और ये आरक्षण पर लिखा गया रवीश का पोस्टजरा गौर से देखियेगा

इसके बाद जो आपने लिखा है उसके बारे में तो यही कहा जा सकता है कि हिंदी पट्टी को एक घातक बिमारी लगी है…. जातिप्रथा कीगावो में कहा जाता है, अपनी बेटी और अपना वोट अपने ही जात वालो को देना चाहिऐ

और अंत में मेरा अपना मानना है की जैसे जैसे भारत में जागरूकता और साक्षरता बदेगी । देश में केवल विकास  की राजनीती चलेगीइसके बावजूद हिंदी पट्टी के बारे में मुझे थोड़ी बहुत शंका जरूर हैसाथ में मैं यह कहना नही भूलूंगा कीकाश !!! भारत में विकास की राजनीति जल्दी शुरू हो