पाकिस्‍तान की जीत से दुखी

मेरा दोस्‍त खेल प्रेमी है…नहीं क्रिकेट प्रेमी है…नहीं वह कुछ और है… सायना नेहवाल को नहीं जानता (ये सानिया मिर्जा हैदराबादी नहीं ये हिसार की हैं, बैडमिंटन खेलती हैं) हां तो मेरा दोस्‍त आज दुखी है. पाकिस्‍तान टी 20 विश्‍व कप का चैंपियन हो गया ना…कहता है ये कौन सायना! सायना नहीं जीतती और पाकिस्‍तान भी नहीं जीतता तो मैं ज्‍यादा खुश होता…

पता नहीं क्‍या कहना चाहता है…मेरी समझ में तो नहीं आया.. लोग अपने दुख से दुखी नहीं हैं, दूसरों (पड़ोसी) के सुख से दुखी हैं.

बड़े दिनों बाद ब्‍लाग पर लिख कर अच्‍छा लग रहा है.

वोट और बेटी अच्‍छे इंसान को देना चाहिए…

ऑफिस से लेकर सड़क तक सब राजनीति ही करते हैं. मेरा कैब ड्राइवर कहता है मैं तो अपना वोट अपनी जात वाले को ही दूंगा किसी और को देने का सवाल ही नहीं उठता. फिर कहता है फलां हमारी जात वाला है वह चाहे घोटाला क्‍यों ना करें लेकिन वोट तो मैं उसे ही दूंगा… ड्राइवर बिहार का है.

मैंने मन में केवल उफ…भर किया…यह उफ भर ही काफी दर्द देने वाला है. मैंने सोचा क्‍या बेटी और वोट केवल अपनी जाति वाले को ही देना चाहिए या उस इंसान को जो अच्‍छा है…मुझे लगता है मेरा शीषर्क मेरा जवाब है.

गाना तो केवल लता मंगेशकर गाती है….

कहीं दूर से आवाज आई कि यार क्‍या गाना गाती है….गाना तो केवल लता मंगेशकर गाती है! मैं सोचने लगा कि बाकि के गायक क्‍या करते हैं… आशा भोंसले, कविता कृष्‍णमूर्ति, श्रेया घोषाल और भी ना जाने कितनी….

 ये बात मैं इसलिए लिख रहा हूं कि आज मैंने किसी ब्‍लाग में देखा कि कोई कह रहा था कि ब्‍लागिंग तो केवल आप ही करते हैं बाकि तो सब…. मैं ऐसा नहीं मानता…जिसने कहा उसके ब्‍लाग को लेकर भी नहीं सोचता

 ब्‍लोगिंग सर्वथा निजी चीज है…आप उसमें गीत लिखें या गाली, कार्टून पोस्‍ट करें या बहस करें यह आपका और सिर्फ आपका निजी मामला है और कुछ नहीं….

गजनी @ Regal

बुधवार को 650 पेड प्रिव्‍यू के साथ रीलीज हुई गजनी ने आम लोगों के बीच गुरुवार को ही अपनी जगह बना ली थी. इस बार साप्‍ताहिक छुट्टियां शुक्रवार और शनिवार को होने का कारण मैंने भी गजनी देखने की सोची… इंटरनेट पर सर्च मारा तो पता चला कि गजनी कि टिकटें ही नहीं बिक रहीं है….एडवांस बुकिंग के कारण्‍ा टिकटें पहले ही बिक चुकी थीं…और जो बिक रही थी वह फर्स्‍ट या सेकेंड पक्ति की… फिर मुझे रीगल में टिकट मिली और वहीं की मैंने दो टिकट बुक करा ली…

 यह भी एक अच्‍छा अनुभव रहा… सिंगल थियेटर में फिल्‍म देखने का… मल्‍टीप्‍लेक्‍स का जमाना है बड़े शहर के लोग सिंगल थियेटर कहां जा पाते हैं…वो छोटे फिल्‍म के पोस्‍टर Now Showing के बोर्ड में… ट्यूब लाइट की रोशनी में… अंदर जाते ही आपका स्‍वागत शिखर गुटखा खा रहा, अपने हाथा में AA की बैटरी वाला टार्च लिए आपकी टिकट देखते हुए कहता है…यहां सात सीट छोड़कर….रीगल में बड़े दिनों बाद यह अनुभव हुआ…

 बैठते हुए समझ में आ गया था कि सीट एक कोने से फट रही है और इसके अंदर नारियल के रेशे हैं… भला हो आमिर खान का कि फिल्‍म अच्‍छी बनाई थी…

लोगों की तालियां और सीटियों के बीच मैं फिल्‍म देख रहा था… फिल्‍म को हिंसक बनाया गया है… यह एक कंप्‍लीट एंटरटेनमेंट फिल्‍म है. रोमांस, गाने और लड़ाई वाली फिल्‍म.

आमिर खान के साथ अभिनेत्री असीन ने भी जबरदस्‍त काम किया है. कभी-कभी तो लगता है कि आमिर पर भारी पड़ रही है लेकिन आपके इस विचार को गलत करने के लिए आमिर जैसे ही सीन में आते हैं आप अपना मन फिर बदल देते हैं.

कुल मिलाकर ऐसे एक्‍शन मिथुन की फिल्‍मों में होते हैं लेकिन उसके दर्शक वर्ग समाज का कोई दूसरा वर्ग होता है इसलिए वह फिल्‍म नहीं देखी जाती. उन फिल्‍मों में और गजनी में केवल अंतर स्क्रिप्‍ट और एक्‍टर का है. बाकि मसाला फिल्‍म वो भी होती है यह भी है…

अंग्रेजी की तल्‍खी और हिंदी की बेचारगी

इस शीर्षक को समझने के लिए हिंदी और अंग्रेजी के पत्रकारों से बात किजिए…बात थोड़ी बहुत समझ में आ जाएगी…ऐसा कम हुआ है कि रिपोर्ट हिंदी में लिखी या बनाई गई हो और उसका अनुवाद या प्रोडक्‍शन अंग्रेजी वालों को करना पड़ा हो. एमजे अकबर जब संडे आब्‍जर्वर के संपादक थे तब वह एसपी सिंह के नेतृत्‍व में निकलने वाली रविवार के कुछ रिपोर्ट को अंग्रेजी में अनुवाद कराकर निकालते थे…

आज सुबह ऐसा ही कुछ वाक्‍या मैंने देखा…मैंने एक रिपोर्ट फाईल की जो हमारे इनहाउस के बारे में थी…मैंने वह रिपोर्ट अंग्रेजी वालों को इसलिए बता दी कि इनहाउस का मामला है वह भी देख लें….मुझसे कहा गया कि मैं उस हिंदी का अंग्रेजी अनुवाद करके दे दूं….

मैं समझ नहीं पाया कि मैं दे दूं….क्‍यों….मैंने साफ-साफ कहा कि जब हम अनुवाद करते हैं तो क्‍या कभी कहा कि आप हमें ट्रांसलेट करके दे दीजिए….

मैंने उसका अनुवाद नहीं किया…लेकिन वह तल्‍ख रवैया तो जरूर देखा….

 यह है अंग्रेजी की तल्‍खी….

पोस्‍ट, हाईटेक होते कमेंट पर….

2008 का नवबंर महीना, मैं पोस्‍ट लिख रहा हूं, कई लोग लिख रहे होंगे…लेकिन कई लोग ऐसा भी कुछ कर रहे होंगे जिनके बारे में 2012 में कहीं लिखा कहा जाएगा कि यह 2008 में फलां फलां कर रहे थे…

मैं नहीं जानता वह क्‍या काम करे हैं…हम में से बहुत कम ही लोग होंगे जो यह जानते होंगे….

मैं यह नहीं कहता कि हमारी समाजिक जिम्‍मेदारियां नहीं हैं या फिर हमें ऐसे चीज में पिले पड़े रहना चाहिए जो केवल समाज को सुधारने का काम करे…ना एकदम नहीं…

सामंजस्‍य होना चाहिए…

आप सभी लोग उस इंसान के बारे सोचिए जिनके आप कद्रदान हैं…उनके बारे में सोचिए जिनके काम करने के तरीके का आप नकल उतारने की कोशिश करते हैं…उनमें भी कमी होगी…

मैं गांधी को संपूर्ण के करीब मानता हूं…संपूर्ण नहीं मानता क्‍योंकि गलतियां उन्‍होंने भी की है…हर कोई करता है. मैं, आप..हम सभी लोग

मैं यह नहीं कहता कि पोस्‍ट लिखना बेकार है…वाह-वाह करना बेकार है…बधाई देना बेकार है…

लेकिन…

क्‍या उसे ईमानदारी से जीवन में उतारते भी हैं या सिर्फ पोस्‍ट ही भर है…

बांग्‍लादेश के ग्रामीण बैक की स्‍थापना मोहम्‍मद युनूस ने 1983 में रखी थी…नोबेल प्राईज उन्‍हें 2006 में मिला था. एक हम हैं पोस्‍ट लिखते हैं और पेज रिफ्रेश कर तत्‍काल देखते हैं कि क्‍या कोई कमेंट आया है क्‍या?

गीता में कहा गया है, कर्म करो फल की चिंता मत करो…
मैं कहता हूं…निष्‍छल भाव से कर्म करो और फल की चिंता मत करो…

इस बातों का भी विरोध करने वाले ढेरों पड़े हुए हैं…

लिखिए, खूब लिखिए लेकिन केवल इतना ही ध्‍यान रखिए कि जो लिख रहें हैं वैसा ही आप हों भी… मतलब कि लिखने का केवल ढ़ोग ना करें….

अंत में प्रशांत प्रियदर्शी के लिए यह लिंक

फैशन: रंगीन दुनिया के पीछे का अंधेरा

नीली और हरी रोशनी से जगमगाता मंच. वहां खड़े हर शख्‍स के पहनावे को थोड़ा बदल देता है. केवल पहनावा ही नहीं बदलता कभी-कभी पूरी जिंदगी बदल देता है. मधुर भंडारकर की फिल्‍म फैशन को देखने के बाद ऐसा ही कुछ लगेगा.

स्‍पाईडरमैन सीरिज की पहली फिल्‍म में स्‍पाईडरमैन के अंकल कहते हैं अगर पद बड़ा हो तो आप पर जिम्‍मेदारी उससे ज्‍यादा बढ़ जाती है. पैसा और पावर कहां लोग पचा पाते! पचा पाने को बोलचाल की भाषा में कहूं तो जीवन में कम्‍पोज कहां बन पाते हैं. फिल्‍म में एक जिंदगी शुरू होती है और उससे पहले ठीक वही एक जिंदगी उसी दुनिया में जी रहा होता है. इशारा मिलता है लेकिन… वह कहते हैं ना जब तक गलती ना कर लो उस गलती का एहसास नहीं हो पाता है. दूसरे के अनुभव से कहां कोई सीख पाता है!

जिंदगी में गलती करना आसान है उससे उबर जाना बहुत कठिन. निर्देशक को सकारात्‍मक फिल्‍म बनानी थी इसलिए मेघना अरोड़ा (अभिनेत्री) उससे उबर जाती है लेकिन क्‍या रियल लाईफ में भी ऐसा होता है.

मुझे नाम तो याद नहीं लेकिन एमटीवी की कोई वीजे हुआ करती थी, चार-पांच साल पहले मुंबई में उन्‍होंने आत्‍महत्‍या कर ली थी.

आधुनिकता जैसे-जैसे आपके दरवाजे के चौखट पर आएगी यह सबसे पहले आपकी परंपरा और संस्‍कृति पर हमला करेगी. रेव पार्टियां, सोशालाईट्स, वोग, एफटीवी, ड्रग्‍स ऐसे तमाम सारी शब्‍दावलियों के आप हिस्‍से हो जाएंगे.

मेरे घर से दूर ईट्ट के भठ्ठे पर काम करने वाला मजदूर शराब पीता है, जानते हैं क्‍यों…. अपनी थकान दूर करने के लिए और जो लोग ड्रग्‍स लेते हैं जानते हैं यह क्‍यों लेते हैं….जोश के लिए, मस्‍ती के लिए.

फिल्‍म की बात करुं तो मधुर भंडारकर की पिछली तीन फिल्‍मों से इसे अगर तुलना नहीं करेंगे तो यह फिल्‍म भी अच्‍छी बनी है. फिल्‍म शायद थोड़ी लंबी बन गई है. अंतिम 15 मिनट से पहले के 10-15 मिनट शायद दर्शकों को बोर कर दे. वैसे मुझे इसका साईनिंग ट्यून पसंद है, जो फिल्‍म में बार-बार चलता रहेगा.

जाकर फिल्‍म थियेटर में देखिए अगर आप पाईरेसी के खिलाफ हैं तो… वरना एक दो दिन में भारतीय बाजार में इसकी डीवीडी मिल जाएगी.

लास्‍ट पोस्‍ट से आज तक

क्‍या इतना आसान ही होता है सबकुछ

या होती है इतनी ही उलझन

हरेक क्षण

कहीं मुस्‍कान, तो कहीं थरथराते होंठ

सागर भी देखे हैं उसने, और ऊंचाई पहाड़ की भी

तब शायद मतलब नहीं समझ पाया होगा इनका

इनके मायने भी हजार होते हैं…..

क्रिकेट खेल कर लौट रहे बच्‍चे, जाते लोगों से लिफ्ट मांगते

गाडि़यों और घरों से भरा शहर

भावनाएं बसती तो होंगी वहां

लोग जवाब में ‘शायद’ कहते हैं

इन सब  के बावजूद

फूल, सुबह, चांद, सूरज

हैं सब कुछ वैसे ही…… नैचुरल

जैसे लता और येशुदास का  गाया हुआ यह गीत

 मधुबन खूशबू देता है, सागर सावन देता है

जीना उसका जीना है, जो औरों को जीवन देता है…..

क्‍या इतना आसान ही होता है सबकुछ

या होती है इतनी ही उलझन

हरेक क्षण????

पहले ही वनडे में नीरज पांडे का शतक: A Wednesday

हरेक फिल्म देखने के बाद मैं अपने एक दोस्त को फिल्म के बारे में मैसेज करता हूं। वेडनसडे देखने के बाद मैंने लिखा, Superb Direction and Outstanding Acting by Legend Duo.
आप लोगों ने फिल्म नहीं देखी है तो जाकर देखिए थियेटर में जाकर। जिन्हें पाईरेसी से परहेज नहीं हैं घर पर डीवीडी लाकर देखिए।

जब कोई नसीरुद्दीन शाह और अनुपम खेर के बारे में कहते हैं कि ये लोग कमाल के एक्टर हैं और आपको उनकी बात नहीं समझ में आती है तो यह फिल्म देखिए कमाल के एक्टर होने का मतलब समझ में आ जाएगा।

यह फिल्म आपको थियेटर की कुर्सी से उठने नहीं देगी। फिल्म की जान है इसका संवाद, निर्देशन और हमेशा एक अजीब सा चलने वाला बैकग्राउंड म्यूजिक।

आतंकवाद से लड़ने वाले साधारण इंसान की कहानी जो मैं, आप, आप, आप… कोई भी हो सकता है। कोई भी.. यह साधारण इंसान भी हमारे आपके तरह ही घुटता रहता है, बर्दाश्त करता रहता है और एक दिन वह…. फिल्म जाकर देखिए मैं नहीं बताऊंगा।

फिल्म खुदा के लिए में नसीरुद्दीन शाह के अंतिम दस मिनट के डायलग और वेडनसडे के अंतिम दस मिनट के डायलग लोगों को, समाज को बदलने वाला है।

कई दिनों की बैचेनी थी ब्लाग लिखने की सो वेडनसडे ने दूर कर दी। Thanks to Naseer Ji, Anupam ji and Director Neeraj Pandey and The Whole Team of A Wednesday.

 Film Official Website: A Wednesday

नौकरी बदल रहा हूं…

बचपन में किसी ने पूछा था, क्या बनोगे? ठीक-ठीक याद नहीं कि क्या बोला था.. केंद्रीय विद्यालय से दसवीं, रांची के गोस्सनर कालेज आई काम लेकर इंटरमीडिएट की, क्999 में। तब तक माल कल्चर भारत में नहीं आया था.. और मैं अकाउंटस का हिसाब करोड़ों का बनाया करता  था। हिसाब बनाते वक्त बाहर से कोई सुन ले तो सोचेगा कि पता नहीं कितना रुपये हैं.. उसके बाद इकोनोमिक्स से ग्रेजुएशन कर ली.. भारत की कृषि से लेकर अपने आरबीआई और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पढ़ता रहा…। तब तक मैं नहीं समझ पाया था कि दाल रोटी का जुगाड़ कैसे करूंगा..? दिल्ली आया डेढ़ साल तो मजे में बिता दिए.. उसके बाद फिर से पढ़ाई और फाईनली पत्रकारिता के कीड़े ने मुझे काट लिया..

पिछले तीन साल से दैनिक जागरण का नमक खा रहा था.. बीच में कई लोगों ने कहा, पैसे नहीं इस फील्ड में छोड़ दो.. तात्कालिक सेलरी से दुगने पर किसी वाणिज्यिक कंपनी में बात हुई..लेकिन पत्रकारिता का भूत इतनी जल्दी नहीं उतरता और अब उतरेगा भी नहीं..ऐसा लगता है।

जागरण डाट काम में तीन साल तक काम करता रहा.. खूब मीठे अनुभव, कुछ कसैले भी.. कुल मिलाकर अनुभव खूब मिले। सभी मूड के लोगों के साथ काम किया.. इसके साथ मेरा भी एक मूड मिला.. जलेबी समौसे की पार्टियां खाई… लेकिन अब…
नौकरी बदल रहा हूं.. इंडिया टुडे डाट काम जा रहा हूं…