आमिर और “शाहरुख़” ब्लॉग पर और टिप्पणियों में गालियों की बौछार

ब्लॉग का नशा आप और हम पर ही नही है यह आज कल बॉलीवुड भी पहुँच चुका है. आमिर खान तो पिछले साल भर से ब्लॉग लिख रहे हैं अमित जी ने अभी शुरू किया है. कई और  सेलिब्रिटी भी लिखते हैं.

आमिर के नए ब्लॉग पर “शाहरुख़” को जगह मिली है. अपने किंग खान शाहरुख़ नही, आमिर खान के पंचगनी में जो कुत्ता है, उसका नाम है शाहरुख़. पूरा ब्लॉग क्या है वो तो आप यहाँ पढ़ लीजिये लेकिन जो टिप्पणिया मिली है और बिना मोदेरेशन के वह टिप्पणिया पड़ी है. वो काबिले गौर है. टिप्पणिया नही हैं या तो प्रशंसा है या फ़िर गालिया. आमिर को गालिया, उनकी पत्नी किरण को गालिया.

ये गालिया भड़ास हैं या फ़िर पोस्ट आप पढ़ कर सोचे और समझे 

जयपुर में ब्लास्ट, क्या इनका कोई पैटर्न होता है??

आतंकवाद का कोई पैटर्न नही होता. वो कही भी हो सकता है. वहा जहा ज्यादा से ज्यादा लोग हताहत हो. इनका काम होता है लोगो में खौफ पैदा करना. एक साथ पूरे राज्य पूरे देश में. इनका कुछ होता है या नही होता है नही मालूम लेकिन कोई धर्म कोई मजहब तो एकदम नही होता है. यह बच्चों, बुजुर्गो, मुसलमानो, हिन्दुओ सबसे घृणा करते हैं. भारत में यह हिन्दुओ को पाकिस्तान में मुसलमानों को, अमेरिका में ईसाईयो इनको नफरत है. यही है इनका पैटर्न.
यह लिस्ट आप लोगो को बताने के लिए काफी होगा की आतंकवाद की ना ही जात है ना ही कोई मजहब. कभी कही धमाका तो कही किसी प्लेन का अगवा. ये Destrctive Mind के होते हैं. बस यही है इनका पैटर्न.

यह चीन क्या और कहा है? सच क्या है?

मैं यह जो सवाल पूछ रहा ह इसके पीछे वजह है. चीन एक देश है और वो भारत का पडोसी राज्य है. इतना टू मुझे पता है लेकिन… आज जब संचार माध्यम इतना सरल हो गया है फ़िर भूकंप में मरने वालो का आंकडा सही क्यों नही आ रहा है. Xinhua चीन एक समाचार एजेन्सी है देखिये क्या ख़बर दे रहे हैं. इस पूरे ख़बर में कही यह जिक्र नही है की मरने वालो की संख्या क्या है? Times of India की खबर है 20000 लोग मारे गए(Print Edition). Hindu की ख़बर है ८७०० लोग मरे गए. NDTV की Website इसे फोकस ख़बर बनाती है और वहा भी 8700 के मारे जाने की ख़बर है. बीबीसी हिन्दी का कहना है की भूकंप में मरने वालो की संख्या 10000 के करीब.

New York Times मेरे इस पोस्ट लिखने से ९ मिनट पहले ख़बर लगाती है, भूकंप में हजारो मरे.  Intro कहता है 8500 लोग मरे गए. यह ख़बर भूकंप स्थल से लिखी गई है. Chengdu बीजिंग से ८०० मील दूर है

मैं यह नही समझ पा रहा ह कि चीन अपनी खबरों को सही तरीके से क्यों नही दे रहा है? इनको ढकने कि क्यों कोशिश की जा रही है. अगर २१ वी सदी में भी ख़बर सही नही आती है तो फ़िर कब. बीजिंग में ओलम्पिक खेल होने वाले हैं इनके मद्देनजर वहा बाहरी मीडिया का जमावाडा बढेगा, इसके बावजूद ख़बर सही नही आ रही है क्यों ?? आख़िर यह चीन है कहा और क्या है

आज के दोहे

sketchजीभों पर कांटे उगे, मन में उगे बबूल।

रिश्ते कोई प्यार के, कैसे करे कबूल॥

चादर से बाहर हुए, नई सदी के पांव।

भाई-भाई में चले, ‘शकुनी’ वाले दांव॥

बड़के को नथनी मिली, छुटके को जंजीर।

बिटिया के हाथों लगी, अम्मा की तस्वीर॥

मान-पान सम्मान सब, चाह रहे है आप।

ये सब पाना था बना, क्यों बेटी का बाप॥

सांई इस संसार में, ऐसे मिले फकीर।

भीतर से ‘लादेन’ है, बाहर दिखे कबीर॥

धूप सयानी हो गयी, बौनी होती छांव।

रिंग रोड पर सोचते, कहां खो गया गांव॥

काबिज है गोदाम पर, मिस्टर सत्यानाश।

‘सवासेर गेहूँ’ नहीं, प्रेम चन्द्र के पास॥

[डॉ. सुरेश अवस्थी]

117/233, नवीन नगर, काकादेव, कानपुर

मैंने इसे पढ़ा तो लगा कि यह तो आज के बारे में कहा गया है. इसलिए आपलोगों के सामने पेश कर रहा हू. डाक्टर सुरेश जी को इनती अच्छी कविता के लिए मेरी ओर से बधाई

साभार: दैनिक जागरण

मुंह दिखाई 5 रुपए!!!

नई नई दुल्हन, सारे अड़ोस पड़ोस की महिलाये दुल्हन को देखने आई. दुल्हन ने भी घूंघट डाल रखा था. परम्परा जो सालो से चली आ रही थी, उसे कहते दुल्हन परछना. चावल जो हल्दी में रंगे हुए थे. थाली से उठाना और दुल्हन के घूँघट के ऊपर डाल देना. और उसके बाद पैसे देना.

बात मैं इसी की कर रहा हू… यह काम महिलाए करती हैं और नाम लिखने वाला महिला को पहचान उनके पति का नाम लिख देती हैं या फ़िर घर का जो पुरूष मुखिया हो उसका (महिला अपना नाम क्यों नही लिखवाती या लिखने वाला उनका नाम क्यों लिखता यह अलग चर्चा का विषय है) कोई देता है १५१, कोई केवल ५१ तो कोई ११ और कोई ५. हा मुंह दिखाई ५ वो भी इस ज़माने में(जब मुद्रास्फिती ५ से ६ और ६ से ७ और उससे भी आगे भाग रही है ) हा तो दुल्हन को परछने के बाद पास बैठे लड़के को ५ रूपये दिए. लड़के ने पति का नाम लिखने के बाद ५ रुपए लिख दिया. लड़का हैरान परेशान की ये ५ रुपए देने का क्या तुक है.

तो मैं अब तुक समझा दूँ. १२ साल पहले इस घर की महिला ने उस घर की दुल्हन को परछने के बाद ५ रुपए दिए थे. वो बात याद रखते हुए उस घर की महिला ने इस घर में आई दुल्हन को ५ रुपए वापस लौटा दिए.

ये आज भी होता है, मुझे हँसने की वजह मिली सो मैंने सोचा आप भी हंस ले…

लाल, भगवा और कलर लेस

विचारों में कितनी बड़ी फर्क है। अभी लाल हुए नहीं कि लोगों ने वाम कहना शुरू कर दिया। भगवा ओढ़ा तो संघ और भाजपा कहने लगे। बुर्जुआ लोगों का भी एक समाज है। अवसर को भुनाना इन्हें ही सबसे ज्यादा आता है।

मैं कलरलेस होना चाहता हूं। इन रंगों से जुदा। इसलिए कि जिंदगी में रंग भर सकूं।

हिंदू परंपराएं जो मर गई, कुछ मरने वाली हैं

हम भारतवासी अपने देश, अपनी संस्कति, अपनी परंपराएं पर गर्व करते हैं। हिंदूओं में यह बात तो और भी ज्यादा है। परंपराओं को लेकर इनका मानना है कि जो भी बनाई गई हैं बेहतरी के लिए बनाई गई है। सबका अपना एक मतलब है और लाभ भी।

अभी कुछ दिन पहले यह देखने को मिला तो बात याद आ गई सो लिख रहा हूं।

पिता अपनी बेटी के यहां आते हैं। गांव से। बेटी ने सबसे पहले उनके पांव धोये, आटा गूथने वाले बरतन में। तौलिये से उनका पांव पोंछा। पिता झोले में कुछ लाए थे, मां ने घर से कुछ बना कर दिया था। थोडी देर आराम करने के बाद पिता जाने को हुए। बेटी के घर का कुछ नहीं खाया। कहते हैं, बेटी के घर का कुछ नहीं खाना चाहिए।

और वह घर को चले गए।

मैं सोचता रहा, क्या इसके भी कोई मायने हैं। परंपरा तो है। तो जिस पर हम गर्व करते थे, वह आज धीरे-धीरे मर गया। लोगों को याद भी नहीं है। चलन से बाहर हो गया।

यह बात अलग है कि समय के साथ सबको चलना चाहिए। मैं इससे परहेज नहीं करता लेकिन वैसे जो परंपराओं को लेकर दंभ भरते हैं, और उसके बावजूद उन्हें कई परंपराएं मालूम ही नहीं।

क्या आपको मालूम है की कुछ और परम्पराये मर रही हैं?

हिंदी और अंग्रेजी के सोच का फर्क

अगर यह बात कही जा रही है तो मुमकिन है इसमें सच्चाई होगी। अगर होगी तो मैं कुछ कहना चाहता हूं। पहले मैं केवल यह मान लेता (स्कूल में गणित के सवालों का जवाब देने के क्रम में कुछ तो मानते होंगे, बस यह इसी प्रकार का मानना है)हूं कि हिंदी वालों के पास पैसे कम होते है। सोच भी प्रोग्रेसिव नहीं होती। छोटी-छोटी बातों को भी ऐसे पकड़ते हैं जैसे पैसे को दांत से पकड़ा जाता हो।

इसी के ठीक उलट यह मान लेता हूं कि अंग्रेजी वालों के पास पैसा होता है। सोच से प्रोग्रसिव होते हैं। हर छोटी बातों को नहीं पकड़ते।

अगर यह सब हिंदी और अंग्रेजी वालों की सोच में है तो क्या होगा? जरा मजमून पेश करता हूं।

- हिंदी
सबसे पहले तो वह पैसा कमाना चाहेंगे। इसके लिए कुछ काम करेंगे, कुछ मक्खन बाजी, कुछ के अपने उसूल होंगे इन सब के बीच उनकी प्राथमिकता पैसा कमाना ही होगी। येन, केन प्रकारेण।

प्रोग्रेसिव से मेरा सीधा मतलब है कि समय के अनुसार वह नहीं बदलना चाहते। माता-पिता को डैड बोलने पर कहेंगे आजकल के लड़के-लड़कियां पिता को डैड तो कभी डेड कहते हैं। डैड बोलने में दिक्कत क्या है, मुझे समझ नहीं आता। 90 के दशक में जो जींस पहनते थे, उनके बारे में कहा जाता था, लड़का जींस पहनता है(आज वह खुद या उनके बच्चे पहनते होंगे)। इतना बताने के बाद शायद मैं ठीक से समझा पाऊं कि नई चीज को आत्मसात करने में इन्हें दिक्कत होती है। मतलब यह प्रोग्रसिव नहीं होते।

छोटी बात को पकड़ते हैं से मेरा मतलब है, टीवी के एक रियलिटी शो में मलाईका अरोड़ा माइक्रो मिनी पहन कर आती है तो कुछ दोस्त इसी बारे में बात करते हैं कि यार देखो यह छोटे कपड़े पहन कर आती है। और बात आगे बढ़ते हुए मस्त और सेक्सी तक पहुंच जाती है। और उसके बाद बातों ही बातों में बलात्कार भी। ऐसा होता है। हमारे आपके सभी के बीच।

- अंग्रेजी

पैसा तो इनके पास होता ही है तो इस बारे में इनका ख्याल प्राथमिक रूप में नहीं होता है। इनकी स्थिति उसे बढ़ाने को लेकर ही होती।
इनका ध्यान सड़क पर चल रहे कुत्तों की मारपीट में घायल एक कुत्ते पर होता है (मनुष्य मदद मांगे तो शायद नहीं दे पाएं, कुत्तों को देते हैं।)

इन्हें नई चीजों को करने में तकलीफ नहीं होती। खाने से लेकर शराब तक। हर नई चीज के यह दीवाने होते है। आफिस का कपड़ा काफी सलीके का होता है लेकिन जब अपनी सोच पर आएं तो औड चीज को यह पहले अपनाते हैं।

जाति और धर्म को लेकर तो ये भी संवेदनशील होते हैं। लेकिन इनमें कास्ट से ज्यादा क्लास को लेकर फीलिंग होती है। अगर अदर कास्ट वाला भी सेम क्लास का हुआ तो फिर चलेगा। बालीवुड इसका अच्छा उदाहरण है। यहां केवल क्लास की पूछ होती है, कास्ट तो इनके लिए कोई मैटर ही नहीं है।

मैं यह नही कहता की इससे अलग सोच वाले लोग दोनों गुटों में नही होते हैं. बेशक होते हैं. लेकिन बहुतायत इन्ही की है

याद दिलाना मुनासिब समझता हूं कि हम मान रहे हैं। सच्चाई यह नहीं है, या सच्चाई भी यही है.. आप बताएं?

कुछ स्टीरियोटाईप सोच: अंतिम भाग

पिछली पोस्ट में बेंगाणी जी ने कहा कि यह अपवाद हैं। उनके इस बात पर केवल इतना कहूंगा कि अपवाद उनके दिमाग में हैं। या अगर वह किस्मत को मानते हैं तो किस्मत के खोटे हैं, जिन्हें ऐसे लोग नहीं मिले। मैं किस्मत को नहीं मानता, कर्म को मानता हूं। मुझे ऐसे लोग मिले हैं।

खर, बात आगे बढ़ायी जाए।

चैत्र महीना में जेठ जैसी गर्मी पड़ रही थी। बाइक पर चलता हुआ मनोरंजन पूर्वी दिल्ली के विकास मार्ग पर 50 की स्पीड से गाड़ी चला रहा था। और तभी उसकी बाईक हुडुक हुडुक के साथ हिचकोले खाई। उसे पता चल गया पेट्रोल खत्म होने वाला है। मुश्किल से अब वह और एक किलोमीटर गाड़ी से जा सकता था। एक्सीलेरेटर पर उसका पंजा थोड़ा और तेज हुआ। लेकिन गाड़ी बंद हो गई थी। एक्सीलेरेटर ने आपना काम करना बंद कर दिया था। थोड़े देर बाद ही गाड़ी ने अपनी गति भी खो दी। मनोरंजन गाड़ी में बैठे हुए ही अपने पैर से धक्का दे गाड़ी को आगे बढ़ा रहा था। तभी पीछे से एक वर्दीधारी ने बाइक में चलते हुए अपने बाएं पैर से मनोरंजन की बाइक को धक्का देना शुरू किया। उसने बिना कहे पेट्रोल पंप तक उसकी गाड़ी को धक्का दिया।

मनोरंजन को सहज यह एहसास नहीं हो रहा था कि एक पुलिस वाले ने ऐसा किया। कई बार सड़क पर अपनी गाड़ी को धक्का दे रहे लोगों के पास से तो मनोरंजन भी गुजरा था। लेकिन उसने यह जहमत कभी नहीं उठाई थी।

पुलिस भी अच्छा सोचते हैं और हमारी आपकी तरह खराब और अच्छे भी हो सकते है।

लाल बहादुर शास्त्री ने एक रेल दुघर्टना के बाद इसकी जिम्मेदारी लेते हुए अपना इस्तीफा सौंप दिया था। फिर एक और जमाना आया जब टाइम्स आफ इंडिया के आर के नारायणण ने एक काटरून में तत्कालीन दूरसंचार मंत्री के बारे में काटरून बनाया। सुखराम अपने आफिस में बैठे हुए थे। चारों तरफ रुपये बिखरा हुआ था। अलमारी में, टेबल पर, फर्श पर, फाइलों के उपर-नीचे, हर जगह। सुखराम अपनी सीट में बैठे हुए कहते हैं, अरे कोई है जो मुझे एक सफेद प्लेन कागज दे, जिससे मैं यह बता सकूं कि मैं निदरेष हूं। झारखंड के रामगढ़ जिला के एक स्थानीय नेता ने एक लड़के को पढ़ाने का पूरा जिम्मा लिया हुआ है।

नेता ईमानदार भी होते हैं और भ्रष्ट भी।

महिलाएं बोलती हैं ठीक उसी तरीके से जैसे मर्द बोलते हैं ज्यादा।

मुझे किसी आजकल के लड़के ने कहा कि आजकल की लड़कियां मोबाइल पर बात ही करती रहती हैं। जब देखो मोबाइल। मैंने उससे कहा क्या बता सकते हो किससे बात करती हैं, उसने कहा लड़के से। मैंने कहा फिर तो आजकल के लड़के भी जब देखो मोबाइल पर ही बात करते रहते होंगे।

यह सब हमारे आपके कुछ स्टीरियोटाइप सोच हैं। इसी स्टीरियोटाईप से बाहर निकलिए। किसी पूर्वाग्रह में हो कर चीजों को मत देखिए।

कुछ स्टीरियोटाईप सोच

इत्र केवल मुसलमान लगाते हैं।
मुसलमान भारत को नहीं पाकिस्तान को पसंद करते हैं।
बिहारी चालाक और राजनीति करने वाले होते हैं।
सभी लड़कियां सेक्सी होती हैं।
पुलिस हमेशा खराब होता है।
नेता कभी वादा नहीं निभाते।
औरतें खूब बोलती हैं।
युवा लड़कियां मोबाइल फोन पर सबसे ज्यादा बात करती हैं।

मैं ऐसा नही सोचता। कैसे? पूरा पोस्ट पढ़िये।

चांदनी चौक में रहने वाले शर्मा जी दरीबां की एक छोटी सी दुकान से अपने एक रांची दोस्त (जो दूसरे शर्मा जी हैं) के लिए इत्र खरीदतें हैं। अपने रांची प्रवास के दौरान शर्मा जी सबकुछ भूल जाएं, इत्र नहीं भूलते।

इत्र कोई भी लगा सकता है। शर्मा जी भी और अख्तर साहब भी।

अखबार के एक दफ्तर में पहले ट्वेंटी-20 फाइनल का टीवी में प्रसारण चल रहा था। मुकाबला था इतिहास में एक ही देश कहलाने वाले और वर्तमान के तथाकथित दो दुश्मनों देशों के खिलाफ। मैच का अंतिम ओवर धोनी के चहेते जोगिंदर शर्मा कर रहे थे.. आखिरी गेंद.. और भारत मैच जीत गई। पाकिस्तान हार गया। दफ्तर में शांत रहने वाले मुसलमान नियाज ने हिंदू सोभन का गाल चूम लिया। ..और पैसे मिलाकर मिठाई मंगाई गई लेकिन मुसलमान नियाज ने सबसे ज्यादा 100 रुपये मिलाए।

भारतीय मुसलमान भारत को प्यार करते हैं और वह भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े प्रशंसकों में से एक होते हैं।
यूं तो इस आफिस में भी कुछ नया नहीं था। कुछ भी नया नहीं था से मेरा मतलब कि दिल्ली के हरेक आफिसों की तरह इसमें भी बिहारियों की संख्या सबसे ज्यादा थी। कोस्मोपोलिटन दिल्ली में वह कोस्मोपोलिटन पत्रिका नहीं पढ़ते। प्रवीण झा भी इसी आफिस का हिस्सा है। मध्यम वर्ग परिवारों में होने वाले मूल्यों को लेकर चलने वाला। आफिस में उसे लोग कभी-कभी झा.अुआ कह कर पुकारते। इसका तुक तो प्रवीण को भी नहीं समझ में आता। झा को झा.अुआ कहना, समझ से परे की चीज है। उसकी प्रकृति उसकी निजी थी, किसी प्रांत और इलाके से अलग(सभी की प्रकृति उसकी निजी व्यवहार पर ही होती है, प्रांत और इलाके से अलग)।

बिहारी भी सीधे होते हैं और राजनीति को समझते हैं और नहीं भी समझते।

तीसरे माले में रहने वाले कुछ लड़के तो सड़क से आने जाने वाली हर लड़की को सेक्सी कहते। उनके जेहन में लड़कियां सेक्सी ही होती हैं, जैसा कुछ बैठा हुआ है।

बस में चलते हुए उसी तीसरे माले में रहने वाले एक लड़का, विकास का सामना एक लड़की से हुआ। जिसके बाद वह बस से यह बुदबुदाते हुए उतरा, इसके तो सिंग उगे हुए थे, लड़ने को ही घर से निकली थी।

हुआ कुछ यूं था। बस ने हल्का हिचकोला खाया और विकास का जूता, लड़की के बस की फर्श पर रगड़ खा रही दुप्पटे को खिंच गया (अनजाने में हुआ था यह)। दुप्पटा पूरा नीचे। लड़की ने उसे देखते हुए कहा, आंखे नहीं हैं क्या? देख कर नहीं खड़े हो सकते हैं क्या?
अगले स्टाप पर बस में भीड़ थोड़ी और बढ़ गई। बस ने एक हिचकोला और खाया। विकास लड़की से टकराते-टकराते.. टकरा ही गया। कुछ अंग्रेजी और हिंदी, लड़की ने विकास को इतना सुना दिया कि सभी यात्री विकास को ही देखने लगे। अगला स्टाप विकास का स्टाप था। वह कुछ बुदबुदाते हुए उतर रहा था।

बाकी की बातें अगले पोस्ट में लिखूंगा